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मेघा परमार ने बताई एवरेस्ट फतह के पीछे की कहानी:‘पीने को पानी नहीं, सांस लेने को ऑक्सीजन नहीं, लाशों के ऊपर से गुजरता है सफर’

2 महीने पहलेलेखक: मीना
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मध्यप्रदेश के सीहोर जिले के छोटे से गांव जहां आबादी 100 घरों में 1500 घरों में सिमट जाती है, वहां मेरा जन्म हुआ। एक ऐसे घर में जन्मी जहां डिलेवरी के समय डॉक्टर नहीं दाई मां को बुलाया जाता है। मेरे पैदा होने पर खुशी की ढोलक नहीं बजी, सोहर नहीं गयाा बल्कि सगाई कर दी गई। थोड़ी बड़ी हुई तो मां-बाप के घर में ही ‘अच्छी बहू’ बनने की ट्रेनिंग दी जाने लगी। चूल्हे में रोटियां बनाते हुए एक दिन चिंगारी ऐसी निकली की सीधे माउंट एवरेस्ट पर जाकर रुकी और मैं मध्यप्रदेश की पहली ऐसी लड़की बन गई जिसने सबसे ऊंचा पर्वत एवरेस्ट पर झंडा फहराया। हम बात कर रहे हैं 22 मई 2019 को एवरेस्ट पर फतह पाने वाली 26 साल की पर्वतारोही मेघा परमार की।

मेघा परमार
मेघा परमार

भास्कर वुमने से बातचीत में मेघा बताती हैं, घर में छह बुआ, हम तीन बहनों की वजह से लड़कियों की कोई पूछ नहीं थी। एक छोटा भाई जिसकी खूब सेवा पानी होते देखी। उसे घी लगी चुपड़ी रोटी मिलती और हमें रूखी सूखी। मां को रक्षाबंधन और तीज के समय ही घर से बाहर निकलते देखा। इस सब गैरबराबरी का जवाब पापा से मांगती तो ‘बेटे घर का नाम रोशन करते हैं, बेटियां ससुराल चली जाती हैं।’ जैसा जवाब मिलता। यह बात मुझे चुभ गई और पापा की नजरों में नाम रोशन करने वाली बेटी बनने की ठान ली। गांव में एक स्कूल था जो 12वीं तक की पढ़ाई नहीं कराता था। मामा के यहां से 12वीं पास करके लौटी तो शादी की तैयारी की जाने लगी। इसी बीच छोटे भाई को पढ़ने के लिए सीहोर जाना पड़ा। उसके लिए रोटियां बनाने के लिए मुझे साथ भेजा गया। हैंडपंप से 14, 15 कुप्पी पानी भरकर लाते समय मैं गर्ल्स कॉलेज को देखती और वहां पढ़ने का सोचती। जल्द ही वहां दाखिला ले लिया। ग्रेजुएशन के दौरान स्पोर्ट्स एक्टिविज में पार्टिसिपेट किया। यहां एनएसएस की वॉलेंटियर होने की वजह से दो गांवों को LED युक्त करवाया और मालदीव में भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। अपनी ‘सीमा’ लांघने का ये पहला मौका था, लेकिन मुझे नहीं मालूम था कि आगे मेरे लिए आगे कुछ और रास्ते बनने वाले हैं।

खबर पढ़कर मिली एवरेस्ट पर जाने की प्रेरणा
भोपाल से एमएसडब्लू किया और अभी पीएचडी में दाखिला लिया। भोपाल आने के बाद पहले ही दिन पेपर में पढ़ा की मध्यप्रदेश के दो लड़को ने माउंट एवरेस्ट पर फतह हासिल की है। इसी वक्त दिमाग में क्लिक हुआ कि जब ये लड़के एवरेस्ट पर जा सकते हैं तो मैं क्यों नहीं। मेरे भी दो हाथ और पैर हैं। जिद्दी थी तो पापा को भी मना लिया और माउंट क्लाइंबिंग की ट्रेनिंग के लिए मनाली पहुंच गई। स्पॉन्सरशिप के लिए मंत्रियों के दफ्तर के चक्कर काटे और पहली बार 2018 में माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई की। अभी तक जो चुनौतियां मैंने झेली थीं एवरेस्ट की चढ़ाई के आगे वो कुछ नहीं थीं।

रात में करते हैं क्लाइंबिंग

यहां दो-दो किलो जूते पहनकर कंधों पर 25 किलो का बैग लादकर चढ़ाई की। जितनी ऊंचाई पर जाते हैं उतना ऑक्सीजन कम होते जाता है। रात में क्लाइंबिंग करते हैं, क्योंकि बर्फ सख्त हो जाती है। यह चढ़ाई चार कैंपों से होती है। पहली चढ़ाई बेस कैंप से शुरू होती है। जहां आप दाल-चावल, नॉन वेज सब पका सकते हैं, खा सकते हैं। कैंप 1 पर बर्फ और सख्त हो जाती है। पीने को पानी नहीं मिलता। डिहाइड्रेशन के कारण होंंठ फटने लगते हैं, बॉडी का टैंपरेचर इतना गिर जाता है कि शरीर के अंग जम जाते हैं और स्थितियां उन्हें काटने तक की आ जाती हैं। बॉडी टेंपरेचर गिरने की वजह से हलुसनेशन्स होने लगते हैं मतलब जो आपके सामने नहीं है, वह भी दिखने लगता है। खाने को कुछ नहीं होता, खून की उल्टियां होने लगती हैं।

जब कैंप दो और तीन पार करने के बाद कैंप चार की बारी आती है तब यहां मौत सामने दिखाई देती है। यहां पहुंचने पर लड़कियों के चैलेंज और बढ़ जाते हैं। हमारे हार्मोन्स में ऐसे बदलाव आते हैं कि मुझे एक बार में पांच दिन पीरियड्स होते हैं, लेकिन वहां पहुंचने पर छह दिन, चार दिन, सात दिन कितने भी हो सकते हैं। कैंप चार पर ऑक्सीजन की इतनी कमी हो जाती है कि सिलेंडर के सहारे जी पाते हैं। यह इतना मुश्किल वक्त होता है कि शरीर अंदर से टूट जाता है। यहां चढ़ाई के दौरान बहुत सी लाशें बर्फ में ढंकी थीं। दिल पसीज रहा था, डेड बॉडीज के ऊपर चढ़कर आगे बढ़ना पड़ा। चार से दिन से कुछ खाया नहीं था और दो दिन से कुछ पीया नहीं था। शरीर में अब आगे बढ़ने की नहीं बची थी। मौसम खराब हो रहा था। टीम ने कहा चढ़ाई तो कर लेंगे लेकिन जिंदा वापस नहीं लौटेंगे। इस वजह से चढ़ाई आधे रास्ते में छोड़नी पड़ी और घर वापस आना पड़ा। सिर्फ 700 मीटर की चढ़ाई छोड़कर हमें वापस आना पड़ा।
पहली बार में नहीं मिली सफलता
मैं वापस आई वापस एवरेस्ट पर जाने की तैयारी फिर से शुरू की। ट्रेनिंग के लिए मनाली इंस्टीट्यूट पहुंच गई। ट्रेनिंग के दौरान ही आर्टिफिशियल माउंट क्लाइंबिंग करते समय रस्सी छूटने के कारण मैं 12 फीट नीचे जा गिरी और रीढ़ की हड्डी में तीन फ्रैक्चर आ गए। मनाली हॉस्पिटल से आकर मैंने ट्रेनिंग पूरी की। एक पर्वतारोही के लिए चुनौतियां हर पल हर वक्त रहती हैं। दूसरी बार की चढ़ाई के दौरान ऐसा भी वक्त आया जब मेरे सिलेंडर में ऑक्सीजन खत्म हो गई थी। इस पल लगा कि सब कुछ खत्म। मौत बिल्कुल मेरे करीब थी। ऐसा लगा कि यमराज ने हाथ पकड़ लिया हो। मैंने पीछे से आ रहे शेरपा से मदद मांगी। शेरपा ने चढ़ाई के दौरान रास्ते में मृत पड़े किसी पर्वतारोही का सिलेंडर उठाने के लिए कहा। सिलेंडर में बस इतनी ही ऑक्सीजन बची थी कि उससे जान बचाई जा सके। वही सिलेंडर मेरे लिए वरदान साबित हुआ और फिर 22 मई की सुबह 5 बजे मैंने माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराया।

माउंट एवरेस्ट फतह करने में मुझे जो मुश्किलें आईं, वो परेशानियां आगे किसी और को न झेलनी पड़े उसके लिए मैं खेल विभाग के साथ सहयोग करके बच्चों को क्लाइबिंग और एवरेस्ट फतह करने के गुण सिखाती हूं। रूस के माउंट एल्ब्रस, तंजानिया का माउंट किलीमंजारो और ऑस्ट्रेलिया का कोस्किउस्ज़्को को फतह करने वाली मध्यप्रदेश की पहली लड़की हूं। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की ब्रैंड एंबेसडर भी हू। अब कई राष्ट्रीय और राज्यीय अवॉर्ड्स से सम्मानित हूं। एवरेस्ट की चढ़ाई के दौरान जिस तरह की चुनौतियां देखीं उससे यही सीख मिली कि जब आप किसी चीज को शिद्दत से चाहते हैं तो कुदरत भी आपका साथ देती है। जब मैं जिंदगी और मौत के बीच में थी तो खुद से दो वादे किए थे। एक तो यह कि मैं बहुत सारे पौधे लगाऊंगी और दूसरा यह कि लोगों की हरसंभव मदद करूंगी।

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