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मां का गला घोंटकर लिखा 77 पेज का सुसाइड नोट:4 स्टेज से गुजरता है खुदकुशी करने वाला, आत्महत्या रोकने के लिए मन की बात जरूरी

नई दिल्ली9 महीने पहलेलेखक: संजय सिन्हा
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‘दो साल से मैं मरना चाह रहा था। मरने से पहले मैं अपनी मां को दुख से आजाद करना चाहता हूं। मैंने बाइक की केबल से मां का गला घोंटा, ताकि मां को तकलीफ न हो…मां के शव को देख नहीं सकता। उनके चेहरे को गंगाजल से नहलाया है…मां की मौत को 71 घंटे हो चुके हैं। अब मेरी सुसाइड करने की बारी है…’

77 पेजों का यह सुसाइड नोट दिल्ली के 25 वर्षीय क्षितिज ने लिखा। बाद में उसने भी खुद का गला काटकर जान दे दी। घटना 4 सितंबर 2022 की है।

एक और सुसाइड की घटना जानिए, जिसे रोका जा सकता था

वह मेरी बहन थी। उम्र में कुछ ही छोटी। मेरी जॉब का पहला साल था और उसके कॉलेज का आखिरी। छठ पर मैं झारखंड में अपने घर गई थी। हमेशा खुशमिजाज और चुलबुली बहन इस बार एकदम अलग दिखी। कभी बात-बात पर चिड़चिड़ाती, तो कभी अचानक से रो पड़ती। कहीं चले जाने, न मिलने जैसी उदासी भरी बातें भी करती। छठ के बाद मैं मुंबई लौट आई। आधी जनवरी बीत चुकी थी, एक रात उसका मैसेज आया। हेलो, कैसी हो... सिर्फ इतना लिखा था। मुझे लगा कि उसे पैसे चाहिए, पूछा तो उसने कुछ नहीं कहा। अगले दिन सुबह घर में उसका सुसाइड नोट मिला। वह दुनिया से जा चुकी थी।

जाने से पहले उसने सबको वही मैसेज भेजा था। बाद में पता चला कि शायद उसका ब्रेकअप हुआ था। घर में उसने किसी को कुछ नहीं बताया। कुछ वक्त बाद उसकी फ्रेंड से पता चला कि उसने नदी में कूदकर जान देने की कोशिश भी की थी, तब उस फ्रेंड ने उसे संभाल लिया था। घर पर किसी को जरा भी एहसास होता, तो उसे यूं जान देने की नौबत नहीं आती।

आप ये सोच रहे होंगे कि हमने आपको इन दो सुसाइड के बारें क्यों बताया? दरअसल, आज ‘वर्ल्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे’ है। देश और दुनिया में सुसाइड की बढ़ती गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 50 साल में दुनिया भर में सुसाइड रेट 60% , जबकि भारत में 30 साल में 43% बढ़ा है। दक्षिण भारत ऐसी जगह है, जहां दुनिया में सबसे ज्यादा सुसाइड रेट है। ये बातें 2004 से 2014 के बीच की एक स्टडी से सामने आई है।

नीचे दिए ग्राफिक से पता चलता है कि आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं।

सुसाइड रोकने को लेकर सबसे बड़ी और अहम बात जो हम सभी को जाननी चाहिए, वह ये है कि जो भी लोग सुसाइड करते हैं, उनमें 98 फीसदी लोग ऐसे होते हैं, जो मेंटल डिसऑडर्र से जूझ रहे होते हैं और जिनकी बीमारी को पहचानकर उनका इलाज हो सकता है और जान भी बचाई जा सकती है। ये सब बातें भारत में सुसाइड नोट पर हुई इकलौती स्टडी में सामने आई हैं।

अब आइए समझते हैं कि जान देने वाले व्यक्ति की मनोदशा क्या होती है।

आत्महत्या को समझने के लिए सुसाइड नोट का एक्सपर्ट एनालिसिस

रांची के सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकेट्री की एसोसिएट प्रोफेसर और सुसाइड प्रिवेंशन हेल्पलाइन एंड क्लीनिक की हेड डॉ. नेहा सईद का कहना है कि कई सुसाइड नोट वन लाइनर होते हैं और कई में इंसान लंबी कहानी में अपना दर्द बयां करता है। एक्सपर्ट सुसाइड नोट की थीम का एनालिसिस करते हैं और उसकी गहराई समझी जाती है। जैसे किसी ने माफी मांगी है, सफाई दी है, गलती को नकारा है या अपराधबोध में खुदकुशी की है। सुसाइड नोट में कोई किसी को कसूरवार ठहराता है तो कोई किसी को भी जिम्मेदार नहीं मानता। कुछ अपनी अंतिम इच्छा भी जताते हैं।

क्या सुसाइड नोट का एनालिसिस आगे होने वाली आत्महत्याओं को रोकने में मदद कर सकता है? इस पर जेएसएफ मेडिकल कॉलेज मैसूर में स्टडी की गई।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (NIMHANS) बेंगलुरु के डिपार्टमेंट ऑफ साइकेट्री के प्रोफेसर डॉ. वी सेंथिल रेड्डी ने बताया कि सुसाइड नोट को लेकर महत्वपूर्ण स्टडी कराई गई। ‘मैसूर स्टडीः ए स्टडी ऑफ सुसाइड नोट्स’ के नाम का यह रिसर्च पेपर ‘इंडियन जर्नल ऑफ साइकेट्री’ में प्रकाशित हुआ। इस स्टडी से जो बातें निकल कर सामने आईं पहले उन्हें समझते हैं।

इस स्टडी की प्रमुख रिसर्चर डॉ. पी. नम्रता ने बताया कि 2010 से 2013 के बीच 22 सुसाइड नोट का अध्ययन किया गया। 86 प्रतिशत सुसाइड नोट 16 से 40 एज ग्रुप के थे और इनमें 59 फीसदी पुरुष थे। सभी सुसाइड नोट हाथ से लिखे हुए थे। 55 प्रतिशत सुसाइड नोट में किसी को संबोधित नहीं किया गया था। वहीं, 36 प्रतिशत ने रिश्तेदारों, 18 प्रतिशत ने पत्नी और 13 प्रतिशत ने मां को संबोधित करते हुए सुसाइड नोट लिखा।

सबसे ज्यादा अपराधबोध, माफी या शर्म से भरे सुसाइड नोट लिखे

सबसे ज्यादा गिनती उनकी रही जिनमें लोगों ने अपराधबोध, माफी या शर्म से भरे सुसाइड नोट लिखे। कुछ सुसाइड नोट में पीछे छूटे परिजनों के प्रति प्यार जताया गया या उनको कोई निर्देश दिए गए। आधे लोगों ने आत्महत्या का जिम्मेदार किसी को नहीं ठहराया। करीब एक तिहाई सुसाइड नोट में अंतिम इच्छा जाहिर की गई थी। इसके बाद उन सुसाइड नोट की गिनती ज्यादा थी, जिसमें मरने वाले ने अपनी बेगुनाही की बात कही थी।

अचानक जान देने वाले और डिप्रेशन में सुसाइड करने वाले के नोट अलग

डॉ. रेड्डी बताते हैं कि किसी को ब्लेम नहीं करना या उधार चुकाने का इंतजाम करके जाने के पीछे परिवार को परेशानी से बचाने की भावना होती है। सुसाइड नोट दो तरीके से लिखे जाते हैं। एक- जो अचानक से जान देने का फैसला करते हैं। ऐसे लोग कुछ शब्द लिखकर छोड़ जाते हैं। या कई बार बिना कोई नोट लिखे ही सुसाइड कर लेते हैं।

आखिरी चिट्‌ठी में लव अफेयर और आर्थिक परेशानियों का सबसे ज्यादा जिक्र

इसी तरह की एक स्टडी 2006 में दिल्ली के यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंस के मनोवैज्ञानिकों ने भी की। इस दौरान उन्होंने पाया कि सुसाइड नोट लिखने वाले 55 फीसदी लोगों की उम्र 21 से 30 साल के बीच थी, जिनमें 65 फीसदी पुरुष थे। 80 फीसदी लोगों ने आत्महत्या के लिए अपना ही घर चुना। 20 फीसदी लोगों ने सुसाइड नोट अपने भाई-बहन के नाम लिखा। लव अफेयर और आर्थिक परेशानियां सुसाइड नोट में जान देने की सबसे कॉमन वजह रही। 52 फीसदी से ज्यादा मामलों में पीड़ित हताशा और डिप्रेशन के शिकार थे।

सुसाइड के सिग्नल्स पहले डिकोड कर लें तो बचा सकते हैं कई जान

डॉ. नेहा सईद का कहना है कि सुसाइड करने वाले व्यक्ति में इसके लक्षण पहले ही नजर आने लगते हैं। इसके जरिए परिजनों और दोस्तों को बताया जा सकता है कि व्यक्ति में वॉर्निंग साइन आ रहे हैं। सुसाइड के कई स्टेज होती हैं, जिनमें इंडिकेटर्स छुपे होते हैं। इन्हें समझते हैं।

  • ख्याल आनाः खुद को खत्म करने का विचार। जब इंसान सोचने लगे है कि उसका जीना बेकार है।
  • प्लानिंगः सुसाइड कैसे करें। कई बार व्यक्ति रेकी करता है और तय करता है कि कैसे मरना है।
  • एक्शनः सुसाइड की तैयारी करता है। जान देने के लिए चीजें जुटाता है।
  • सुसाइडः वह पल जब इंसान सुसाइड करता है।

कैसे पहचानें कि व्यक्ति खुदकुशी के बारे में सोच रहा

डॉ. रेड्डी का कहते हैं कि वॉर्निंग साइन को दो तरह से समझा जा सकता है। एक सुसाइड करने वाले की बातों से और दूसरा-उसके व्यवहार से। जैसे बातचीत में कहे कि, ’मैं खुद को संभाल नहीं पा रहा हूं’ ,’फ्रस्टेट हो गया हूं’, ‘मेरे कारण घर-परिवार के लोग तकलीफ झेल रहे’, ‘अब जीने का कोई फायदा नहीं’, ऐसे में व्यक्ति खुद को दोषी मानता है।

दूसरा है- व्यवहार में बदलाव। जैसे कई दिनों से वॉट्सऐप पर मैसेज नहीं देखना। सोशल मीडिया पर किसी पोस्ट पर कोई रिएक्शन न दे। किसी से बात नहीं करना, अचानक से बार-बार गुस्सा करना, किसी काम में मन नहीं लगना।

वॉर्निंग साइन के बारे में जानने के बाद सुसाइड को तमाशा बनाकर दिखाने के चलन की वजह को समझते हैं।

आजकल सोशल मीडिया पर लाइव सुसाइड करने का ट्रेंड बढ़ा है, आइए-समझते हैं इसके पीछे की मानसिकता

इंडियन साइकेट्रिक सोसाइटी के सुसाइड प्रिवेंशन स्पेशियलटी सेक्शन के को-ऑर्डिनेटर डॉ. सुजीत सारखेल का मानना है कि सुसाइड नोट का मॉडर्न वर्जन लाइव सुसाइड है। सुसाइड नोट लिखित होता है, लेकिन लाइव सुसाइड में खुदकुशी करने वाला कैमरे के जरिये ज्यादा से ज्यादा से लोगों तक अपनी बात पहुंचाना चाहता है। इसका सबसे बड़ा नुकसान ये है जिसके मन में खुदकुशी के विचार आते हैं, ऐसे लाइव सुसाइड उसको आत्महत्या के लिए उकसाते हैं।

पोस्ट लाइक या शेयर करने से पता लगाएं कि खुदकुशी करना चाहता है व्यक्ति

रांची के सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकेट्री के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. वरुण एस मेहता बताते हैं कि सोशल मीडिया प्रोफाइल देखकर पता लगाया जा सकता है कि वह कैसे पोस्ट लाइक या शेयर करता है या किस ग्रुप का वह सदस्य बना है। ऐसे लोग सामने नहीं रहते, इसलिए उनके लक्षणों को पहचानना मुश्किल हो जाता है।

लाइव सुसाइड की तरह मास सुसाइड भी लोगों को उकसाती है

बीते कुछ समय में मास सुसाइड का ट्रेंड भी देखने को मिला है। जुलाई 2018 में दिल्ली के बुराड़ी और झारखंड के हजारीबाग में मास सुसाइड की घटनाएं हुईं। इसके बाद से ऐसी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। मास सुसाइड के क्या कारण हैं इस पर डॉ. सारखेल के अनुसार मास सुसाइड की चपेट में आए ज्यादातर लोग परिस्थितियों से अनजान होते हैं। जैसे बच्चे, पत्नी, मां-बाप और भाई-बहन। डॉ. वरुण के मुताबिक, मास सुसाइड का खतरनाक पहलू ये है कि ऐसा होने पर गूगल पर रिलेटेड सर्च बढ़ जाती है। हालांकि, गूगल सुसाइड या उससे जुड़े तरीकों को प्रोत्साहन नहीं देता और फौरन ही हेल्पलाइन नंबर या काउंसिलिंग की बात कहता है।

क्या महिलाएं पुरुषों के मुकाबले आत्महत्या कम करती हैं

NCRB के अनुसार 2021 में 1.65 लाख लोगों ने भारत में आत्महत्या की। इनमें 45 हजार महिलाएं और 1.19 लाख पुरुष थे। तो क्या पुरुषों के मुकाबले महिलाएं सुसाइड कम करती है? डॉ. वरुण इस बात को नहीं मानते। वह कहते हैं कि औसतन 20 लोग सुसाइड की कोशिश करते हैं, इसमें एक की जान जाती है। NCRB सुसाइड की कोशिश करने वालों का डेटा काउंट नहीं करता। डॉ. वरुण की राय में भारतीय समाज में महिलाओं के सुसाइड को लोग नेचुरल या एक्सिडेंटल डेथ बताते हैं। वे डरते हैं कि सुसाइड की बात सामने आने पर दहेज प्रताड़ना के आरोप लगेंगे।

सही समय पर काउंसिलिंग से बच सकती है जान

2014 में अमेरिका की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी ने आत्महत्या की कोशिश करने वालों के एक ग्रुप की साइकोसोशल काउंसलिंग की। काउंसलिंग के पहले साल में इन लोगों में आत्महत्या की दर 27 फीसदी तक कम हो गई। 5 साल बाद भी काउंसलिंग में शामिल होने वालों के आत्महत्या करने के मामले में 26 फीसदी तक कमी आई। 10 साल बाद भी लोगों पर काउंसलिंग के सकारात्मक असर दिखाई दिए। जून 2022 में 'द लांशेट साइकेट्री' ने डिप्रेशन से जूझ रहे मरीजों के बारे में एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसके मुताबिक ‘इलेक्ट्रोकंवल्सिव थेरेपी’ से इन मरीजों के आत्महत्या करने की दर में 50 फीसदी तक कमी आई।

ग्रैफिक्सः सत्यम परिडा

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