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करवाचौथ:मिलिए मॉडर्न सास से, जो बना रही हैं बहू का व्रत खुशहाल और आसान

एक महीने पहलेलेखक: श्वेता कुमारी
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करवा चौथ आ रहा है। महिलाओं ने क्या पहनना और कैसे सजना जैसी सारी बातें तय कर ली हैं। इस खास मौके पर भास्कर वुमन आपको मिलवाने जा रहा है, बहुओं को सपोर्ट करने वाली उन बेमिसाल मदर इन लॉ से, जिन्होंने कुप्रथाओं को तोड़कर बहुओं को दिया बेटी बनने का अधिकार।

सास अब सास नहीं बन चुकी हैं बहू की ‘खास’

आज की सास अपनी बहू को वैसा ही प्यार और अपनापन देती हैं जैसा कि वो अपनी बेटी को देती हैं। व्रत शुरू करवाने से पहले ही सास बहू से ये कह देती है कि पहले साल जैसे व्रत करोगी, हर साल उसी तरह के नियम करने होंगे। राजस्थान की गायत्री पंचोली ने इसलिए अपनी बहू को व्रत के पहले ही समझा दिया है कि वो पानी, चाय, कॉफी और जूस पी लिया करे, जिससे उसे कमजोरी महसूस न हो।

पहले के रिवाज के मुताबिक बहुएं हर साल शादी का जोड़ा पहनकर ही व्रत किया करती थीं। बिहार की भगवती झा बदलते जमाने में बहू के मन का ख्याल रखना जरूरी समझती हैं। इसलिए वो अपनी अपनी बहू को हर साल मनचाहे कपड़े पहनने को कहती हैं और उन पर पहनने, ओढ़ने या पूजा को लेकर कोई दबाव नहीं बनाती हैं।

बीते जमाने में व्रती बहुएं सारे दिन व्रत करने के साथ-साथ घर के काम निपटाने और पकवान बनाने में व्यस्त रहती थीं। मध्यप्रदेश की सरिता जादौन समझती हैं कि बदलते समय में खान-पान और शरीर की क्षमता भी बदली है। इसलिए उनकी बहू व्रत के दिन आराम करती हैं और इस दिन अगर बेटा खाना बनाए, तो उन्हें इस बात से कोई परहेज नहीं होता है।

बीते जमाने में ये होता था कि एक बार किसी महिला को कोई बात बता दी जाए, तो वो ताउम्र उसे गांठ बांधकर रखती थी। वही बात वो अपनी बेटी और बहू को बताती थी और उम्मीद करती थी कि वैसा ही हो, जैसा कि अब तक होता आया है। कर्नाटक की चेतना मिश्रा, बहू के पर्सनल स्पेस को तवज्जो देती हैं और कोई भी व्रत, नियम उस पर जबरन नहीं थोपती हैं। चाहे वो कथा सुनने को लेकर हो या भारी गहने-कपड़े पहनने को लेकर।

बीते जमाने में सास इस बात से खफा हो जाती थी कि बहू के मायके से उसके लिए कपड़े और श्रृंगार का सामान आया है, और सास के लिए नहीं। झारखण्ड की उषा मोदी को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि बहू के मायके से क्या आया है और उनके लिए क्यों नहीं आया है। वो बस बेटे-बहू को साथ और खुशहाली में जीते हुए देखना चाहती हैं।

उत्तरप्रदेश की उर्मिला देवी खुद रीति-रिवाजों से घिरी रहती हैं लेकिन व्रत के दिन भी वो अपनी बहू के साथ ही खाना खाती हैं। सारा दिन भूखे रहने के बावजूद जब व्रत खोलने का समय आता है, तब वो अपनी बहू से अपनी थाली साथ परोसने और खाने को कहती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि वो जानती हैं, जिनती भूख उन्हें लगी है, उतनी ही भूख उनकी बहू को भी लगी होगी।

इस व्रत में सास क्यों होती है खास?

इस व्रत में सास का बड़ा महत्व होता है। उनके बेटे को अपने पति के तौर पर पाने वाली महिला सास को तोहफे और श्रृंगार का सामान देती हैं। दरअसल ये एक तरीका है अपनी सास को शुक्रिया कहने का, क्योंकि उन्होंने अपना बेटा, बतौर पति उस महिला को सौंपा है। सास का महत्व इसलिए भी बड़ा होता है, क्योंकि वो अपनी बहू को सरगी देती हैं। इसमें कपड़े, सुहाग का सामान, फेनिया, मेवे नारियल आदि होते हैं। वहीं बहुत अपनी सास के लिए बायना निकालती हैं। बायना यानी खाने-पीने की मीठी चीजें। इसके अलावा बहुएं अपनी सास को साड़ी, गहने, श्रृंगार का सामान आदि भी उपहार के तौर पर देती हैं।

जिनकी सास नहीं हैं वे क्या करें?

जिन सुहागिनों की सास नहीं हैं, वे इस बात से परेशान न हों कि उनका बायना किसके पास जाएगा। अगर आपकी सास नहीं हैं, तो आप जिन्हें सास की तरह मानती हैं या परिवार में वो महिला जो रिश्ते में आपकी सास लगती हैं आप उन्हें बायना दे सकती हैं। कुछ जगह ऐसी बातें सुनने को मिलती है कि अगर आपकी सास विधवा हैं, तो उन्हें बायना नहीं देना चाहिए, लेकिन इस बात पर बिल्कुल भी ध्यान न दें। अगर आपके ससुर नहीं हैं और सास हैं, तो आप उन्हें बायना के तौर मिठाई के साथ श्रृंगार के सामान में सिंदूर छोड़कर चूड़ी-बिंदी जैसी चीजें दे सकती हैं।

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