पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

अपने पैसे से बनी एक्टर:लोगों ने कहा, तुम्हारे सपने कभी पूरे नहीं होंगे, मैं जिद पर अड़ी रही, बन गई अभिनेत्री

नई दिल्ली3 महीने पहलेलेखक: सुनाक्षी गुप्ता
  • कॉपी लिंक

यूं तो हर दिन हजारों लोग सपनों की मायानगरी मुंबई पहुंचते हैं और बॉलीवुड या टीवी सीरियल में नाम कमाने का ख़्वाब देखते हैं, मगर बहुत कम लोग होते हैं जो अपने सपने को हकीकत में बदल पाते हैं। उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर जिले की चांदनी श्रीवास्तव ने भी ऐसा ही एक ख़्वाब देखा और उसे सच करने के लिए कई मुसीबतों का सामना किया, बिना हार माने अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुई। अपने टैलेंट के दम पर टीवी पर आने वाले नामी सीरियल 'कुमकुम भाग्य', 'निमकी मुखिया', 'बेपनाह प्यार' और ‘एक महानायक बीआर आंबेडकर’ में काम कर पहचान बना रही हैं। पढ़ें चांदनी की कहानी, उन्हीं का जुबानी...

हर शहर में सीखी नई कला, डांस शो के लिए शूट किया तो लगा कैमरे का चस्का
मेरे पिता सेवानिवृत्त ग्रुप कैप्टन राकेश श्रीवास्तव एयरफोर्स में थे, इसलिए जब भी उनकी पोस्टिंग अलग शहर में होती तो मैं और मां भी उनके साथ नए सफर पर चल पड़ते। भले ही मैं एयरफोर्स कैंपस में पली-बड़ी हूं, मगर शहर के लोगों से जुड़ना और कुछ नया सीखने का हमेशा से शौक रहा।

स्कूल के दिनों को याद करती चांदनी ने बताया, ये उनकी 2nd क्लास की फोटो है।
स्कूल के दिनों को याद करती चांदनी ने बताया, ये उनकी 2nd क्लास की फोटो है।

चौथी क्लास में थी जब हम कानपुर में रहते थे। मैं कथक सीखने डांस क्लास जाती थी। एक रोज दूरदर्शन के एक डांस प्रोग्राम की शूटिंग के लिए कैमरामैन हमारी डांस क्लास में आए और मेरे गुरु ने मुझे डांस परफॉर्मेंस देने को कहा। मैं अच्छे से तैयार हुई और श्रीदेवी के सॉन्ग 'मेरे हाथों में नौ-नौ चूड़ियां हैं' पर डांस किया। यह पहली बार था जब मैंने कैमरे को फेस किया। बस उसी दिन से मैंने ठान लिया कि मुझे जिंदगी में क्या करना है, मुझे कैमरे के सामने ही रहना है।

इसी तरह केबल टीवी के लिए नागपुर के एयरफोर्स कैंपस में डौक्यूमैंटरी की शूटिंग हुई, तब मैं 6वीं कक्षा में थी और मुझे बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम करने का मौका मिला। एक्टिंग में दिलचस्पी बढ़ी और मैं स्कूल के थिएटर ग्रुप में शामिल हुई। बाद में दिल्ली के फेमस 'अस्मिता थिएटर' से एक्टिंग सीखी। पेरेंट्स को पता लगा कि मुझे आर्ट इंडस्ट्री में जाना है, तो उन्होंने भी मेरे पैशन को सपोर्ट किया। इसी तरह शहर बदलते रहे और मैं एक्टिंग के साथ कथक और भरतनाट्यम आदि आर्ट फॉर्म सीखती रही।

मैगजीन के लिए मॉडलिंग की, पैसे कमाए-पढ़ाई की, अपने खर्चे पर शूटिंग करने पहुंची
कुछ वर्षों बाद मैं परिवार के साथ दिल्ली शिफ्ट हो गई, यहां मैंने एक पब्लिकेशन हाउस के साथ जुड़कर कई ब्यूटी प्रोडक्ट्स जैसे हेयर ऑयल, शैंपू, फेस क्रीम आदि प्रोडक्ट के लिए मॉडलिंग की। इस दौरान मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी के आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज से बी कॉम की पढ़ाई कर रही थी। पढ़ाई जारी रही और मैंने म्यूजिक एल्बम व शॉर्ट फिल्म में काम करने की सोची। अपने छोटे-मोटे प्रोजेक्ट से पैसे इकट्ठे करती
और इन्हीं पैसों से ऑडिशन देने अलग-अलग शहर जाती। इसी तरह मुझे अपनी पहली शॉर्ट फिल्म में काम करने का मौका मिला। मैं अपने खर्चे पर हिमाचल प्रदेश गई, शूटिंग हुई मगर फिल्म रिलीज नहीं हुई। दुख तो बहुत हुआ, मगर तब लगा कि पहली बार में हो सकता है किस्मत साथ न दे। मैंने खुद को समझाया और दूसरी बार मैं आगरा एक फिल्म की शूटिंग करने पहुंची, वहां भी खुद की सेविंग्स से खर्चा किया। तय यह हुआ था कि फिल्म रिलीज होने के बाद पैसे मिलेंगे। मगर इस बार रिलीज से पहले ही प्रोड्यूसर की मौत हो गई और एक बार फिर मेरी मेहनत पर पानी फिर गया।

कॉलेज की पढ़ाई के साथ मॉडलिंग करती थी चांदनी, उसी की एक झलक।
कॉलेज की पढ़ाई के साथ मॉडलिंग करती थी चांदनी, उसी की एक झलक।

कंपनी सेक्रेटरी बनने का सफर किया शुरू
नाकामयाबी बार-बार मेरे दरवाजे पर आ खड़ी होती। मैं काफी निराश हुई, क्योंकि इसके बाद में जहां भी काम मांगने जाती वहां अपने एक्सपीरिएंस के तौर पर कुछ दिखा न पाती। इस बीच मैंने एक बार फिर अपना फोकस पढ़ाई पर करने की सोची, साथ ही मुंबई की भी तैयारी जारी रखी।

मैंने देश की सबसे कठिन कोर्स में से एक 'कंपनी सेक्रेटरी' की पढ़ाई शुरू की। करीब 4 से 5 साल सीएस की तैयारी के साथ-साथ मैंने एक्टिंग क्लासेस भी जारी रखे। बीच-बीच में मां के साथ मुंबई जाती। दो महीने की पढ़ाई एक महीने में करती ताकि ऑडिशन के लिए टाइम निकाल सकूं। इस तरह मैंने सीएस की पढ़ाई पूरी की। मैं इंस्टीट्यूट ऑफ कंपनी सेक्रेटरी ऑफ इंडिया की मेंबर हूं। अपने माता-पिता के लिए मैंने एक फूड बिजनेस भी शुरू किया है। मेरी गैरमौजूदगी में मेरे पेरेंट्स इसे संभालते हैं। हालांकि इसकी शुरुआत कोविड से पहले ही हुई है। मगर मेरे मुंबई के सफर की कहानी अभी बाकी है।

'परिणीति' टीवी सीरियल में चांदनी ने निभाया सेल्स गर्ल का किरदार।
'परिणीति' टीवी सीरियल में चांदनी ने निभाया सेल्स गर्ल का किरदार।

मुंबई में नहीं मिला काम तो पिता ने खुद किया फिल्म मेकिंग कोर्स, डॉक्यूमेंट्री बनाई तो मिले कई अवॉर्ड
मुझे मुंबई में कोई नहीं जानता था, इसलिए काम मिलना बहुत मुश्किल था। कई जगह ऑडिशन दिए मगर कहीं से भी जवाब नहीं मिला। इसी तरह दिन बीतते गए, जितने पैसे बचे थे वह भी खत्म हो रहे थे। अंत में मुझे वापस घर आना पड़ा। माता-पिता तो कुछ नहीं कहते, लेकिन दोस्त रिश्तेदार ताने सुनाते कि 'माता-पिता के पैसे क्यों बर्बाद कर रही हो, अब ये जिद छोड़ दो। तुम्हें काम नहीं मिलेगा।' मैं अंदर से टूटती जा रही थी कि मेरे पिता ने मुझे बहुत अलग तरीके से सपोर्ट किया। उन्होंने मेरी ख़ातिर फिल्म मेकिंग का कोर्स किया और साल 2012 में अपनी पहली शॉर्ट फिल्म ‘रेड लाइट, ग्रीन लाइट’ बनाई। इस फिल्म में मैंने काम किया और बाद में इस फिल्म को कई फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया। क्रिटिक्स से भी तारीफ मिली और मुंबई शॉर्ट्स इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल-2012 अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। बस यहीं से मेरी गाड़ी पटरी पर आना शुरू हो गई।

भारतीय सोशल एंटरप्रेन्योर बिंदेश्वर पाठक ने 'फूंक' शॉर्ट फिल्म में चांदनी के काम के लिए 2014 में सम्मानित किया।
भारतीय सोशल एंटरप्रेन्योर बिंदेश्वर पाठक ने 'फूंक' शॉर्ट फिल्म में चांदनी के काम के लिए 2014 में सम्मानित किया।

स्वच्छ भारत अभियान प्रोजेक्ट में किया काम, टीवी सीरियल में मिलने लगा काम
मैंने भारत सरकार के स्वच्छ भारत प्रोजेक्ट के एडवर्टाइजमेंट में काम किया। मुझे एक बार फिर काम मिलने लगा, मैं वापस मुंबई पहुंची और इस बार टीवी सीरियल के जरिए अपनी जगह बनाने की कोशिश की। 2019 में पहली बार 'मेरे साई' धारावाहिक में कैमिओ रोल के साथ मेरे करियर री-स्टार्ट हुआ। इसके बाद कई टीवी सीरियल 'कुमकुम भाग्य', 'निमकी मुखिया', 'बेपनाह प्यार' और ‘एक महानायक बीआर आंबेडकर’ में काम किया और अभी भी सफर जारी है।