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उम्मीदों के आसमान को ताकते चित्र:स्त्री मन की व्यथा, उत्सव, संघर्ष और सवालों को उकेरते हैं अनुप्रिया के स्वाभिमानी चित्र

2 महीने पहलेलेखक: मीना
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मेरे चित्रों की स्त्री कोई अजूबा नहींं बल्कि वह भी झाड़ू-पोछा करने वाली, खाना बनाने वाली, बच्चों की देखभाल करने वाली स्त्री है, जो घर-गृहस्थी के बीच पढ़ने की, आगे बढ़ने की लालसा रखती है। वो एक आम स्त्री है। काले, लाल, सफेद रंग की रेखाओं के बीच मेरी स्त्री स्वाभिमान, आत्मसम्मान का पाठ पढ़ाती है। वो 40 की उम्र में साइकिल चलाकर मायके जाने की जिद और पति के साथ जाता/चकिया चलाकर काम की बराबरी भी सिखाना चाहती है। जीवन के गहरे अंधेरों के लिए सूरज को नए रंग में रंग देना चाहती है ताकि उसे जीवन को भरपूर जीने का मौका मिल सके। न सिर्फ उसे बल्कि हर स्त्री के लिए नई राह खुल सके, उसे उसके हिस्से का सम्मान और आसमान दोनों मिल सके। ये भाव, इच्छाएं और लालसाएं हैं चित्रकार अनुप्रिया की।

चित्रकार अनुप्रिया
चित्रकार अनुप्रिया

बिहार के सुपौल में पली-बढ़ी अनुप्रिया भास्कर वुमन से बातचीत में कहती हैं, ‘एक कलाकार अपने आसपास की गतिविधियों को देखकर कोई चित्र उकेरता है। मेरी कला भी आसपास की स्त्री की ही है। चित्रों की समझने की प्रक्रिया बचपन से शुरू हो गई थी। किसी भी तीज त्योहार पर मां कच्ची मिट्टी के आंगन में अर्पण उकेरतीं और मैं उनसे उकेरना सीखती। मां की कला को मैंने अपनी कला बना लिया। उनके साथ मैं भी रंगोली, अर्पण, आल्ता बनाने लगी। कच्ची मिट्टी से बने आंगन को रंगने में माहिर हो गई। अब किसी भी तीज-त्योहार पर आस-पड़ोस की भाभियां मुझे खींच लेतीं और चित्र बनाने की जिद करतीं। मैं मोहल्ले की ‘चित्र वाली’ बन गई।

चित्र बनातीं अनुप्रिया
चित्र बनातीं अनुप्रिया

कविता और चित्र का बचपन से था शौक
घर में मां को अर्पण बनाते और पिता जी को स्कूल में पढ़ाते देखा। घर में एक छोटा सा पुस्तकालय था जहां से पढ़ने-पढ़ाने की प्रक्रिया शुरू हुई। मुझे साहित्य पढ़ना और कविताएं लिखना बचपन से पसंद था। हंस, कथादेश जैसी बड़ी हिंदी की पत्रिकाओं में मेरी कविताएं 2006 से छप रही थीं, लेकिन किताबों में छपे चित्र देखती तो लगता कि मेरे चित्र इन किताबों में छपेंगे? 2014 में बड़ी उम्मीद के साथ ‘बिपाशा पत्रिका’ में अपने बनाए करीब 10 चित्र भेज दिए। वो सारे चित्र संपादक को पसंद आए। ये मेरे जीवन की सबसे पहली और बड़ी खुशी थी। यहां से कवि मन कलाकार भी बन गया। पत्रिकाओं के भीतर मेरे चित्र छपने लगे, धीरे-धीरे किताब के ऊपर कवर बनने लगे। अभी तक 70 किताबों के कवर बना चुकी हूं।

सोशल मीडिया बना प्रेरणा स्रोत
इलस्ट्रेशन का ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट फेसबुक बना। यहां अपने जैसे बाकी चित्रकारों को देखा, उनसे सीखा। मैंने जो शुरुआती चित्र कंप्यूटर पर बनाए, लेकिन फिर उस पर कंफर्टेबली काम नहीं कर पाई तो कागज-कलम पर आ गई। शुरुआती जो चित्र बनाए वो केवल चित्र थे, वो अपनी बात नहीं कह पा रहे थे, फेसबुक लोगों को देखकर सीखा तो अब मेरे चित्र की स्त्री अपने मन की बात कह पाती है। रस्सी कूदती स्त्री चांद को अपने भीतर समेटने चाहती है, चांद पर पेंट करती स्त्री आकाश में अपने सपनों को पूरा होते देखना चाहती है, चांद पर साइकिल लिए खड़ी मां अपनी बेटी को आगे बढ़ना सिखा रही है तो कहीं चांद को चीटियां उठाकर ले जाती हैं। चित्रों की ये सभी अभिव्यक्ति जब फेसबुक पर डालनी शुरू कीं तो लोगों को बहुत प्यार मिला। खूब सराहना मिली। देश-विदेश से आए संदेशों से मेसेंजर भरने लगा। अब आलम ये है कि मुझे अपने काम के लिए किसी के पास जाना नहीं पड़ता वे खुद मुझे काम देने आते हैं।

स्त्री-पुरुष के बीच समान काम के बंटवारे को दिखाता चित्र
स्त्री-पुरुष के बीच समान काम के बंटवारे को दिखाता चित्र

हर रंग की अपनी खूबी
लाल रंग का चांद, काले की रंग पृष्ठभूमि और सफेद रंग का पात्र। ये तीनों ही रंग मेरे चित्रों में सांकेतिक संदेश देते हैं। चित्रों में प्रयोग किया गया काला रंग विरोध, संघर्ष की भाषा कहता है तो लाल रंग इंकलाब का प्रतीक और सफेद अंधेरे मिटाता हुआ रंग है। ये रंग बताते हैं कि किसी स्त्री के लिए कोई रात कितनी ही गहरी क्यों न हो, खुशी की सुबह एक दिन जरूर आएगी।

आम स्त्री के मन की दुविधा को दिखाते हैं चित्र
मेरे लगभग हर चित्र में एक चिड़िया दिखती है जो प्रकृति के साथ जीने की राह बताती है। इन चित्रों में चांद विशेष है। चांद स्त्री मन की इच्छाओं का प्रतीक है। एक स्त्री जंजीरों में बंधी है और चांद पर टंगी चाभी उतारना चाहती है। यह चित्र बताता है कि कई बार हम अपने ही भीतर की जद्दोजहद में बंधे होते हैं, पर निकल नहीं पाते। कई बार हमें चांद मिलता है, कई बार नहीं। वो आम स्त्री उस चांद को चाहकर भी नहीं पा पाती उस दूरी को दिखाते हैं मेरे चित्र।

साड़ी, दुपट्टे पर भी छपने लगे हैं चित्र
सोशल मीडिया से काम को प्रसिद्धि मिली और यहीं से काम। किताबों और अखबारों में तो मेरे बनाए चित्र आ रहे थे। अब कपड़ों पर भी आने लगे। अभी पिछले ही साल आशा कॉटन फैब जो कपड़ों पर ब्लॉक पेंटिंग का काम करती है, वहां पर पांच चित्रों के ब्लॉक बने। साड़ी, दुपट्टे पर अपने बनाए चित्रों को देखकर अपनी एचीवमेंट महसूस हुई। अब लगता है कि मेहनत का फल मिलता है।

परिस्थितियों से हारें नहीं, उम्मीद का आसमान देखें
मेरे चित्रों में किसी को अपनी मां दिखती है, किसी को बहन किसी को पत्नी दिखती है। मुझे लगता है, हर व्यक्ति अपनी परिस्थितियों के कारण थकता है, लेकिन हर किसी को अपने हिस्से का आसमान मिलना चाहिए। इसलिए मैं एक लाइन कहना चाहूंगी, ‘थके हैं पंख पर उड़ान अभी बाकी है, मेरे पंखों में आसमान अभी बाकी है।’ जिंदगी में आगे बढ़ने की सोचनी चाहिए, रुकने की नहीं। यही संदेश मेरे चित्र भी देते हैं।

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