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आपका जुड़वां अमेरिका में तो नहीं पी रहा चाय:DNA की खुराफात, मामूली फर्क का फायदा उठाकर गढ़ रहा अपना हमशक्ल

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: मृत्युंजय
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बॉलीवुड के एवरग्रीन यंगमैन अनिल कपूर को उनका हमशक्ल मिला है। वह कोई इंडियन नहीं, बल्कि एक अमेरिकी बॉडी बिल्डर है। जॉन एफर नाम के इस बॉडी बिल्डर ने कुछ दिन पहले इंस्टाग्राम पर अपनी एक फोटो अपलोड की।

देखते ही देखते यह फोटो भारत में वायरल होने लगी। फोटो देख लोग इस सोच में पड़ गए कि अनिल कपूर ने रातोंरात ऐसी बॉडी कैसे बना ली। ये अनिल कपूर नहीं बल्कि उनके हमशक्ल जॉन एफर थे।

लोगों को भरोसा नहीं हो रहा था कि भला दो अलग-अलग देश, नस्ल और प्रोफेशन के इंसान में इतनी समानता कैसे हो सकती है। वो भी तब जब दोनों की उम्र में 40 साल का फासला हो।

जरा सोचकर देखिए, बिल्कुल आपके जैसा दिखने वाला कोई शख्स अमेरिका में बैठा कॉफी पी रहा हो। बिल्कुल उतनी ही चम्मच चीनी वाली जितनी आप पंसद करते हैं।

आप उस शख्स से कभी मिले नहीं, न ही वो आपका कोई रिश्तेदार है, लेकिन रंग-रूप, वजन में वह बिल्कुल आपकी तरह होगा। और तो और उसकी आदतें भी आपसे मिलती होंगी। अब अनिल कपूर के हमशक्ल जॉन को ही ले लीजिए। उनको हॉलीवुड से ज्यादा बॉलीवुड की फिल्में अच्छी लगती हैं और अनिल कपूर उनके पसंदीदा एक्टर हैं।

आपकी तरह दिखने वाले एक से अधिक इंसान दुनिया के अलग-अलग कोनों में मौजूद हो सकते हैं।

नीचे तस्वीर में दाईं तरफ बॉलीवुड एक्टर अनिल कपूर हैं जबकि बाईं ओर उनके हमशक्ल जॉन एफर। आप भी देखिए, दोनों में कितना कम अंतर है।

फोटोग्राफर दुनिया के सामने लाया कुदरत की कमजोरी!

अभी कुछ महीने पहले ही एक फोटोग्राफर के सर्वे ने साइंस की दुनिया में खलबली मचा दी थी। कैनेडियन फोटोग्राफर फ्रांस्वा ब्रुनेले 1999 से एक जैसे दिखने वाले अनजान लोगों की फोटोग्राफी कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने दुनिया भर की ख़ाक छानी।

फ्रांस्वा ब्रुनेले ने जिन हमशक्लों की तस्वीरें उतारी थीं; स्पेन के जोसेप करेरास ल्यूकेमिया रिसर्च इंस्टीट्यूट ने उन पर रिसर्च की। शोध के बाद रिसर्चर्स के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा।

इसके नतीजे में पाया गया कि एक जैसे दिखने वाले लोग व्यवहार और DNA सीक्वेंसिंग में भी काफी हद तक एक-दूसरे के समान थे। यह रिसर्च ‘सेल रिपोर्ट्स जर्नल’ में पब्लिश हुई है। इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने दुनिया भर के एक जैसे दिखने वाले 16 जोड़ों का एनालिसिस किया।

एक जैसे दिखने वाले अनजान लोगों का रिश्ता क्या कहलाता है?

अनजान लेकिन दिखने में बिल्कुल एक जैसे दिखने वाले लोगों को ‘डॉपलगैंगर’ कहा जाता है। ‘कार्बन कॉपी’ या ‘डॉपलगैंगर’ दिखने में एक जैसे होते हैं; उनके व्यवहार भी एक जैसे होते हैं, लेकिन उनमें कोई खून का रिश्ता नहीं होता। दो ‘डॉपलगैंगर’ दुनिया के दो कोनों में पाए जा सकते हैं। हालिया मामले में रिसर्च करने वालों ने इन्हीं ‘डॉपलगैंगर’ पर नई खोज की है।

सबसे पहले इस ग्राफिक की मदद से डॉपलगैंगर और जुड़वां के अंतर को समझ लेते हैं

अनजान लोगों का DNA मिलना बड़ी बात, कुदरत की क्षमता पर उठा सवाल

अभी तक हम यह मान कर चलते थे कि प्रकृति ने हर इंसान को एक खास खूबी से नवाजा है; जो केवल उसी में पाई जाती है। उसका फिंगर प्रिंट, उसकी आंखें भी अलग होती हैं।

इंसानी सभ्यता की शुरुआत से लेकर अब तक ऐसी ही सोच रही है। लेकिन मौजूदा समय में जब दुनिया की आबादी 700 करोड़ को पार कर गई है; इंसान एक-दूसरे जैसे होने लगे हैं।

कई जानकारों ने यह सोचा कि क्या अब प्रकृति के पास इंसानों के नए डीएनए ही नहीं रहे? जिसके चलते दो या उसके अधिक इंसान एक जैसे होने लगे हैं।

इसका मतलब यह भी निकाला गया कि कुदरत के पास अब इंसानों के ज्यादा मॉडल नहीं बचे हैं। जिसके चलते एक जैसे कई इंसान जन्म ले रहे हैं।

यह बिल्कुल ऐसा है जैसे किसी कॉस्टयूम डिज़ाइनर के पास नए डिजाइन आइडिया नहीं बचे हैं। जिसकी वजह से वह अपने पुराने डिजाइनों को रिपीट कर रहा है।

अब आगे बढ़ने से पहले इस पोल पर अपनी राय देते चलें...

कुदरत के करिश्मे पर उठते सवालों पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट

कुदरत की क्षमताओं पर उठते सवाल के बीच एक्सपर्ट्स की राय काफी बंटी हुई है। इस मामले में साइंस और सोशल साइंस के बीच भी एक टकराव नजर आता है।

लखनऊ यूनिवर्सिटी में एंथ्रोपोलॉजी की प्रोफेसर डॉ. नीतू सिंह कहती हैं- ‘दुनिया के दो कोनों में एक जैसे इंसान हो सकते हैं। लेकिन इसे संयोग ही माना जाए तो अच्छा है। दो इंसानों के जेनेटिक कोड कभी भी एक से नहीं हो सकते। सैपियंस यानी मानव सम प्राणियों (जैसे बंदर- लंगूर) तथा होमो सेपियैन्स यानी इंसान के DNA में 98 प्रतिशत तक समानता है। केवल 2 प्रतिशत के अंतर होने पर पृथ्वी के विभिन्न भाग के लोगों के रूप, रंग, त्वचा, बाल और क़द में काफी अंतर देखा जा सकता है। आज तक हमें एक जैसे DNA और फिंगर प्रिंट वाले दो इंसान नहीं मिले हैं। क़ुदरत बहुत शक्तिशाली है, उसकी क्षमताओं पर सवाल उठाना जल्दबाजी होगी।’

वहीं एंथ्रोपॉलोजिस्ट कृतिका जोशी ‘डॉपलगैंगर’ वाली रिसर्च से सहमत हैं। वो कहती हैं- ‘पहले अलग-अलग नस्ल और जाति के लोग आपस में शादियां नहीं करते थे। लेकिन आज अलग-अलग नस्ल, जातीय समूह, धर्म और राष्ट्रीयता के लोग आपस में शादी करके परिवार बढ़ा रहे हैं। निश्चित रूप से इन बच्चों में अपने पूर्वजों की अपेक्षा नस्लीय पहचान कम होगी। इससे दुनिया भर में नस्लीय अंतर कम होता जाएगा और लोग धीरे-धीरे एक जैसे दिखने और होने लगेंगे।'

इसी मामले पर समाजशास्त्री और ह्यूमन बिहेवियर के जानकार प्रोफेसर डॉ. बीएस निगम कहते हैं- 'मेरी समझ से दुनिया यूनिवर्सल DNA की ओर बढ़ गई है। लंबे समय से फिक्शन लेखक और हॉलीवुड वाले इसका अंदेशा जताते रहे हैं। अब यह सच्चाई बनती दिख रही है। इसके कई कारण हैं। आज के समय में पूरी दुनिया का खान-पान, रहन-सहन एक जैसा हो रहा है। कोरोना काल में पूरी दुनिया ने एक जैसा टीका लगवाया। जो चीजें हम इंसानों के शरीर के भीतर जा रही है, चाहे वह खाने-पीने, पर्यावरण या सोच किसी भी शक्ल में हो, एक जैसी है और हमें एक जैसा बनाती जा रही है। इंसानी समाज एक-दूसरे के इतना करीब पहले कभी नहीं आया था, जितना आज है।'

अब जब हम एक जैसा खा-पहन और सोच रहे हैं। तो आने वाले समय में यूनिवर्सल DNA की बात सच साबित हो सकती है। हम सभी एक-दूसरे के ज्यादा करीब होंगे। हमारे बीच का अंतर कम होगा और एक समय यह अंतर खत्म भी हो सकता है।

हमशक्लों की बढ़ती संख्या, स्पर्म डोनेशन भी है एक वजह

IVF और स्पर्म डोनेशन हो सकती है एक वजह

दुनिया भर में एक जैसे दिखने वाले इंसानों के होने का एक कारण IVF और स्पर्म डोनेशन भी है। कई प्रोफेशनल स्पर्म डोनर हजारों बार स्पर्म डोनेट कर चुके हैं। ऐसे में दुनिया भर में पैदा होने वाले उनके बायोलॉजिकल बच्चे आपस में एक जैसे हो सकते हैं। भले ही उन्हें यह पता न हो कि उसका आपस में रिश्ता क्या है।

आयुष्मान खुराना की चर्चित फिल्म 'विकी डोनर' का आपको आखिरी सीन याद होगा, जब डॉक्टर बलदेव चड्‌ढा एक पार्क में खेल रहे बच्चों को दिखाते हुए स्पर्म डोनर विकी अरोड़ा को बताता है कि ये सारे बच्चे तुम्हारे ही हैं।

‘ताश की गड्डी से बार-बार एक ही पत्ता निकल सकता है’

‘लाइव साइंस’ की एक रिपोर्ट में कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में न्यूरोबायोलॉजी एंड बिहेवियर के सहायक प्रोफेसर माइकल शीहान ने बताया, ‘यह बिलकुल ऐसा है जैसे ताश की गड्डी को अच्छे से फेंटने के बावजूद एक ही पत्ता बार-बार निकले। ऐसा बिल्कुल संभव है।’

पहले प्रजातियां खत्म हुईं अब उप-प्रजातियों पर खतरा, समझिए इस ग्राफिक से

3 लाख साल पहले हमारे जैसे और भी इंसानी प्रजातियां थीं

आज से लगभग तीन लाख साल पहले धरती पर इंसानों की कम से कम 9 प्रजातियां मौजूद थीं। मूल रूप से ये सभी इंसान थे, बस इसकी खोपड़ी, हड्डियों और शारीरिक बनावट में थोड़ा-बहुत अंतर था। लेकिन समय के साथ बाकी सभी इंसानी प्रजातियां खत्म हो गईं। आज केवल हम यानी ‘होमो सैपियंस’ ही इस धरती पर बचे हैं। होमो सैपियंस की भी कई उप प्रजातियां हैं। जैसे अफ्रीकन, कॉकेशनियन, मंगोल आदि। ऐसे में अनुमान लगाया जा रहा है कि बाकी इंसानी प्रजातियों की तरह ये अलग-अलग उप-प्रजातियां भी खत्म हो जाएंगी और घुल-मिल कर केवल एक जैसे इंसान बचेंगे।

सभी एक जैसे हो जाएं तो बीमारियों से कोई नहीं बच पाएगा

दुनिया के सारे लोग एक जैसे हो जाएं, उनमें रंग, नस्ल, भाषा का भेद खत्म हो जाए; ये बात सुनने में तो अच्छी लगती है। लेकिन इसके कुछ गंभीर खतरे भी हैं। एंथ्रोपॉलोजिस्ट कृतिका जोशी कहती हैं ‘जैसा हमने देखा कि कोविड महामारी का प्रभाव कुछ नस्ल के लोगों पर अधिक तो कुछ पर कम था। ऐसी स्थिति में अगर कोई गंभीर महामारी फैलती है तो कुछ जातियां सर्वाइव कर पाने में सफल होंगी। लेकिन अगर धरती पर सारे लोग एक जैसे हुए तो उनमें बीमारियों से लड़ने की शक्ति भी एक जैसी होगी। अब मान लीजिए कि कोई खतरनाक बीमारी फैले तो ऐसे में कोई भी नहीं बचेगा। पूरी इंसानी सभ्यता खतरे में पड़ जाएगी।

आखिर दो इंसानों का DNA सामान्य तौर पर एक-दूसरे से कितना मिलता है, इस ग्राफिक में जानिए

क्या है जो दो इंसानों को एक-दूसरे से अलग बनाता है

एक जैसी आदतों और चेहरे-मोहरे के साथ पैदा हो रहे लोगों के बीच एक सवाल यह उठता है कि आखिर वह कौन-सी चीज है जो दो इंसानों को अलग-अलग रूप देती है। उसी चीज के कमजोर पड़ने से वैज्ञानिक भी हैरान हो रहे हैं।

इंसान का शरीर करोड़ों-अरबों कोशिकाओं से बना बना होता है। इंसान की लगभग हर कोशिका में DNA पाया जाता है और उसमें जीन नाम का एक अत्यंत छोटा कण होता है। यही जीन अनुवांशिक गुणों को एक-पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाता है।

जीन ठीक उसी तरह काम करता है जैसे कोई मेमोरी कार्ड। जीन में हमारी कई पीढ़ियों का डेटा होता है। उस विशाल डेटा में से रेंडमली किसी भी डेटा को हमारी बॉडी दिखा सकती है। मान लीजिए कि किसी के मां-बाप या दादा-दादी की आंखें नीली नहीं हैं।

लेकिन पांच पीढ़ी पहले उसके खानदान के किसी शख्स की आंखें नीली रही हों तो ऐसे में पूरी संभावना है कि कई पीढ़ियों बाद भी जीन में मौजूद उस डेटा की वजह से परिवार में किसी की आंखें नीली हो जाएं। उदाहरण के तौर पर बॉलीवुड के दिग्गज एक्टर राज कपूर की आंखें नीली थीं, लेकिन करिश्मा कपूर को छोड़कर तीन-चार पीढ़ियों में कपूर खानदान के किसी शख्स की नीली आंखें नहीं थीं। इसकी पूरी संभावना है कि राज कपूर के DNA की वजह से कपूर खानदान की आने वाली किसी पीढ़ी के किसी बच्चे की आंखें नीली हों।

वो वैज्ञानिक, जिन्होंने DNA और जीन पर की अहम खोज

क्या होगा अगर दो लोगों का DNA और फिंगरप्रिंट 100% मैच करने लगे

आज के समय में हमारी पूरी सोसाइटी DNA के इर्द-गिर्द गुंथी हुई है। अपराधी पकड़ने से लेकर वारिस साबित करने और बीमारियों के इलाज तक में DNA की भूमिका है। ह्यूमन सोसाइटी का पूरा सिस्टम इस आज आधार पर टिका है कि ‘एक इंसान दूसरों से अलग होता है।’ इसी अलग पहचान का इस्तेमाल दफ्तरों में अटेंडेंस के लिए, बैंक और परीक्षाओं, सुरक्षा जांच और अपराधियों को पकड़ने के लिए के लिए भी किया जाता है।

आगे बढ़ने से पहले इस ग्राफिक में जानिए DNA का दिलचस्प राजनीतिक कनेक्शन, जिसे पढ़कर आपके चेहरे पर मुस्कान आ जाएगी।

...तो सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के लिए दो लोगों में फर्क करना संभव नहीं होगा

DNA के इसी खुराफात के चलते दो लोगों के बीच का यह अंतर कम हो रहा है। जिसकी वजह से मौजूदा व्यवस्था के चरमराने का खतरा बढ़ गया है। अगर दो लोगों का DNA, फिंगर-प्रिंट या आंखों की पुतलियां थोड़ी भी मिलने लगीं तो पूरी दुनिया के मॉडर्न सिस्टम के सामने सबसे बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाएगी। सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के लिए दो लोगों में फर्क करना संभव नहीं होगा।

केवल ‘डॉपलगैंगर’ ही नहीं जुड़वां और आइडेंटिकल ट्विंस की भी संख्या बढ़ी

‘कुदरत के पास इंसान बनाने का नया सांचा नहीं बचा है’, इस बात की चर्चा इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि हाल के वर्षों में जुड़वां और आइडेंटिकल ट्विंस पहले के मुकाबले ज्यादा पैदा होने लगे हैं।

साइंस जर्नल ‘ह्यूमन रिप्रोडक्शन’ की रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में पैदा होने वाला हर 40वां बच्चा जुड़वां होता है। रिसर्च में शामिल वैज्ञानिकों के मुताबिक यह दर पहले के मुकाबले बहुत ज्यादा है। दुनियाभर में हर साल 16 लाख जुड़वां बच्चे जन्म ले रहे हैं।

मौजूदा वक्त में दुनिया की 2% आबादी जुड़वां लोगों की है। उनकी यह संख्या तेजी से बढ़ भी रही है। कुल आबादी में हिस्सेदारी के नजरिये से यह आंकड़़ा इंसानी इतिहास में अब तक सबसे ज्यादा है।

क्या है जुड़वां लोगों का आंकड़ा, इस ग्राफिक में जानिए

दुनिया में एक जैसे 7 इंसान होने की बात गलत, 1 करोड़ भारतीयों के डॉपलगैंगर

आम धारणा है कि दुनिया भर में एक जैसे दिखने वाले 7 इंसान होते हैं। लेकिन साइंस इस दावे से इत्तेफाक नहीं रखता है। ‘साइंस अलर्ट’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में ऑस्ट्रेलिया में ‘डॉपलगैंगर’ के ऊपर एक रिसर्च हुई। रिसर्च में बताया गया कि ‘हर 135 में से 1 इंसान के ‘डॉपलगैंगर’ होने की संभावना होती है।’ इस रिसर्च की मानें तो भारत की 135 करोड़ आबादी में से लगभग 1 करोड़ लोगों के ‘डॉपलगैंगर’ दुनिया में कहीं न कहीं मौजूद हैं।

हालांकि, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनका चेहरा 100% तो नहीं मगर काफी हद तक एक-दूसरे से मिलता है। इंटरनेट पर कई ऐसी वेबसाइट्स हैं जो ‘डॉपलगैंगर’ से मिलाने का वादा करती हैं।

हालिया दिनों में ऐसी वेबसाइट्स काफी लोकप्रिय हुई हैं। इस पर लोग अपनी फोटो अपलोड कर अपने जैसे दिखने वाले शख्स की तलाश करते हैं।

अब स्टोरी में आगे बढ़ने से पहले जरा अपने देश के एक अनोखे गांव में झांक लिया जाए। इस ग्राफिक में जानिए जुड़वां लोगों के इस गांव के बारे में।

‘अपने जैसे दिखने वाले इंसान पर ज्यादा भरोसा करते हैं लोग’

आखिर दुनिया ‘डॉपलगैंगर’ को लेकर इतनी दीवानी क्यों है? लोग हजारों किलोमीटर का सफर तय करके अपने जैसे दिखने वाले इंसान से मिलने क्यों जाते हैं? इसका जवाब समाजशास्त्री प्रोफेसर डॉ. बीएस निगम देते हैं। प्रोफेसर निगम के मुताबिक, ‘यह इंसानी स्वभाव है कि वह अपने जैसे दिखने वाले इंसान पर ज्यादा भरोसा करता है। अगर कोई चीनी मूल का है तो वह दूसरे किसी भी व्यक्ति के मुकाबले चीनियों पर ज्यादा भरोसा करेगा, उसे अपने करीब पाएगा। यही वजह से कि अपने जैसे दिखने वाले संभावित व्यक्ति के लिए लोग इतने उत्साहित हो रहे हैं। उन्हें लगता है कि उनका ‘डॉपलगैंगर’ उन्हें दुनिया में सबसे बेहतर समझ पाएगा।’

अपने हमशक्ल की कल्पना करना सुखद एहसास हो सकता है। एक्सपर्ट के इस दावे के बाद कि आपका डॉपलगैंगर आपको सबसे अच्छे से समझ सकता है; किसी का भी अपने डॉपलगैंगर से मिलने के लिए बेकरार होना स्वाभाविक है। उम्मीद करते हैं आपका भी डॉपलगैंगर दूर कहीं बैठा ऐसी ही खबर पढ़ रहा होगा।

ग्राफिक्स: सत्यम परिडा

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