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ये मैं हूं:जुनून ऐसा कि 15 की उम्र में छोड़ दिया घर, एम्स से निराश सैकड़ों मरीजों को दी 'जीवन की आस'

नई दिल्ली5 महीने पहलेलेखक: दीप्ति मिश्रा
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उम्र 84 लेकिन जज्बा 24 साल जैसा है। बेहद एक्टिव, तेज दिमाग, शालीन व्यवहार और चेहरे पर मुस्कुराहट। उनकी असमिया टोन में लपेट कर बोली गई हिंदी सुनने वालों को मधुर संगीत सी लगती है। अब तक न कोई दवाई खाई और न सुई लगवाई। बाली उम्र में महात्मा गांधी से प्रभावित होकर प्राकृतिक चिकित्सा की राह पकड़ी तो पूरा जीवन इसके प्रचार-प्रसार और रोगियों की सेवा में लगा दिया। भारत सरकार ने नेचुरोपैथी के प्रचार-प्रसार के लिए जब ब्रांड एंबेसडर बनाकर विदेशी धरती पर भेजा तो वहां मजाक भी बना। हंसते हुए लोग कहते थे, ' भारत से आई सूती साड़ी वाली डॉक्टर मिट्टी पानी से इलाज करेगी! मिट्टी पानी से भी इलाज होता है क्या?' लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। यही वजह है कि नेचुरोपैथी डॉ. सोने प्रभा वर्मा को ढेरों सम्मान मिले। हाल ही में इंटरनेशनल नेचुरोपैथी ऑर्गेनाइजेशन ने आयुष मंत्रालय के सहयोग से एक कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें डॉ. सोने प्रभा वर्मा को अमृत कौर अवार्ड से नवाजा है।

भास्कर वुमन से बातचीत में डॉ. सोने प्रभा ने यादों की गठरी को टटोलते हुए बताया कि मैं असम के डिब्रूगढ़ जिले के एक छोटे से गांव नाहसाकु में पैदा हुई। 6 भाई और 8 बहनों में से मैं 5वें नंबर की हूं। मेरे पिता माणिकचंद्र गोगोई पेशे से अमीन थे। उनके पास अच्छी खासी खेती थी। इतना बड़ा परिवार था, लेकिन किसी तरह की कमी नहीं थी। मुझे लगता है कि उसकी वजह शायद हम सबकी जरूरतों का कम होना था। पढ़ाई के लिए तीन किलोमीटर पैदल जाना पड़ता था। बारिश में पानी भर जाता था तो नंगे पैर पानी में घुसकर पहुंचने का रास्ता तय करती थी।

विरोध प्रदर्शन में याद आया मिट्टी से नाता
साल 1955 की बात है। मैंने 10वीं की परीक्षा दी थी। उन्हीं दिनों हमारे गांव के पास एक ऑयल रिफाइनरी बनाई जा रही थी। वहां रह रहे लोगों को दूसरी जगह शिफ्ट किया जा रहा था। छात्र और युवा इसके विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शन चल रहा था। दूसरी ओर खुदाई शुरू हो गई थी। खुदाई से निकलती मिट्टी के ढेर को देखकर न जाने क्यों मेरा मन भर सा आया। लगा कि धरती का सीना चीरों पानी मिलता है। बीज डाल दो तो अनाज मिलता है। जीने लेकर मरने तक हमारा मिट्टी से इतना गहरा नाता है तो फिर इस मिट्टी में हमें स्वस्थ रखने का इलाज भी होगा।

इंटरनेशनल नेचुरोपैथी ऑर्गेनाइजेशन की ओर से अवार्ड ग्रहण करतीं डॉ. सोने प्रभा वर्मा। फाइल फोटो
इंटरनेशनल नेचुरोपैथी ऑर्गेनाइजेशन की ओर से अवार्ड ग्रहण करतीं डॉ. सोने प्रभा वर्मा। फाइल फोटो

हिंदी नहीं जानती थी तो संस्कृत बनी सहारा
फिर क्या था- मैंने असम में ही एक गांधी आश्रम को अपना ठिकाना बनाया, लेकिन जो मुझे चाहिए था, वो वहां नहीं मिल पाया। स्वतंत्रता सेनानी नारायण मुझे बिहार के पूर्णिया जिले में स्थित रानी पात्रा नेचर केयर आश्रम ले आए। 15 साल की उम्र में घर-परिवार और अपना गांव छोड़ मैं यहां नेचुरोपैथी की ट्रेनिंग लेने लगी। मैं हिंदी नहीं जानती थी। संस्कृत पढ़ी थी, उसी से काम चलाती थी। फिर धीरे-धीरे हिंदी सीखी। हालांकि, टोन आज भी असमिया ही है। स्वतंत्रता सेनानी नारायण व आश्रम के कई अन्य लोगों ने मेरी शादी आश्रम के स्वयंसेवी वीरेंद्र कुमार वर्मा से करवा दी। मेरी शादी में मेरा परिवार नहीं आ पाया। उस वक्त आने-जाने की सुविधा अभी जैसी नहीं थी। 17 साल की उम्र में मैं प्रेग्नेंट हो चुकी थी। मैं अपनी डिलीवरी नेचर केयर तरीके से ही कराना चाहती थी।

'मां-पापा को आखिरी बार देखने से ज्यादा जरूरी थी मरीजों की देखभाल'
डॉ. सोने प्रभा बताती हैं कि मैं अपने मां-पापा, भाई और बहनों के मरने पर नहीं जा पाईं। उनको आखिरी बार देख भी नहीं पाई क्योंकि उस वक्त मेरे लिए मरीजों की देखभाल करना ज्यादा जरूरी था।

विनोबा भावे ने सिखाया मरीजों की सेवा करना
पुणे स्थित विनोबा भावे के आश्रम में पत्र लिखकर वहां आकर प्राकृतिक चिकित्सा सीखने की अनुमति मांगी। विनोबा भावे ने मुझे बुला भी लिया और प्राकृतिक चिकित्सा भी सिखाई। वहां सब सन्यासी और स्वयंसेवा रहते थे। लाइफस्टाइल बहुत हेक्टिक थी। करीब 6 महीने वहां रही। इसके बाद विनोबा भावे ने कहा कि यहां पर प्रसव में बहुत मुश्किल होगी, इसलिए तुम्हें हैदराबाद जाना चाहिए। इसके बाद मैंने हैदराबाद के एक संस्थान में दो साल का कोर्स किया। मैंने बड़े बेटे को हॉस्टल में ही जन्म दिया था। बाद में मैंने अपने पति को भी हैदराबाद बुला लिया। वो मेरे जूनियर बनकर नेचुरोपैथी सीखने लगे। बाद में हम दोनों बिहार लौट आए और आश्रम में मरीजों की देखभाल करने लगे।

अमृत कौर अवार्ड के साथ डॉ. सोने प्रभा। फाइल फोटो
अमृत कौर अवार्ड के साथ डॉ. सोने प्रभा। फाइल फोटो

सरकार ने ब्रांड अंबेसडर बना भेजा नेपाल
साल 1969 में भारत सरकार की ओर से मुझे और मेरे पति को प्राकृतिक चिकित्सा का ब्रांड अंबेसडर बनाकर नेपाल भेजा। शुरुआत में वहां के लोगों ने मेरा और मेरे परिवार का खूब मजाक बनाया। लोग कहते- सूती साड़ी पहन मिट्टी-पानी से इलाज करेंगी। मिट्टी पानी से भी इलाज होता है क्या? करीब तीन साल काठमांडू में छात्रों को चिकित्सा सिखाई। सैकड़ों मरीजों का इलाज किया। उसके बाद मैंने फैसला लिया कि जो भी करेंगे अब वो अपने देश में और अपने देशवासियों के लिए करेंगे। इसके कुछ दिनों बाद ही हम दिल्ली लौट आए।

जब बात बराबरी और स्वाभिमान की आई तो छोड़ दिया आश्रम
स्वदेश लौटकर हरियाणा बॉर्डर पर एक आश्रम में मैं और मेरे पति सेवा करने लगे। पति मरीजों की देखरेख करते। मैं मरीजों की देखरेख करने के साथ ही उनके खाने-पीने की व्यवस्था करती। उनकी बेडशीट चेंज करती और पुरानी बेडशीट धोती। लेकिन मेरे पति समेत वहां काम कर रहे सभी पुरुषों को 350 रुपये और मुझे 250 रुपये ही मिलते थे। यह बात मुझे नागवार गुजरी। मैंने इस बात का विरोध किया, जब उन्होंने नहीं सुनी तो मैं अपनों बच्चों को लेकर असम चली गई। कुछ महीनों बाद मेरे पति भी आश्रम छोड़ असम आ गए।

सिलीगुड़ी और ठाकुरगंज में बनाया चिकित्सालय
उसके बाद सिलीगुड़ी में नदी के किनारे एक प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र खोला। जहां रोगियों का इलाज करना शुरू किया। हमारे पास संसाधन कम थे, इसलिए नदी के पानी और मिट्टी को इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। वहां का केंद्र ठीक से काम करने लगा। इस बीच, स्वतंत्रता सेनानी नारायण ने बिहार के ठाकुरगंज में जमीन दान में दी, जिस पर हमने एक प्राकृतिक चिकित्सा का केंद्र खोला, जहां अब तक हजारों मरीजों का इलाज किया गया।

डॉ. सोने प्रभा वर्मा के निजी जीवन की बात करें तो वे अकेली रहती हैं। आज भी खुद से उगाई सब्जियां और फल खाती हैं। ऑर्गेनिक तरीके से खुद ही अनाज उगाती है और उसी से बना खाना खाती हैं। गाय पालती हैं, जिनका दूध और दूध से बनी छाछ ही पीती हैं।