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'मोदी जी की बेटी' फिल्म ला रहीं अवनि मोदी:मधुर भंडारकर ने रिजेक्ट किया, फिर उन्हीं की फिल्म से बॉलीवुड में एंट्री

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: ऐश्वर्या शर्मा
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मेरा नाम अवनि मोदी है। मैं गुजरात के गांधीनगर से हूं। परिवार में मैं पहली शख्स हूं जिसने एक्टिंग को अपना करियर चुना। हालांकि बिना फिल्मी बैकग्राउंड के मुझे भी इस इंडस्ट्री में स्ट्रगल करना पड़ा। मैं रोई, टूटी-बिखरी, मायूस भी हुई, लेकिन मेरा परिवार मेरी हिम्मत बना रहा।

मैं ‘मोदी जी की बेटी’ फिल्म की हीरोइन हूं। इस फिल्म के साथ मैंने राइटर और प्रोड्यूसर के तौर पर डेब्यू किया है। हालांकि मेरी पहली हिंदी फिल्म मधुर भंडारकर की ‘कैलेंडर गर्ल्स’ थी।

बचपन से ही बनना चाहती थी हीरोइन

मैं पढ़ाई में हमेशा अच्छी रही हूं, लेकिन मुझे बचपन से ही एक्ट्रेस बनना था। मैं एक मिडिल क्लास फैमिली से ताल्लुक रखती हूं।

मां हाउसवाइफ हैं और पापा सरकारी नौकरी में थे। फैमिली में दूर-दूर तक कोई फिल्म इंडस्ट्री से नहीं जुड़ा था। मुझे इस बात का डर था कि अगर मेरी फैमिली इस फैसले का सपोर्ट नहीं करेगी तो मैं क्या करूंगी।

लेकिन उससे पहले मैं खुद भी देखना चाहती थी कि मैं एक्टिंग कर भी सकती हूं या नहीं। इसके लिए मैंने अपने कॉलेज में थिएटर ग्रुप जॉइन किया। वहां मुझे मजा आने लगा और मैंने एक्ट्रेस के तौर पर खुद को पहचाना। मुझे एक्टर के तौर पर उभारने का श्रेय अहमदाबाद के एचएल कॉलेज ऑफ कॉमर्स को जाता है।

प्रिंसिपल ने चैनल को दिया मेरा फोन नंबर

उस समय ई टीवी गुजराती अपने एक चैट शो के लिए एंकर ढूंढ रहा था। इसके लिए गुजरात के हर कॉलेज में ऑडिशन हो रहे थे। तो चैनल ने मेरे कॉलेज से भी संपर्क किया।

ऐसे में प्रिंसिपल ने कहा कि हमारे कॉलेज में तो एक अवनि मोदी ही हैं जो ड्रामा में एक्टिव हैं और कॉम्पिटिशन में भाग लेकर कई मेडल जीते हैं। बाकी स्टूडेंट्स का फोकस तो सीए बनने पर है। तो कोई इसमें रुचि नहीं दिखाएगा। उन्होंने मेरा नंबर चैनल को दे दिया।

मुझे चैनल से कॉल आया। मैं ऑडिशन देने चली गई और मुझे शो मिल गया। यह शो अहमदाबाद में ही शूट होता था। तो मैं रोज सुबह 6 बजे शूटिंग करती और दोपहर में कॉलेज जाती। धीरे-धीरे लोग मुझे पहचानने लगे। तारीफ मिलती तो खुशी भी होती थी। टीवी पर दिखती तो मेरे पेरेंट्स को भी गर्व होता।

पापा को बताया अपना सपना

जब कॉलेज खत्म हुआ तब मैंने पापा को बोला कि मुझे एक्टर बनना है। मुझे डर था कि शायद मना कर दें, लेकिन उन्होंने कहा कि मुंबई चली जाओ। गुजरात में रहकर तुम्हें मौका नहीं मिल पाएगा। मां ने भी मुझे बहुत सपोर्ट किया।

मैं 2011 में मुंबई पहुंची। वहां मेरी मौसी रहती थीं तो कुछ महीने मैं उनके घर रही। वैसे तो बचपन में जब स्कूल की छुट्टियां होती तो मैं मौसी के घर ही जाती थी। उस समय जब मौसाजी फिल्म एक्टर्स के बंगले दिखाते तो मेरे मन में आता कि मुझे इसी शहर में वापस आना है।

बाद में मैं पीजी में शिफ्ट हो गई क्योंकि मौसी का घर अंधेरी, जुहू, गोरेगांव, बांद्रा जैसे इलाकों से दूर पड़ता था और ऑडिशन के लिए मुझे इन्हीं इलाकों में आना होता था।

अवनि मोदी के पिता सरकारी नौकरी में थे। अब वह रिटायर हो चुके हैं।
अवनि मोदी के पिता सरकारी नौकरी में थे। अब वह रिटायर हो चुके हैं।

छोटे शहर से मुंबई आकर एडजस्ट होना एक चुनौती था

मुझे मुंबई में एडजस्ट होने में काफी समय लगा। गुजरात के छोटे से शहर गांधीनगर और मुंबई जैसी मेट्रो सिटी की लाइफस्टाइल में बहुत फर्क है। लोकल ट्रेन में चढ़ना और उतरना अपने आप में एक चुनौती है। मुंबई में अलग-अलग शहरों के लोग रहते हैं और यह शहर अपनी ही रफ्तार से दौड़ता है। लेकिन गांधीनगर में मैंने अपने आसपास केवल गुजराती लोग ही देखे थे।

फिर फिल्म इंडस्ट्री में घुसना भी एक चुनौती था। इस माहौल में एडजस्ट होने में मुझे डेढ़ साल लग गए।

ऑडिशन में रिजेक्ट होने पर पापा देते अमिताभ बच्चन का उदाहरण

मैंने मुंबई में गुजराती ड्रामों में काम करना शुरू किया। इसके साथ ही मैं रैंप पर मॉडलिंग, टीवी और प्रिंट ऐड भी करती रही। मुंबई जैसे शहर में रहने के लिए पैसा बहुत जरूरी है और मैं कोई अमीर परिवार से तो हूं नहीं, तो जो काम मिलता मैं करती थी।

इस बीच, वीनस कंपनी में मेरा सिलेक्शन हुआ और मुझे अल्ताफ राजा की वीडियो एल्बम में काम करने का मौका मिला लेकिन बॉलीवुड हीरोइन बनना अभी भी आसान नहीं था। मैं हर रोज कास्टिंग डायरेक्टर्स से मिलती और टैलेंट मैनेजमेंट कंपनी के चक्कर लगाती। कई ऑडिशन दिए और बहुत बार रिजेक्ट हुई।

उस समय मैं बहुत रोती थी। तब पापा मुझे समझाते कि अमिताभ बच्चन को देखो, कितनी बार उनकी फिल्म फ्लॉप हुईं। यह तुम्हारे साथ नया नहीं हो रहा है। सबके साथ ऐसा होता है। शुरुआत में असफलता देखनी ही पड़ेगी। हिम्मत मत हारो। कोशिश करती रहो।

अवनि ने इंटरनेशनल शॉर्ट फिल्म 'गुलाब' में भी काम किया। इस फिल्म को कनाडा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फिल्म का अवॉर्ड मिल चुका है।
अवनि ने इंटरनेशनल शॉर्ट फिल्म 'गुलाब' में भी काम किया। इस फिल्म को कनाडा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फिल्म का अवॉर्ड मिल चुका है।

तमिल फिल्म में मिला पहला ब्रेक

मुझे पहला ब्रेक तमिल फिल्म 'नान राजवागा पोजिरेन' से मिला जो 2013 में रिलीज हुई। इसके बाद मैंने कुछ तेलुगू फिल्में कीं।

तमिल फिल्म भी मुझे चांस से ही मिली। मैं एक कास्टिंग एजेंसी में अपनी फोटोज देने गई थी। वहां ऐड फिल्म के लिए ऑडिशन था। जो कास्टिंग करते थे उन्होंने मेरी लुक्स को देखकर सुझाव दिया कि मैं साउथ की फिल्मों में काम करूं। तो मैंने कहा कि वहां की इंडस्ट्री में कैसे काम होता है मुझे नहीं पता।

मुझे तो भाषा भी नहीं आती। तो उन्होंने कहा कि जो हीरोइन वहां काम कर रही हैं वो कौन-सी साउथ इंडिया की हैं, वो भी नॉर्थ से हैं। मेरे राजी होने के बाद उन्होंने मेरे फोटोज तमिल-तेलुगू इंडस्ट्री में भेजीं।

वहां से एक डायरेक्टर मुंबई आए और उन्होंने मेरा ऑडिशन लिया। उन्होंने एक सिचुएशन दी और कहा कि आप जिस भाषा में कम्फर्टेबल हैं, उसमें एक्टिंग करें। उन्होंने कोई स्क्रिप्ट नहीं दी थी।

थिएटर में मैंने बिना स्क्रिप्ट के ही ऐसी कई एक्टिविटी की थीं तो यह मेरे लिए मुश्किल नहीं था। मेरा फिल्म के लिए सिलेक्शन हो गया।

मधुर भंडारकर ने पहले रिजेक्ट किया, फिर सिलेक्ट

साउथ की फिल्मों में काम करने के साथ ही मैं बॉलीवुड में भी अपनी किस्मत आजमा रही थी। मुझे पता चला कि मधुर भंडारकर अपनी फिल्म 'कैलेंडर गर्ल्स' के लिए नई चेहरे की तलाश कर रहे हैं। मैं उनसे मिली, तब उन्होंने मुझे रिजेक्ट कर दिया।

मैं फिर उनसे मिली और कहा कि आप मुझे ऑडिशन देने का मौका दीजिए। मैंने मजाक में उनसे कहा कि आप परफॉर्मेंस देखकर बता दीजिए कि मैं बॉलीवुड के लायक हूं या नहीं। तो उन्होंने मेरा 3 राउंड में ऑडिशन लिया और फिर मेरा सिलेक्शन हुआ।

अवनि मोदी को 'बाल गंगाधर तिलक अवॉर्ड' से नवाजा गया।
अवनि मोदी को 'बाल गंगाधर तिलक अवॉर्ड' से नवाजा गया।

'मोदी जी की बेटी' फिल्म की कहानी मैंने लिखी

14 अक्टूबर को रिलीज हो रही 'मोदी जी की बेटी' फिल्म मेरे प्रोडक्शन हाउस की पहली फिल्म है। मैं इसकी एक्टर, प्रोड्यूसर और राइटर हूं। यह एक निडर लड़की की कहानी है जिसे कॉमिक अंदाज में पेश किया गया है।

मेरे दिमाग में कई कहानियां आती रहती हैं। उनमें से यह भी एक कहानी थी। मैंने इस फिल्म के डायरेक्टर एडी सिंह को आइडिया बताया तो उन्होंने कहा कि तुम इसकी स्क्रिप्ट लिखो।

इसे लिखते हुए मैंने सीखा कि फिल्म की स्क्रिप्ट राइटिंग कैसे होती है। मेरा मानना है कि खुद को कभी एक सीमा में मत बांधकर रखो।

हालांकि लिखने का शौक मुझे बचपन से है। मैं कॉलेज में कविताएं लिखती थी। मुझे खुशी है कि भगवान ने मुझे एक आर्टिस्ट बनाया और मैं खुद को लकी मानती हूं कि प्रोड्यूसर के तौर पर मुझे अपनी टीम से अच्छा सपोर्ट मिला।

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