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टॉयलेट में थी पढ़ने की आदत:घूंघट किया, ससुराल संभाला, लिखना नहीं छोड़ा, अब तक लिख चुकी हूं 36 किताबें, घूम लिए हैं 50 देश

2 महीने पहलेलेखक: मीना
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पढ़ने का शौक बचपन से रहा। मायके से लेकर ससुराल तक साहित्य से पीछा नहीं छूटा। बीच में कुछ परेशानियां आईं, लेकिन लेखनी ने ही मुझे संभाला। पढ़ती रही, लिखती रही। 66 बसंत देख चुकी हूं। अब तक 36 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। पहली किताब यानी पहला काव्य संग्रह ‘बसेसर की लाठी’ का लोकार्पण तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने किया था। आज भी लिखने का क्रम जारी है।

पांच बहनों के बीच दो भाई धूप में छांव की तरह आए
कोलकाता में रहने वाली साहित्यकार माला वर्मा वुमन भास्कर से खास बातचीत में कहती हैं, 30 जनवरी, 1956 को बिहार के आरा में मेरा जन्म हुआ। पांच बहनों में सबसे छोटी और मेरे बाद दो भाई।

पापा चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनूं
पापा चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनूं पर मेरा दिमाग कहानी, कविता, लेख, गीत-संगीत में रचता-बसता। बचपन से घर में पराग, चंदामामा, नंदन से लेकर धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सरिता और हम सबकी प्रिय ‘शिवानी’ की किताबें आया करती थीं।

टॉयलेट में पढ़ने की आदत थी
एक रोचक किस्सा ये है कि हमारे घर में अम्मा को छोड़कर बाकी सभी को टॉयलेट में पढ़ने की आदत थी। मैंने गुलशन नंदा का पूरा उपन्यास टॉयलेट में खत्म कर डाला था। तब छोटी-मोटी पत्रिकाओं की क्या बिसात थी। अब लगता है कि इतना सबकुछ मैं कैसे पढ़ लेती थी। तब भी मेरे पास 24 घंटे ही हुआ करते थे और अब भी। पापा ने तो टॉयलेट रूम में किताब रखने की रैक बनवा रखी थी। घर में संगीत का भी माहौल था।

माला कहती हैं कि हमारे घर में बचपन से सभी को पढ़ने-लिखने का शौक था। जैसे सभी के घर में फैमिली डॉक्टर होते हैं वैसे हमारे घर में शिवानी 'फैमिली राइटर' थीं।
माला कहती हैं कि हमारे घर में बचपन से सभी को पढ़ने-लिखने का शौक था। जैसे सभी के घर में फैमिली डॉक्टर होते हैं वैसे हमारे घर में शिवानी 'फैमिली राइटर' थीं।

लिखने का सिलसिला ऐसे शुरू हुआ
मेरे लेखन की शुरुआत ‘संपादक के नाम पत्र’ से शुरू हुई। तब की छपी चिट्ठियां मैंने आज भी सहेज कर रखी हैं। इन यादों के साथ स्कूली जीवन में तीन आने की लाइनदार कॉपियों की भी याद आ धमकती है। खैर… अब तो बीता जमाना यादों की पोटली भर रह गया है।

साहित्यिक गुरु से मुलाकात
प्रख्यात कथाकार मिथिलेश्वर जी आरा के पुराने वाशिंदा हैं, उन्हीं के सानिध्य में मेरी कलम चलती रही। वे मेरे साहित्यिक गुरु हैं। उनके सहयोग से मेरी पहली कविता 'बचपन' मुज्जफरपुर से निकलने वाली पत्रिका 'प्रणेता' में छपी। लेखन को कुछ और राह मिलती तब तक मेरी शादी हो गई और ग्रेजुएशन होते मैंने ससुराल की राह पकड़ ली।

डॉक्टर पति से शादी
डॉक्टर तो न बन सकी पर एक डॉक्टर की पत्नी जरूर बनी। कोलकाता के हाजीनगर के एक जूट मिल में मेरे पति डॉक्टर हैं। यहां आने से पहले मुझे अपने ससुराल में एकाध महीने रहना पड़ा जो भोजपुर का ही एक गांव उमरॉवगंज था।

माला वर्मा को अब तक कई सम्मान मिल चुके हैं। वे कहती हैं कि उन्हें आगे अभी और लिखना है।
माला वर्मा को अब तक कई सम्मान मिल चुके हैं। वे कहती हैं कि उन्हें आगे अभी और लिखना है।

आधुनिक लड़की गांव में ब्याही
शहर की आधुनिक लड़की एकदम खाटी गांव में रही। वो भी घूंघट में, लेकिन साथ ही महिलाओं की बात भी सुनी। बाद में ये मेरी कहानियों के चरित्र भी बने।

धर्मयुग की पोटली साथ में थी
विदाई के वक्त पापा ने धर्मयुग की 36 प्रतियां मुझे दे दी थी। मेरे पढ़ने की ललक को देखकर ससुर जी ने घर में हिंदी का अखबार मंगाना शुरू कर दिया।

अनुदित बांग्ला किताबें पढ़ी
कुछ महीने बाद मैं पति के पास हाजीनगर चली आई। मुझे बांग्ला बोलना आती नहीं था पर कुछ महीनों में मैंने इस पर महारत हासिल कर ली। पति ने भी हिंदी-बांग्ला पुस्तकें लाकर मुझे थमा दीं। मैंने बांग्ला किताबों के हिंदी अनुवाद मंगाए और जमकर पढ़े।

सात साल के बेटे की मौत ने तोड़ दिया
मुझे दो बेटे हुए।,लेकिन दूसरा बेटा सात साल का होने पर दुनिया में नहीं रहा। वह थैलिसीमिया से पीड़त था। तब ये सात साल हम दोनों पति-पत्नी के लिए बुरे सपने जैसे थे। हमसे ज्यादा बच्चे पर अंतहीन कष्ट। महीने में दो बार कोलकाता जाकर खून चढ़ाना, रुपए पैसे, समय, प्यार-ममता सब कुछ खर्च करने के बाद भी हम उसे नहीं बचा पाए। तब मैं इतनी दुखी थी कि कई बार आत्महत्या करने की सोची पर परिवार ने मुझे संभाला।

माला के मुताबिक, महिलाओं को घर संभालते-संभालते लिखना होता है, जबकि पुरुषों के साथ ये बंदिश नहीं है। खैर...लिखने वाली लिख रही हैं और नाम कमा रही हैं।
माला के मुताबिक, महिलाओं को घर संभालते-संभालते लिखना होता है, जबकि पुरुषों के साथ ये बंदिश नहीं है। खैर...लिखने वाली लिख रही हैं और नाम कमा रही हैं।

एक बेटा इंजीनियर
एक बेटा आज अमेरिकन कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। अरित्री (आन्या) और मायरा की मैं दादी हूं। मेरी बहू भी बहुत अच्छी है।

फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा
सात साल के बेटे के गुजरने के बाद मैं पढ़ाई-लिखाई, गीत-संगीत सबकुछ भूल चुकी थी, परिवार वापस मुझे इस ओर लाया। 1991 के बाद फिर कागज-कलम उठाई और फिर पीछे लौटने की कोई वजह नहीं मिली।

घर-गृहस्थी के साथ साहित्य लेखन व देश-विदेश की यात्राएं भी होती रहीं। अब तक 50 देशों की यात्रा कर चुकी हूं। इन्हें यात्रा वृतांत के रूप में संजोया है। कई सम्मान मेरे नाम हो चुके हैं।

आगे भी लिखते रहना है
एक बार लिखने का नशा चढ़ जाए तो यह शराब-सिगरेट-बीड़ी की तरह छूटता नहीं। इतना लिखने के बाद भी लगता है कि अभी बहुत कुछ बाकी है। वैसे सच्चाई तो ये है कि घर-गृहस्थी के बीच किसी महिला के लिए निरंतर लिखते रहना मुश्किल काम है। पुरुष भरपेट लिखते हैं। पर चलिए...जीवन में किसी बात के लिए हार नहीं मानी। लिखने वाली लिख रही हैं और नाम भी कमा रही हैं।