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आत्मनिर्भरता की मिसाल:बिहार की जीविका दीदियों ने फिर किया कमाल, कैंटीन चलाने, मास्क बनाने के बाद अब बनीं चाय कंपनी की मालकिन

नई दिल्लीएक महीने पहले
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  • 'दीदी की रसोई' नाम से जिला अस्पतालों में चलाती हैं कैंटीन
  • कोरोना काल में देशभर में मिथिला पेटिंग मास्क को बनाया पॉपुलर

बिहार की जीविका दीदियां हर दिन नए-नए कीर्तमान स्थापित कर रही हैं. एक बार फिर से अपनी मेहनत और लगन की वजह से सुर्खियों में हैं। दरअसल चाय की खेती से जुड़ी जीविका दीदियों पर सरकार ने भरोसा दिखाते हुए उन्हें कई मौके और संसाधन उपलब्ध कराए हैं। इनमें छोटे स्टार्ट अप, कैंटीन चलाना, खेती, रोजमर्रा की जरूरी चीजों का उत्पादन जैसी कई जिम्मेदारियां सौंपी हैं।

चाय कंपनी की शेयरहोल्डर भी बनेंगी

किशनगंज जिले की जीविका दीदियां राज्य के पहले फार्मर प्रोड्यूसर चाय कंपनी की कर्ताधर्ता होंगी। अगले तीन साल के लिए बिहार सरकार प्रोसेसिंग और पैकेजिंग यूनिट को जीविका को हैंडओवर करेगी। जीविका दीदियां सिर्फ ना सिर्फ चाय कंपनी को चलाएंगी बल्कि कंपनी में शेयरहोल्डर भी होंगी। कंपनी का नाम महानंदा जीविका महिला एग्रो प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड होगा।

कोरोना टाइम में बनाए मिथिला पेंटिंग वाले मास्क

कोरोना के टाइम में बिहार की जीविका दीदियों ने मिसाल कायम की। मास्क-सैनिटाइजर की अफरातफरी के बीच लगभग एक हजार जीविका दीदियों ने मिथिला पेंटिंग के प्रिंट वाले मास्क बनाए। ये मास्क इतने पॉपुलर हुए कि देश के अलग-अलग कोने से इसे लोगों ने खरीदा। जीविका परियोजना के तहत इन लोगों नौ लाख मास्क तैयार किया। वो भी काफी सस्ती दरों में। इससे इन्होंने लगभग 80 से 90 लाख रुपये का कारोबार किया और करीब 40 लाख रुपये की आमदनी हुई।

सरकारी अस्पतालों में चला रहीं कैंटीन

जीविका समूह की महिलाएं राज्य के जिला अस्पतालों में रसोई का जिम्मा संभाला रही हैं। इस रसोई को नाम दिया गया है 'दीदी की रसोई'। वैशाली जिला अस्पताल से शुरू हुई ये रसोई अब राज्य के सभी जिला अस्पतालों तक पहुंचने वाली है। मुख्यमंत्री ने इसी साल जनवरी में राज्य भर के जिला अस्पतालों में 'दीदी की रसोई' को शुरू करने का निर्देश दिया था।

पोखरों और तालाब संवारने का काम

इसी महीने सितंबर 2021 में ही ग्रामीण विकास विभाग ने जीविका दीदियों को पोखरों और तालाबों को संभालने का काम दिया है। जीविका दीदियों की मेहनत का ही नतीजा है कि बिहार के पूर्णिया जिले में मनरेगा के तहत तैयार 200 पोखरों एवं तालाबों की जिम्मेवारी इन्हें दी गई है।

क्या है जीविका दीदियों का ग्रुप?

बिहार सरकार ने विश्व बैंक की सहायता से 2 अक्टूबर, 2007 में जीविका समूह की शुरुआत की थी। महिला सशक्तिकरण और गरीबी रेखा के नीचे के लोगों को ऊपर उठाने के लिए सरकार ये परियोजना लेकर आई। पूरे राज्य में इसका विस्तार दो साल बाद किया गया। इसका मकसद गरीबों और ग्रामीण महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत करना है। साथ ही बिहार ग्रामीण आजीविका परियोजना ( BRLPS) के जरिए ग्रामीण आजीविका विकल्पों में सुधार करना है।

अभी दूर है मंजिल?

जीविका दीदियों की उपलब्धि को समझने के लिए हमने सामाजिक कार्यकर्ता और जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र संस्था के सेक्रेटरी सुरेंद्र कुमार से बात की। इस खबर पर उनकी राय बहुत अलग दिखी। उनका मानना है कि जिस तरीके से सरकारी प्रचार-प्रसार होता है, उसका दस फीसदी भी जमीन पर काम नहीं है। महिलाओं की स्थिति में खास सुधार नहीं आया है। इस परियोजना में वर्ल्ड बैंक का पैसा इंफ्रास्ट्रक्चर के बजाए एडिमन और ऑफिस में ज्यादा खर्च हो जाता है। जीविका समूह की महिलाएं आज भी छोटा-मोटा कर्ज लेकर बैठी हैं। उनके पास काम नहीं है और ना ही इंफ्रास्ट्रक्चर।

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