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रिश्तों का गणित:रिश्ते बचाने के लिए झुक जाती हैं महिलाएं, पुरुषों का ईगो रहता है सबसे ऊपर

नई दिल्ली2 महीने पहले
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मौजूदा वक्त में महिलाओं और पुरुषों के संबंध, पीड़ित महिलाओं व बच्चियों का दर्द देखकर मर्दों के प्रति आने वाले विचार और उनके प्रति नजरिया जैसे पहलुओं पर उत्तर प्रदेश महिला आयोग की अध्यक्ष विमला बाथम से दैनिक भास्कर की रिपोर्टर दीप्ति मिश्रा की बातचीत पर आधारित...

उत्तर प्रदेश महिला आयोग की अध्यक्ष के पद पर काम करते हुए हर दिन मैं सैकड़ों महिलाओं से मिलती हूं। मैं देखती हूं कि जब तक महिलाएं एडजस्ट करती हैं, सब ठीक चलता है, लेकिन जैसे ही वे एडजस्ट करना बंद कर देती हैं, परिवार बिखर जाता है। मैं पूछना चाहती हूं कि आखिर महिलाएं ही क्यों एडजस्ट करें, पुरुष क्यों नहीं? मैं देखती हूं कि जब रिश्ता बचाने की बारी आती है, तो महिलाएं जल्दी झुक जाती हैं। अपने रिश्ते को एक और मौका देने की पहल करती हैं, जबकि पुरुषों का ईगो रिश्तों से ऊपर रहता है। आखिर महिलाएं ही क्यों पहल करें, पुरुष क्यों नहीं?

मैं मानती हूं कि महिला और पुरुष गृहस्थी के दो पहिए होते हैं। किसी एक पहिए में गड़बड़ी आने पर घर गृहस्थी की गाड़ी बेपटरी हो जाती है, जबकि मैंने हकीकत इसके एकदम उलट देखी है। उत्तर प्रदेश महिला आयोग से जुड़ने के बाद मुझे कई बार पुरुषों का बेहद क्रूर चेहरा देखने को मिला। वे महिलाओं के साथ मारपीट करते हैं। उन्हें तरह-तरह से टॉर्चर करते हैं। हाथ-पैर तोड़ देते हैं। बच्चों समेत घर से बाहर निकाल देते हैं। इस दौरान उनके जेहन में ये ख्याल तक नहीं आता कि आखिर बेचारी औरत बच्चों को लेकर जाएगी कहां। कई बार तो छोटी-छोटी बातों पर जान से ही मार देते हैं।

मेरा हर रोज घरेलू हिंसा, यौन शोषण व अन्य तरीके से सताई गई महिलाओं और बच्चियों के 250 से 300 मामलों से सामना होता है। इनमें से कुछ मामले ऐसे होते हैं, जो मुझे अंदर तक झकझोर देते हैं। पुरुषों की बर्बरता की शिकार महिलाओं और बच्चियों की हालत देखकर मेरी रूह कांप उठती है। कई घंटों तक मन बैचेन रहता है। कई बार रातों को सो नहीं पाती। आखिर इतनी बर्बरता और क्रूरता महिलाओं के लिए क्यों? हैरानी तब होती है, जब कई महिलाएं ही ऐसे पुरुषों का साथ देती हैं।

महिलाएं होती हैं रिश्ते को मौका देने को जल्दी राजी
हमारी टीम का प्रयास रहता है कि जहां गुंजाइश बची हैं, उन रिश्तों को बचाया जाए। पति-पत्नी दोनों की काउंसलिंग की जाए। इस दौरान महिलाएं रिश्ते को मौका देने को जल्दी राजी हो जाती हैं। मैंने देखा कि महिलाएं तभी अपने हाथ खड़े करती हैं, जब उनकी जान खतरे में होती है। लेकिन पुरुषों का ईगो बीच में आ जाता है। हालांकि, रिश्ते बचाने के लिए पुरुष भी झुकते हैं, लेकिन उनकी संख्या महिलाओं की तुलना में बहुत कम होती है।

पुरुष होते हैं निर्मोही
मैंने कई मामलों में देखा है, जब सास-ससुर समेत ससुराल के बाकी सदस्य महिला का साथ देते हैं, लेकिन बाहर अफेयर होने या फिर अन्य कारण से पुरुष अपने बच्चों समेत पत्नी और परिवार को एक झटके में छोड़ देता है। या फिर बच्चों समेत पत्नी को घर से निकाल देता है। उसे नहीं फर्क पड़ता कि उसके बच्चों का क्या होगा? उसकी पत्नी कहां जाएगी? हालांकि, मैंने महिलाओं से पीड़ित पुरुषों को भी देखा है। कई महिलाएं झूठे मामलों में पुरुषों को फंसा देती हैं, लेकिन वह संख्या ऊंट के मुंह में जीरा जाने जैसी होती है।

पुरुष भी कर रहे रिश्तों में निवेश
स्वतंत्र टिप्पणीकार डॉ. पश्यन्ती शुक्ला मोहित बताती हैं, 'ये सच है कि महिलाएं रिश्तों को ज्यादा तवज्जो देती हैं, लेकिन वक्त के साथ रिश्तों को लेकर महिला और पुरुष दोनों का नजरिया बदल रहा है। अब पुरुष भी महिलाओं के साथ घर परिवार की जिम्मेदारी साझा करते हैं। रिश्तों का निभाने के लिए महिलाओं की तरह ही कोशिश करते हैं। जहां बात बिगड़ती नजर आती है, वहां पुरुष ही जाने दो वाला एटीट्यूड दिखती हैं, जबकि महिलाएं सालों पुराने किस्से लेकर बहस करने बैठ जाती हैं। इसलिए, कहा जा सकता है कि महिला और पुरुष दोनों ही रिश्ते की डोर को मजबूती से थामते हैं, तब रिश्ता सफल होता है।'