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मगरमच्छ की सहेली और डॉल्फिन की दीदी अरुणिमा:नुकीले दांतोंवाला खूंखार मगरमच्छ भी आंखों से थैंक्यू कह जाता है अरुणिमा को

2 महीने पहलेलेखक: निशा सिन्हा
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  • रिस्क लेकर बचाती हैं जानवरों की जान
  • कछुए से भी गहरी बॉन्डिंग

शक्कर सी मीठी चेहरे की मलिका अरुणिमा को खूंखार जानवर मगरमच्छ से मोहब्बत है। सच ही तो है, प्यार में लाेग कहां अपनी परवाह करते हैं। यह प्यारी सी कन्या मुश्किलों में फंसे मगरमच्छ को बचाने में एक्सपर्ट हो गयी है।

कछुआ बचाओ अभियान से जुड़ी हैं अरुणिमा
कछुआ बचाओ अभियान से जुड़ी हैं अरुणिमा
नदी से अरुणिमा को प्यार
नदी से अरुणिमा को प्यार

ऑपरेशन जानवर से प्यार
पिछले साल की बात है, उत्तर प्रदेश के सीतापुर के एक तालाब में नहर के रास्ते एक मगरमच्छ आ पहुंचा था। मानसून के बाद नदियों में पानी भर जाने से कभी-कभी ऐसी स्थिति आती है। अरुणिमा अपनी टीम के साथ रेस्क्यू कराने पहुंचीं। लेकिन जानवर बड़ा होशियार था। हर दिन अपनी जगह बदल लेता। तालाब की गहराई में जा छिपता। इससे उसको खोजना और भी कठिन हो जाता। इससे रेस्क्यू में दिक्कतें आ रही थीं। करीब 3 दिन की मशक्कत के बाद मगरमच्छ को तालाब से निकाल कर घाघरा नदी में छोड़ा गया। यह पहली बार नहीं हुआ था, इसके पहले भी उन्होंने मुसीबत में फंसे मगरमच्छों को रेस्क्यू कराया है। तो क्या ऐसा करते वक्त, उन्हें डर नहीं लगता। टर्टल सर्वाइवल अलायंस एंड वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन सोसायटी, इंडिया में प्रोजेक्ट को-ऑर्डिनेटर अरुणिमा बताती हैं, “उस समय केवल जानवर का दर्द दिखता है। मुसीबत में फंसे जानवर की घबराहट देख कर मन में दया आ जाती है। दिमाग में केवल जल्दी से जल्दी उसे बचाने की जद्दोजहद चल रही होती है।

डॉल्फिन के साथ अलग लगाव
डॉल्फिन के साथ अलग लगाव

डॉल्फिन, अजगर सबकी दुलारी
करीब 7 फीट के मगरमच्छ को कमसिन लड़की किस तरह रेस्क्यू करा लेती है। यह वाकई रोमांचक होता है। उनके रेस्क्यू कराने के किस्से सुनकर ही मध्य प्रदेश वन विभाग ने भी मुसीबत में फंसे एक मगरमच्छ को रेस्क्यू कराने के लिए बुलाया था। इतना ही नहीं, उन्होंने वहां के लोगों को भी मगरमच्छ कोबचाने का गुर बताया। तो क्या? मगर से डर नहीं लगता अरुणिमा को। वे बताती हैं, “मुझे लगता है कि जानवरों से मेरी अच्छी बॉन्डिंग हो गई है। किसी भी जानवर को रेस्क्यू कराते समय जब हमारी आंखें आपस में मिलती हैं, तो उसी समय दोस्ती हो जाती है। डॉल्फिन को रेस्क्यू कराने के बाद जब नदी में छोड़ने तक उन्हें पकड़कर बैठना होता है। इस दौरान वो बेहद मासूम होते हैं। वे मूक जानवर यह महसूस कराते हैं कि आप उनकी जिंदगी की वजह हैं। इससे बेहतरीन फीलिंग भला क्या हो सकती है।”

रेस्क्यू ऑपरेशन
रेस्क्यू ऑपरेशन

रैम्बो घड़ियाल और टॉमी पायथन
कई बार तो रेस्क्यू करा कर लाए गए जानवर का नाम भी रख देते हैं। वे बताती हैं कि एक बार एक नर घड़ियाल को रैम्बो नाम दिया गया। जब मैं उसे खाना देने जाती, तो रैम्बो बुलाने पर ही मेरी ओर देखता। इसी तरह से एक अजगर का नाम भी टॉमी रख दिया। वे हंस कर बताती हैं कि वह बहुत ही सीधा अजगर था। बाद में जब वह एक्टिव हो गया, तो उसे भी जंगल में छोड़ दिया गया। इनके रेस्क्यू से जुड़े काम को देखने के बाद अमेरिका के ब्रोनक्स चिड़ियाघर ने अनुभव साझा करने के लिए बुलाया था। देश के कई चिड़ियाघर में वह मगरमच्छ को बचाने और पकड़ने का प्रशिक्षण दे चुकी हैं। ऐसी ही एक ट्रेनिंग कार्यक्रम के लिए मध्य प्रदेश वन विभाग की ओर से कान्हा नेशनल पार्क में आने का न्योता दिया गया था। करीब 50 से अधिक लोगों को ट्रेनिंग देने की बात वह गर्व से बताती हैं। वे कहती हैं, “लोग उनको ध्यान से सुनते हैं, शायद वे सोचते हैं कि इतनी छोटी सी लड़की एक क्विंटल या इससे भी भारी मगरमच्छ को कैसे पकड़ लेती है।”

अमेरिका के ब्रोनक्स जू में अनुभव साझा करतीं अरुणिमा
अमेरिका के ब्रोनक्स जू में अनुभव साझा करतीं अरुणिमा

मम्मी को नहीं होती रेस्क्यू ऑपरेशन की जानकारी
रेस्क्यू कराने के लिए तालाब और नदियों में जाना पड़ता है। इसके लिए स्वीमिंग सीखना जरूरी होता है। शुरुआत में लखनऊ के स्विमिंग पुल में उन्होंने तैरना सीखा। बाद में तेज बहाव वाली घाघरा नदी में ट्रेनिंग ली। तैराकी में महारत हासिल करने के बाद उफनती घाघरा को पार किया। वे बताती हैं, मेरे पापा को रेस्क्यू अभियानों का पता होता है। मां को कभी नहीं बताती हूं। वह डर जाएंगी। यहां तक कि घाघरा को क्रॉस करने की बात भी मैंने मां से नहीं बतायी थी। यहां तक कि मेरे वरिष्ठ भी मुझे बार-बार सावधानी बरतने की हिदायत देते हैं। अरुणिमा बताती हैं कि जानवरों की तरह ही उन्हें नदी भी बहुत रोमांचित करता है। एक बार रेस्क्यू करायी गई डॉल्फिन को इलाहाबाद के संगम में छोड़ने गईं, तब गंगा की लहरों का अनुभव बेहद खास रहा।

पापा के साथ अरुणिमा
पापा के साथ अरुणिमा

पापा की परी को सम्मान
अरुणिमा के साहसिक कारनामों के कारण इन्हें पीएचडी चैम्बर ऑफ कॉमर्स और इंडस्ट्री की ओर से प्रकृति रत्न सम्मान दिया गया। इसके अलावा लखनऊ के जिलाधिकारी की ओर से जलीय जीवों को बचाने के लिए भी पुरस्कृत किया गया है। अरुणिमा बताती हैं, एक बार मेरे हाथों में अंदर तक मगरमच्छ के दांत चुभ गए थे। लेकिन मेरे पापा ने कभी मुझे इस काम को करने से नहीं रोका। शुरू में वे एक-दो बार फील्ड पर साथ गए, फिर मेरे ऊपर उनका भरोसा बढ़ गया। मेरे अचीवमेंट पर जब उन्हें खुशी होती है, तो मेरे हौसले की उड़ान और तेज हो जाती है।

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