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कलाकार का मन:क्या आप किसी कैरेक्टर इलस्ट्रेटर को जानते हैं?

एक महीने पहलेलेखक: मीना
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कहते हैं एक औरत के मन की थाह तक नहीं पहुंच सकते, लेकिन अपराजिता शर्मा एक महिला के मन की उमड़न-घुमड़न, उसकी राजनीतिक समझ, गुस्सा, खुशी, दुख, गम, खीझ, ठहाके वाली हंसी, झुंझलाहट, उत्सव सब कुछ हिमोजी, अलबेली और चित्रगीत के जरिए उकेरती हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस में हिंदी की प्रोफेसर ने बचपन में कभी नहीं सोचा था कि भविष्य में वे कैरेक्टर इलस्ट्रेटर के नाम से भी जानी जाएंगी। बचपन से सफेद कागजों को रंगों से भरने का शौक तो था, लेकिन यही शौक एक दिन अभिव्यक्ति का सार्थक माध्यम बन जाएगा, ये कभी नहीं सोचा था। मुझे लगता है, जब शब्द जब कम पड़ने लगते हैं तब अभिव्यक्ति का माध्यम कला बनती है। भास्कर वुमन से हुई खास बातचीत में उन्होंने बताया, ‘मुट्ठी भर उजियारे की तलाश में मैंने अपनी कला को फेसबुक पर पोस्ट करना शुरू किया तो लोगों का खूब प्यार मिला। सोशल मीडिया की यही खासियत है कि आपके काम को सराहना मिलती है , तो काम करने की क्षमता बढ़ती है।

अपराजिता शर्मा
अपराजिता शर्मा

‘हिमोजी’ से हुई शुरुआत
2016 का साल था, जब मैंने हिंदी में चैट स्टिकर बनाने शुरू किए थे, जिसे हिमोजी नाम दिया। ये हिमोजी लोगों को इतने पसंद आए कि देश ही नहीं विदेश से भी संदेश आने लगे। एक दिन इटली से एक ग्रुप का संदेश मिला जो हिंदी चैट स्टिकर के इस्तेमाल को लेकर इतने उत्साहित और खुश थे कि हर दिन उन्हीं स्टिकर के साथ ग्रुप में बातचीत करते। संदेश में लिखा था, ‘कितने लम्बे अरसे बाद हम हिंदी में लिखे संदेश भेज रहे हैं, पढ़ रहे हैं और हमारे बच्चों को भी हिंदी के यह स्टिकर इतने पसंद आ रहे हैं कि वे इसको इस्तेमाल कर रहे। इन स्टिकर से मिलना, यहां इटली में बैठ कर हिंदुस्तान से मिलना है।’ आज भी जब ऐसे प्रोत्साहन भरे मेसेज पढ़ती हूं तो मन ऊर्जा से भर जाता है।

अब लगता है कि एक शिक्षक बनकर मैं किसी विचारधारा की पक्षकार नहीं बन सकती, लेकिन एक कलाकार की बात को लोग स्वीकार करते हैं। लोग मुझे मेरे बने हिमोजी भेजते हैं, उन्हीं से चैट करते हैं। इन चैट स्टिकर के सहारे आप हिंदी में धत्त तेरी की, कहब तो लग जाई धक्क से, हम हक से मांगें, धन्यवाद, हम्म, वाह-वाह... सब कुछ कह सकते हैं। यही नहीं, आप ‘अपना टाइम आएगा’ रणवीर सिंह का डायलॉग भी हिमोजी के जरिए अपने दोस्तों या परिजनों को भेज सकते हैं। लोगों को मेरे ये हिमोजी इतने पसंद आए कि अब हिमोजी नाम का एक ऐप है। जिसे आप प्लेस्टोर से डाउनलोड करके रंगे-बिरंगे और मनमौजी हिमोजी शेयर कर सकते हैं। कैरेक्टर इलस्ट्रेशन कार्टून से इतर गहरे सवालों, अवसाद और सामाजिक निषेधों पर बात करता है, इसलिए ये काम जितना रोचक है उतना ही गंभीर भी।

कैरेक्टर इलस्ट्रेशन की नहीं ली कोई फॉर्मल ट्रेनिंग
आज उम्र 40 हो गई है। परिवार में ज्यादातर लोग टीचिंग प्रोफेशन में हैं। यही वजह रही कि मैंने भी पढ़ाना शुरू किया, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि मुझे पढ़ाना पसंद नहीं है, जबकि सच यह है कि हिंदी साहित्य पढ़ाने की वजह से मुझे मेरी कला को शब्द देने में मदद मिली। मैंने कैरेक्टर इलस्ट्रेशन की कोई फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं ली, क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि कला चुनना किसी के हाथ में नहीं होता,वो आपके भीतर छुपी होती है। वो किस समय से उभर जाए,आपको पता नहीं होता। मेरे भीतर ये कला बचपन से थी, लेकिन हमारे समाज में एक सवाल रहता है कि आर्टिस्ट तो सही है,लेकिन कमाई क्या होगी? मैं एंडोमेट्रियोसिस का भी शिकार रही, जिसकी वजह से घर के आसपास ही काम देखना पड़ा। इस वजह से भी कैरेक्टर इलस्ट्रेशन में पूरी तरह से करिअर नहीं बना पाई और टीचिंग को बतौर नौकरी अपनाया। मेरे भीतर बैठा कलाकार दर्द में, खुशी में,सवाल करने के लिए और जवाब देने के लिए भी निकला, इसलिए भीतर का कलाकार हमेशा जिंदा रहा।

'अलबेली' के जरिए उकेरे महिला मुद्दे
एक महिला हूं, इसलिए उनकी परेशानियों को अच्छे से समझती हूं। हिमोजी पर इतना प्रोत्साहन मिला कि अलबेली नाम का एक और कैरेक्टर डेवलेप किया। इस कैरेक्टर को डेवलेप करने के पीछे भी वजह थी कि जब नजदीकी दोस्तों को राजनीतिक विचारधारा की वजह से एक-दूसरे से दूर जाते देखा तब अलबेली ने जन्म लिया। मुझे लग रहा था कि केवल हंसने या नमस्ते जैसे हिमोजी से काम नहीं चलेगा कुछ और करना पड़ेगा तब अलबेली एक ऐसी लड़की को जन्म दिया जिसके साथ ललमुनिया नाम की एक चिड़िया है।

यह चिड़िया अलबेली का मन है। अलबेली के साथ चिड़िया दिखाने का कारण यही था कि अलबेली अकेली नहीं है। मैं किसी महिला को अकेले नहीं दिखाना चाहती। मैं चाहती हूं कि जब भी कोई महिला परेशानी में हो तो उसके साथ ललमुनिया जैसी कोई महिला साथ हो। मेरी फेसबुक पर जब आप जाएंगे तो स्क्रोल कर पाएंगे कि सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की मनाही हो, किसी जज या राजनेता का महिलाओं को लेकर उटपटांग बयान हो...सभी पर अलबेली अपनी प्रतिक्रिया देती है। इन प्रतिक्रियाओं में कभी अलबेली पीरियड्स को दिखाती है तो कभी राजनेताओं पर अपने गुस्से को। यही नहीं, होली, दिवाली, रक्षाबंधन, जन्मदिन सभी पर अलबेली भी उत्सव मनाती है। मेरी अलबेली सजी-संवरी है तो गंभीरता की अभिव्यक्ति भी।

लॉकडाउन की उपज बना 'चित्रगीत'
अलबेली के बाद मैंने एक और कैरेक्टर को गढ़ा जिसे ‘चित्रगीत’ नाम दिया। जब हम कोई संगीत सुनते हैं तो सारी परेशानियों को भूल जाते हैं। लॉकडाउन में जब दुनिया घर के भीतर ही थम गई थी तब संगीत की इंपोरटेंस और समझ आने लगी, और इस तरह लॉकडाउन की उपज बना चित्रगीत। कैरेक्टर इलस्ट्रेशन का यह सारा काम मैं अपने टैब पर चित्र बनाकर करती हैं। इस काम में मेरे पति भी मेरा साथ देते हैं।

चित्रगीत एक ऐसी अभिव्यक्ति है जिसमें अलबेली जैसा एक कैरेक्टर होता है जिसके पीछे मधुर संगीत बज रहा होता है। हिमोजी अलबेली नहीं है, अलबेली चित्रगीत नहीं है, सब अलग हैं। मैं अपनी कला की ओर देखती हूं तो मुझे राजेश जोशी की ये कविता याद आ जाती है। ‘चीजों का हूबहू दिखना अपनी ही शक्ल में/कविता में मुझे पसंद नहीं बिल्कुल/मैं जब सूरज के साथ चाय पी रहा होऊं/एक विशाल समुद्र की तरह दिखे/मेरा कप।

सोशल मीडिया पर चित्रकारी को मिला ढेर सारा प्यार
मुझे लगता है, ‘हर लड़की अलबेली होती है, इसलिए इस कैरेक्टर का नाम अलबेली रखा। अलबेली को सोशल मीडिया पर इतनी तारीफ मिली कि अब अलबेली को कैलेंडर में भी जगह मिलने लगी है। कैलेंडर एक टेबल पर 12 महीने के लिए खुल गई किताब की तरह होता है। इसलिए अलबेली को पहले कैलेंडर पर छापने की सोची। हर साल अलबेली के लिए अलग-अलग थीम रखती हूं। पिछली बार अलबेली का बाइस्कोप था। जिसके कैलेंडर छपे थे।
मेरी कला राजेश जोशी की कविता जैसा ही काम करती है। अलबेली छोटे से मन को आकाश बना लेती है और किसी सखी का हाथ पकड़कर आकाश में उड़ जाती है। तो वहीं, हिमोजी और चित्रगीत के जरिए मन के गुत्थमगुत्था बाहर आती है। मुझे लगता है अगर आप अपने सपनों को पूरा करना चाहते हैं तो उन्हें पूरा करने में आज से लग जाएं। किसी राइट टाइम के लिए इंतजार मत करिए। आज ही गुड टाइम है।

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