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एन. रघुरामन का कॉलम:‘रोकने’ और ‘टोकने’ को पूरी तरह से बंद किए बिना अपनी पैरेंटिंग-स्किल्स को अपग्रेड करें

2 महीने पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Money Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

कल सुबह मुझे 54 वर्षीय डॉ. नरहरि बांगड़ का पत्र मिला। वे आईएएस अधिकारी हैं और रोहतक नगर निगम में आयुक्त हैं। वे अनेक मीडिया माध्यमों में प्रकाशित विज्ञापनों पर चिंता जता रहे थे। उन्होंने एक विज्ञापन का उदाहरण दिया, जिसमें एक इनवर्टर निर्माता कह रहा था, ‘45 डिग्री गर्मी में सोचो बिजली जाने से एसी बंद हो जाए तो?’

उन्होंने मेरा ध्यान उस विज्ञापन में एक स्मार्ट युवक की तरफ खींचा, जो पसीने से लथपथ था और एक सोफे पर बैठा था, उसका एक पैर मुड़ा हुआ था और दूसरा फर्श पर रखा था। दोनों पैरों में जूते थे। उन्होंने कहा, ‘यह एक सामान्य भारतीय का व्यवहार नहीं हो सकता और जूते के साथ सोफे पर बैठने को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए।

इस तरह की बातों को मीडिया और फिल्मों में अकसर दिखाया जाता है, जिसका समाज पर बुरा असर पड़ता है।’ मैंने उन्हें कॉल लगाया और हमने आज के युवाओं के व्यवहार के बुनियादी कारण पर बात की। उन्होंने कहा कि जब हम बच्चे थे तो हमें हर उस छोटी-मोटी बात पर फटकार लगाई जाती थी, जिसे हमारे पैरेंट्स सामाजिक व्यवहार के अनुरूप नहीं समझते थे।

उन्होंने शब्दों से, आंखों से और जरूरत पड़ने पर हाथों से भी ‘रोकने’ और ‘टोकने’ की पद्धति अपनाई थी, क्योंकि वे चाहते थे कि हम समाज के जिम्मेदार सदस्य बनें। इससे हमें समझ आता था कि हम जो भी करते हैं, उसका समाज पर असर पड़ता है।

आज संयुक्त परिवार की प्रणाली समाप्त हो गई है और न्यूक्लियर फैमिली का झुकाव स्वार्थपूर्ण रवैए की तरफ रहता है। चूंकि छोटे परिवार के प्रमुख पर पूरे घर की जिम्मेदारी होती है, इसलिए उसके पार्टनर भी वित्तीय मदद के लिए कोई काम करते हैं। इससे पैरेंट्स अपने बच्चों को क्वालिटी-टाइम नहीं दे पाते और उनके व्यवहार के पैटर्न पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते।

बच्चों को अपना व्यवहार-पैटर्न विकसित करने की स्वतंत्रता दी जाती है, जो कि उनके पैरेंट्स के द्वारा अपने बचपन में सीखे गए व्यवहार से मेल नहीं खाता। ऊपर से हम बच्चों की देखभाल करने की कला में भी स्वयं को अपग्रेड नहीं कर पाए हैं।

मुझे सैकड़ों ऐसे अवसर याद आते हैं, जब बचपन में मुझे आंख के इशारे से, शब्दों से और जरूरत पड़ने पर हाथों की मदद से टोका गया था। जैसे कि, जब कोई बड़े घर में आएं तो एक कोने में चुपचाप बैठे रहना, मेहमानों से पहले ही कुछ खा लेना, सूर्य ढलने के बाद घर लौटना, धीरे-धीरे खाना या जल्दी-जल्दी खाना, खाते समय बोलना, खाने के बाद तश्तरी चाटना, खाने के बाद तश्तरी साफ नहीं करना, किसी को पहले ना बोले बिना तुरंत उससे कोई गिफ्ट ले लेना, जूतों को रैक में नहीं रखना, बुकशेल्फ को ठीक से नहीं जमाना, बाहर के जिन लोगों को मैं पसंद नहीं करता था।

उन्हें गुस्से से घूरकर देखना, नाखून चबाना, जूते पॉलिश नहीं करना, दस सेकंड में पिता के सवाल का जवाब नहीं देना, बिना सोचे पांच सेकंड में जवाब दे देना, पिता के द्वारा चुनी गई शर्ट को पसंद नहीं करना, घर पर जिस डिश को नहीं खाया हो उसे किसी दूसरे के घर में अधिक खा लेना... यह सूची अनंत है। लेकिन आज मैं जो कुछ भी हूं, उस ‘टोकने’ की वजह से ही हूं!

मजे की बात यह है कि बांगड़ ने अपने बेटे के टीचर से कहा था कि अगर वह कुछ गलत करे तो उसे डांट लगाएं। आज उनका बेटा दीपेंदर सुप्रीम कोर्ट में वकील है और उनकी बेटी वीनू सिंह नीति आयोग में असिस्टेंट डायरेक्टर है। फंडा यह है कि ‘रोकने’ और ‘टोकने’ को पूरी तरह से बंद किए बिना अपनी पैरेंटिंग-स्किल्स को अपग्रेड करें, क्योंकि आज भी उसके कुछ फायदे हैं।