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रीढ़ में फ्रैक्चर, पर नहीं टूटी; माउंट एवरेस्ट किया फतह:आकाश से पाताल तक लहराया तिरंगा, सबसे गहरे समुद्र में उतरने का है सपना

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: मरजिया जाफर
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मैं मेघा परमार मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के छोटे से गांव भोजनगर से ताल्लुक रखती हूं। मैंने 22 मई 2019 की सुबह पांच बजे माउंट एवरेस्ट फतह कर लिया। मैं पांच कॉन्टिनेंटल हाईएस्ट माउंटेन फतह करने वाली विश्व की पहली पर्वतारोही बनी।

मेरे गांव में लड़कियों की 2 साल की उम्र में कर दी जाती है सगाई

मैं उस गांव में जन्मी जहां लड़कियों की 2 साल की उम्र में सगाई कर दी जाती है। हमारे यहां सगाई के दौरान रिंग सेरेमनी नहीं होती। एक दूसरे के घर नारियल देकर रिश्ता पक्का किया जाता है। बचपन में सिर्फ यही सपना था कि राख से बर्तन नहीं मांजना है। घर में फ्रिज होना चाहिए। फ्रिज इसलिए क्योंकि मुझे सब्जियां खाने का शौक है और फ्रिज में सब्जी ताजी बनी रहती हैं।

भाई को खाने की दिक्कत न हो, इसलिए भेजी गई शहर

भाई शहर पढ़ने गए तो उन्हें खाने की दिक्कत होती थी और वह बार-बार घर दौड़ा चला आता था। ऐसे में मुझे भाई के पास भेजा गया ताकि मैं वहां खाना बना सकूं, और यहीं से मेरी आगे की पढ़ाई का रास्ता भी ऐसे ही खुला।

भाई के साथ रहती थी तो दूसरी मंजिल पर पानी भरकर ले जाना पड़ता था और इसी बहाने मेरा वर्कआउट हो जाता था। ​कॉलेज में एनएसएस यानी राष्ट्रीय सेवा योजना से जुड़ी और वॉलंटियर थी तो स्पोर्ट्स में पार्टिसिपेट करती थी। गवर्नमेंट गर्ल्स कॉलेज से मेरे सपने को प्लेटफार्म मिला। फिर एक किक मिली और जिंदगी ने अलग राह पकड़ ली। मालदीव में हुए यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम में एक्सपोजर मिला। मैं पहली बार हवाई जहाज में चढ़ी थी।

दैनिक भास्कर अखबार में पढ़ा कि मध्य प्रदेश के 2 लड़कों ने माउंट एवेरेट फतह किया है। वो चीज़ मेरे दिल में घर कर गई।
दैनिक भास्कर अखबार में पढ़ा कि मध्य प्रदेश के 2 लड़कों ने माउंट एवेरेट फतह किया है। वो चीज़ मेरे दिल में घर कर गई।

एवरेस्ट क्लाइंब मिशन

अपने बुरे दौर में लोगों के रवैये को अब मैं भूल गई हूं। एवरेस्ट पर जाने से पहले मैंने सबको माफ कर दिया क्योंकि जब आप किसी मिशन पर होते हो तो पता नहीं होता कि आप मिशन पूरा कर वापस आओगे या नहीं। इसलिए मैंने भगवान से यही प्रार्थना की कि जाने-अनजाने किसी का दिल दुखाया हो तो मुझे माफ कर दें और मेरा जिसने दिल दुखाया था उन सबको मैंने माफ कर दिया।

मां के दिल का डर

मैं बहुत बहादुर माता-पिता की बेटी हूं। एवरेस्ट मिशन पर जाने से पहले मैंने मम्मी-पापा को ये समझाया था कि अगर मैं माउंट एवरेस्ट फतह कर गई तो मुझे सरकारी नौकरी मिल जाएगी। क्योंकि मैं पढ़ाई में बहुत कमजोर थी, उन्हें लगता था कि मैं भविष्य में क्या करूंगी। उसी दौरान मैंने दैनिक भास्कर अखबार में पढ़ा कि मध्य प्रदेश के 2 लड़कों ने माउंट एवेरेट फतह किया है। वो चीज़ मेरे दिल में घर कर गई। मुझे लगा मैं क्यों नहीं कर सकती। उस वक्त तक मुझे अंदाजा नहीं था कि ये काम इतना कठिन है।

और शुरू हुआ शिखर का सफर…

एवरेस्ट पर चढ़ाई करने के लिए 25 लाख रुपए चाहिए थे। मैंने तो कभी एक साथ इतने रुपए नहीं देखे थे। बहुत भटकी। फिर मध्य प्रदेश सरकार ने 15 लाख रुपए की मदद की और बाकी के 10 लाख रुपए अलग-अलग कंपनियों ने स्पॉन्सर किए। मेरे मां-पिता को बहुत ताने सुनने को मिलते थे, 'थारी छोरी पहाड़-पहाड़ फिरे'।

मम्मी-पापा को ये भी नहीं पता था कि बेटी जिन्दा वापस आएगी या नहीं। जब मैं बेस कैंप पहुंची तब पापा ने स्मार्ट फोन पर देखा कि वहां जाकर लोग मर जाते हैं। उन्होंने मुझसे पूछा, 'छोरी तूने बताया नहीं यहां जाकर लोग मर भी जाते हैं'। मैंने उन्हें बोला ऐसा कुछ नहीं है, आर्मी वालों के बारे में सोचो उनके मां-बाप भी तो उन्हें देश की सेवा के लिए बॉर्डर पर भेजते हैं।'

2018 में मैं माउंट एवरेस्ट शिखर पर पहुंचने से महज 700 फीट से चूक गई।
2018 में मैं माउंट एवरेस्ट शिखर पर पहुंचने से महज 700 फीट से चूक गई।

माउंट एवरेस्ट पर चढ़ते हुए कई बार लगा कि कहीं मर न जाऊं

माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान हर पल दिमाग में यही आता है कि अब बस। क्योंकि दो-दो किलो के जूते, 12-13 घंटे की चढ़ाई, डेड बॉडी के पास से गुजरना ऐसे ख्याल आते थे कि कहीं इनकी तरह मैं भी डेड बॉडी में बदल न जाऊं। 2018 में मैं माउंट एवरेस्ट शिखर पर पहुंचने से महज 700 फीट से चूक गई।

दोबारा तैयारी के लिए मनाली में ट्रेनिंग के दौरान 12 फीट से नीचे गिर गई जिसकी वजह से मेरी रीढ़ की हड्डी में 3 फ्रेक्चर हो गए। लेकिन हार नहीं मानी। एवरेस्ट यात्रा के दौरान हमेशा पीने के लिए पानी नहीं मिल पाता था। हर समय शरीर अंदर से टूटता था। सांस नहीं ली जाती थी। सीढ़ियां पार करते समय पैर कांपते थे। उस वक्त मैंने अपनी हिम्मत बढ़ाई और खुद से कहा कि रुको मत। यह भी हो जाएगा। हम जब हाई एल्टिट्यूड पर पहुंचते हैं तो वहां ऑक्सीजन बहुत कम होती है।

जिद के कारण मैं शून्य से शिखर तक का सफर तय कर पाई हूं

मैं बहुत जिद्दी हूं और शायद इसी जिद के कारण मैं शून्य से शिखर तक का सफर तय कर पाई हूं। सबसे पहले बर्फ की सही जानकारी होना मतलब ब्लू आइस क्या है, ब्लैक आइस क्या है, सॉफ्ट आइस क्या है, इसपर कैसे चलते हैं। इसके लिए पूरे देश में सिर्फ पांच इंस्टीट्यूट हैं। बस आपको अप्लाई करना होता है और सिलेक्शन के बाद ट्रेनिंग दी जाती है।

मिशन के लिए बैग पैक

बेस कैंप के बाद कुछ भी खाने पीने का सामन नहीं मिलता है। इसलिए हम अपने साथ एक भरी बैग ले जाते हैं। जिसमें स्लीपिंग बैग, मैट्रेस, और ज्यादातर वहां जूस या सूप पीते हैं क्योंकि आप जितनी ऊपर होते होते हैं, डिहाईडरेशन की प्रॉब्लम बढ़ जाती हैं। छोटे-छोटे मेडिसिन किट होते हैं।

टेक्निकल स्कूबा डाइविंग में समुद्र के अंदर 45 मीटर की गहराई तक डाइविंग की है।
टेक्निकल स्कूबा डाइविंग में समुद्र के अंदर 45 मीटर की गहराई तक डाइविंग की है।

शिखर से समंदर का रुख

मेरे साथ माउंट क्लाइंब करने वाली एक साथी ने मुझे कहा कि आपके नाम के आगे मध्यप्रदेश तो लग गया, इंडिया कब लगेगा। इस बात ने दिमाग पर क्लिक किया और मैंने डाइविंग की ठान ली। अब मुझे डाइविंग तो करनी थी, लेकिन तैरना ही नहीं आता था। पाँडिचेरि गई वहां अर्जेंटीना से ट्रेनर आए और स्विमिंग सीखी और फिर डाइविंग की शुरुआत हुई। मेरे लिए टेक्निकल डाइविंग का एग्जाम पास करना मुश्किल था। जिसमें फिजिक्स और मैथ्स के जटिल सवालों का सामना करना पड़ा।

स्कूबा डाइविंग में बनाया वर्ल्ड रिकॉर्ड

मैंने 147 फीट (45 मीटर) की टेक्निकल स्कूबा डाइविंग में विश्व की पहली महिला का नया रिकॉर्ड बनाया। टेक्निकल स्कूबा डाइविंग में समुद्र के अंदर 45 मीटर की गहराई तक डाइविंग की है। मैंने स्कूबा डाइविंग की डेढ़ साल तैयारी करने के दौरान हर दिन 8 घंटे प्रैक्टिस की और कुल 134 बार डाइविंग की।

ये रिकॉर्ड देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' अभियान को समर्पित किया है। इस सफलता के पीछे मैं ईश्वर की शक्ति और सभी स्पॉन्सर का धन्यवाद करती हूं जिनके जरिए यह मुमकिन हो सकता है।

समुद्र की गहराई में जाकर भी तिरंगा फहराने का सपना

मेरे मन में था कि पर्वत चढ़ लिया, लेकिन अब समुद्र की गहराई में जाकर तिरंगा लहराऊं। मुझे पता चला कि इसके लिए टेक्निकल स्कूबा डाइविंग करनी पड़ेगी जो बहुत कठिन होती है। लेकिन मेरे मन में दृढ़ संकल्प था जिसे मैं अपनी मेहनत से पूरा करना चाहती थी।

इसमें जान का जोखिम होता है। जो ऑक्सीजन धरती पर इंसान के लिए अमृत है वही समुद्र में शरीर के अंदर ज्यादा मात्रा में हो जाने पर जानलेवा बन जाती है। जिससे इंसान पैरालिसिस का शिकार हो सकता है और जान भी जा सकती है।

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