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नवाबों के शहर की 'रानी':भिखारी बच्चों को नहलाया, धुलाया और स्कूल पहुंचाया, पुचकार कर गले लगाया तो बच्चे बोल पड़े, ‘मम्मी जी’

2 महीने पहलेलेखक: मीना
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कूड़े से कचरा बीनते बच्चों को देखकर आप नाक-मुंह सुकोड़कर निकलते होंगे। वे बच्चे जो कचरे में पड़े किसी फल के टुकड़े को मोती समझकर संहेजकर रखने के लिए एक दूसरे में लड़ मरते होंगे, उन्हें देखकर शायद आपका सभ्य मन उन्हें उत्पाती कह दे। मंदिर के बाहर मैले-कुचैले कपड़ों में बच्चों को देखकर प्रसाद का एक टुकड़ा आप बहुत अहसान समझकर देते होंगे, लेकिन मेरे लिए ये भिखारी बच्चे भगवान के किसी रूप से कम नहीं हैं। मैं आज इन बच्चों की 'मम्मी' हूं। अरे अब तो पूरे लखनऊ की 'मम्मी जी' हूं। ये शब्द हैं शिक्षिका, साहित्यकार और 70 साल की समाजसेविका मनोरमा श्रीवास्तव के।

मनोरमा श्रीवास्तव
मनोरमा श्रीवास्तव

भास्कर वुमन से बातचीत में मनोरमा कहती हैं, 'गंगा किनारे बसे बलिया जिले में मेरा जन्म हुआ, जहां रोज सुबह और शाम आरती गान और घंटों की गूंज होती। अगरबत्ती की महक और फूलों की सुगंध के साथ दिन की शुरूआत होती। मैं भी रोज मंदिर जाती। भगवान पर खूब चढ़ावा चढ़ते देखती उनकी दहलीज पर एक लड्डू के टुकड़े को पाने के लिए अधनंगे, मैले-कुचैले से कपड़ों में भीख मांगते बच्चों को देखती। मेरे अंदर की ममता जागती और उनकी मदद करने के लिए कुलांचे मारती, लेकिन 1981 तक तो मैं खुद ही स्टूडेंट रही तो उन बच्चों की क्या मदद कर सकती थी। बलिया से इंटर कॉलेज तक की पढाई पूरी करने के बाद बीएससी, एमएससी इलाहबाद और बीएड पूर्वांचल विश्वविद्यालय से कर डीएबी कॉलेज देहरादून में पढ़ाने का काम मिल गया। इसके बाद मैंने इन भीख मांगने वाले बच्चों पर काम करना शुरू किया।

बचपन से मन में भिखारी बच्चों के लिए थी दया
शायद समाजसेवा की भावना मेरे मन में बचपन से थी। यही वजह थी कि पहली नौकरी देहरादून में मिली वहीं, बच्चों के लिए काम करना शुरू किया। स्कूल में पढ़ाने के साथ-साथ ऑल इंडिया रेडियो में ब्लाइंड बच्चों को किताबें पढ़कर सुनाने में मेरा मन भी खूब रमता। उन बच्चों को जो सूकून मिलता था उनकी खुशी देखकर मुझे मेरा काम सफल लगता। मेरे पति की नौकरी लखनऊ में थी इसलिए 1999 में मैंने भी यहीं ट्रांसफर ले लिया। यहां आई तो विकासनगर में रहते हुए आसपास के मंदिरों में देखा कि यहां भी बच्चों के भीख मंगवाने का काम चलता है। पढ़े-लिखे और सम्पन्न लोग भी एक लड्डू के दस-दस टुकड़े करके इन बच्चों में बांटते हैं और भरे पेट वालों को पूरा लड्डू खिलाते हैं। अब कोई उनसे पूछे कि क्या इन टुकड़ों से उनका पेट भर जाएगा? उन्हें देखकर लगता ‘राइस बोल थ्योरी’ सच है। हम एक ऐसे देश में रहते हैं जहां किसी गरीब को एक कटोरी चावल भी बड़ी मुश्किलों से नसीब होता है। इन बच्चों के भीख मांगते हाथ मैं नहीं देख सकती थी, इसलिए भिक्षावृत्ति को रोकने की ठानी।

बच्चों के साथ मनोरमा
बच्चों के साथ मनोरमा

‘बच्चों को सिखाया, भीख मांगना भगवान को अपमानित करना है’
मेरे अंदर का समाजवाद मुझे रोज कहता कि ये बच्चे अपना पूरा जीवन भीख मांगकर नहीं गुजार सकते। ऐसी ही उमड़न-घुमड़न में मैं विकासनगर के गुलाचीन मंदिर में रात के अंधेरे में पहुंच गई। वहां जाकर बच्चों को कहा कि भीख मांगना गलत है। मत मांगा करो। मुझे लगा कि मेरी बातों को बच्चे उपदेश समझेंगे, मां-बाप मुझे हिकारत की नजर से हांक देंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैं बच्चों के बीच पहुंची और वो चुपचाप मेरे साथ आ गए। बच्चों को कहा कि पढ़ोगे तो बोले हां और मेरे साथ पूरा हुजुम आ गया। मैंने उन्हें नहलाया, धुलाया, उनके मैले कपड़े उतारे, नए कपड़े पहनाए, बालों में तेल डाला और शीशे के सामने खड़ा करके उन्हें यह अहसास दिलाया कि ‘तुम कितने सुंदर हो।’ भीख मांगना भगवान को अपमानित करना है। इस बार उन बच्चों के पेरेंट्स भी मान गए और अब इन बच्चों का दाखिला स्कूल में करवा दिया। कुछ बच्चों का दाखिला मैंने अपने स्कूल में करवा दिया था कुछ का प्राइवेट स्कूल में। बच्चे दिन में मेरे पास पढ़ते और फिर स्कूल जाते। इन बच्चों को देखकर मुझे बहुत खुशी मिलती।

अब बन गईं पूरे लखनऊ की ‘मम्मी जी’
शुरुआत में मेरे पास करीब 60-70 बच्चे थे। मैंने ये अहसास किया है कि ये भीख मांगने वाले बच्चे पैदा किए जाते हैं और पैसा कमाने के लिए सड़क पर फेंक दिए जाते हैं। कई परिवारों में लड़कों के आपस में समलैंगिक संबंध तक होते हैं। इस तरह की हिंसा से भी बच्चों को छुटकारा दिलाया। इन बच्चों को गोद में चिपकाने वाला, दुलार दिखाने वाला, लाड़ लड़ाने वाला कोई है ही नहीं। जब ये सबकुछ इन्हें मेरी तरफ से मिला तो मुझसे ऐसे लिपटे जैसे मैं ही इनकी मम्मी हूं। अब तक जितने बच्चे मेरे पास रहे हैं वो मुझे टीचर या आंटी नहीं बल्कि मम्मी कहते हैं। अब तो पूरा लखनऊ मुझे ‘मम्मी जी’ कहने लगा है।

...जब लोगों को लगा, ‘मैं एडोप्शन सेंटर चलाती हूं’
वैसे तो बच्चों से जुड़े मेरे पास कई किस्से हैं, लेकिन जो मुझे याद आ रहा है वो बड़ा दर्दभरा है। मैं भीख मांगते बच्चों को घर ले आती थी, तब लोगों को लगा कि मैं कोई एडोप्शन सेंटर चलाती हू्ं। एक दिन मेरी मुलाकात बड़े ही मासूम से बच्चे से हुई। उसका नाम सलमान था। उस समय उसकी उम्र करीब 4-5 साल रही होगी। उसकी मां नहीं थी। पिता कबाड़ी का काम करते थे। वो भीख मांगता। मैं उसके घर गई और उसे प्यार से गोदी में बैठाया। वो भी मुझसे चिपकने लगा।उस बच्चे को घर लाई तो हजारों ग्राहकों ने मेरे घर के बाहर धावा बोल दिया। वो बच्चा डर के मारे टेबल के पीछे छुपा जा रहा था। मैंने वो बच्चा किसी को नहीं दिया। उस दिन पति ने कहा कि ऐसे तो तमाम और लोग भी बच्चे के एडोप्शन के लिए आएंगे, इससे बेहतर है कोई संस्था बना लें। तब मैंने 2004 में ‘जमी अपनी आसमा मेरा’ संस्था बनाई। पति रिटायर्ड आईएस ऑफिसर हैं और उनसे मदद मिली इसलिए मैं ये सब काम कर पाई।

अब बच्चे भीख नहीं मांगते
अब तक करीब 1100 बच्चों को मैंने भीख मांगने से रोका है। ये बच्चे अब बड़े हो गए हैं। कोई कैटरिगं का काम करता है, कोई ड्राइवर है, कोई सफाई का काम करता है तो कुछ बच्चों ने बीए की पढ़ाई पूरी कर ली और लड़कियां ब्यूटी पार्लर, सिलाई-कढ़ाई का काम सीख गई हैं। अब लखनऊ के ज्यादातर मंदिरों में आपको भीख मांगने वाले बच्चे दिखाई नहीं देंगे।
साहित्य में रुचि और सम्मान
समाज कार्य के अलावा मेरी साहित्य में भी रूचि है। 2021 में रिटायरमेंट लेने के बाद मैंने कुछ लघु कथाएं लिखीं। जीवनी लिखने का काम किया। ‘आईने में उतरा एक आकाश‘ (डॉ शंभू नाथ अवकाश प्रप्त मुख्य सचिव उत्तर प्रदेश) और कोहिनूर जहां भी रहा अनमोल रहा (उदय प्रताप सिंह, कवि एवम साहित्यकार) की जीवनियां लिख चुकी हूं। बच्चों में भिक्षावृत्ति को रोकना ही मेरा और मेरी संस्था का मुख्य उद्देश्य है। मेरे इस काम की वजह से कई सामाजिक संस्थाओं ने मुझे सम्मानित किया है। 2014 में हिंदुस्तान टाइम्स ने ‘विमेन अचीवेर्स अवार्ड ‘और उसी साल तत्तकालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की ओर से ‘गरीबों की सेवा के लिए प्रदत्त सम्मान', 2015 में उत्तर प्रदेश ने गोमती महोत्सव में’ ‘गोमती गौरव सम्मान’ दिया और बाल एवम महिला कल्याण विभाग ने बालमित्र के रूप में सम्मानित किया है।

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