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परमाणु हमले से बेअसर करेगा आयोडीन:इसके दो रूप; एक रेडिएशन में रक्षक-दूसरा भक्षक, यूरोप में दोगुने दाम में बिक रहीं इसकी टैबलेट

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: संजय सिन्हा
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यूक्रेन पर परमाणु बम से हमला होने की आशंका बढ़ते ही यूरोपीय देशों में आयोडीन की मांग बढ़ गई है। कई देशों में दोगुनी कीमत पर पोटैशियम आयोडाइड की टैबलेट बेची जा रही है। दवा दुकानों में इसकी किल्लत हो गई है।

लोग ऑनलाइन भी इसे खरीद रहे हैं। पोलैंड से लेकर बुल्गारिया तक पोटैशियम आयोडाइड की डिमांड है। वैसे तो 24 फरवरी 2022 को जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तब से ही यूरोपीय देश परमाणु हमले की आशंका जताते रहे हैं।

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 24 सितंबर 2022 को क्या कहा, पहले यह जान लेते हैं।

‘जो लोग हमें परमाणु बम को लेकर ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रहे हैं वो जान लें कि हवा उल्टी दिशा में भी बह सकती है। यह कोई गीदड़ भभकी नहीं है।’

पुतिन के इस बयान के बाद केवल यूक्रेन और यूरोप के दूसरे देश ही नहीं, रूस में भी बेचैनी बढ़ गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि परमाणु बम से हमला होने पर रूस और उसके पड़ोसी देश बेलारूस में भी बड़े स्तर पर रेडिएशन हो सकता है।

इसे देखते हुए ही तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। रूस में जहां न्यूक्लियर पावर प्लांट हैं वहां के आसपास रहने वाली आबादी को दूसरी जगह शिफ्ट किया जा रहा है। नागरिकों को पोटैशियम आयोडाइड की टैबलेट बांटी जा रही हैं।

आयोडीन की कमी से दुनियाभर में थायरॉयड की बीमारियों से लोग जूझ रहे हैं। यूक्रेन पर परमाणु बम से हमला होने पर कैसे यह महामारी बन जाएगी, इसे समझते हैं।

वैसे हम सभी आयोडीन नमक के बारे में जानते हैं और यह हमने सरकारी विज्ञापनों में भी देखा है कि आयोडीन युक्त नमक खाने से घेंघा रोग नहीं होता है। लेकिन कैसे परमाणु बम फटने पर रेडियोएक्टिव आयोडीन खामोशी से शरीर में पहुंचकर नुकसान पहुंचाता है। आइए इसे समझते हैं।

मेंटल डिसऑर्डर से भी पीड़ित हो सकते हैं लोग

अगर किसी न्यूक्लियर पावर प्लांट पर हमला होता है तो विस्फोट से सबसे पहले हवा में रेडियोएक्टिव आयोडीन तैरने लगते हैं। इसका रासायनिक नाम I-131 है। रेडियोएक्टिव आयोडीन सांस के जरिए या स्किन के जरिए शरीर में प्रवेश करता है।

यह गले में मौजूद थायरॉयड ग्लैंड के टिश्यूज को नष्ट करता है जिसके कारण कैंसर होता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई व्यक्ति कब रेडिएशन के संपर्क में आता है, इसका पता नहीं चलता।

रेडियोएक्टिव आयोडीन को न तो देख सकते हैं, न सूंघ सकते हैं और न ही इसके स्वाद का पता चलता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि रेडिएशन के कारण केवल थायरॉयड कैंसर ही नहीं, ट्यूमर भी बनने लगते हैं। ल्यूकेमिया, आंखों की बीमारी और कई तरह के मेंटल डिसऑर्डर से भी लोग पीड़ित होते हैं।

जब कोई अधिक रेडिएशन के संपर्क में आता है तो महज कुछ घंटों में मौत हो जाती है। जैसा कि 1945 में परमाणु हमले के बाद जापान के शहरों हिरोशिमा और नागासाकी में देखने को मिला था।

अब सवाल है कि क्या आयोडीन टैबलेट लेने से सचमुच रेडिएशन से बचा जा सकता है। इसका जवाब जानने से पहले थायरॉयड ग्लैंड के बारे में समझ लेते हैं।

हमारे शरीर में मौजूद थायरॉयड ग्लैंड खुद से आयोडीन नहीं बनातीं। आयोडीन खाने-पीने की चीजों से हमें मिलता है। यह टैबलेट के रूप में भी मौजूद है। जब हम इसे खाते हैं तो थायरॉयड ग्लैंड में आयोडीन जमा हो जाता है जो थायरॉक्सिन (T4) और ट्रायडोथायरोनीन (T3) हाॅर्मोंस बनाने का काम करता है।

इन हाॅर्मोंस की वजह से शरीर के कई अंग काम करते हैं। यह ब्रेन के विकास के लिए भी जरूरी है। थ्योरी यह है कि जब थायरॉयड में पर्याप्त अच्छे आयोडीन जमा हो जाते हैं तो रेडियोएक्टिव आयोडीन शरीर में दाखिल होकर भी कुछ नहीं कर पाता। यह बिना किसी दूसरे अंग को प्रभावित किए किडनी से होते हुए बाहर निकल जाता है।

आगे बढ़ने से पहले ग्रैफिक से जानते हैं कि रेडिएशन किस तरह असर डालता है और किस उम्र के लोग प्रभावित होते हैं।

अब जानते हैं कि नेचुरल आयोडीन और रेडियोएक्टिव आयोडीन में क्या फर्क होता है।

आयोडीन 37 तरीके के होते हैं। इनमें से केवल एक ही ‘आयोडीन-127’ हमारे वातावरण में पाया जाता है, जो हमें नुकसान नहीं पहुंचाता। इसमें रेडियोएक्टिव मेटेरियल नहीं होता। ये नेचुरल रूप से मिलने वाला आयोडीन बैंगनी रंग का होता है।

लेकिन ‘आयोडीन-131’ रेडियोएक्टिव है। आयोडीन-131 जब थायरॉयड ग्लैंड्स में प्रवेश करता है तो थायरॉयड ग्लैंड कन्फ्यूज हो जाती है कि यह नेचुरल आयोडीन है या रेडियोएक्टिव आयोडीन। शरीर में प्रवेश करने पर रेडियोएक्टिव आयोडीन आसपास के टिश्यूज को नष्ट करने लगता है। शरीर के दूसरे अंगों में भी ट्यूमर बनने लगते हैं।

इससे DNA को भी नुकसान पहुंचता है जो हिरोशिमा और नागासाकी में देखा गया था। यहां बरसों तक पीढ़ियों पर रेडियोएक्टिविटी का असर दिखता है।

1945 में दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान हुए परमाणु बम से हमले के बाद 1986 में बड़ा हादसा यूक्रेन के चेर्नोबिल न्यूक्लियर प्लांट में हुआ। कैसे यह बड़ी आपदा साबित हुई, इसे समझते हैं।

चेर्नोबिल हादसे के बाद पोटैशियम आयोडाइड ने क्या काम किया था? रेडियोएक्टिविटी होने से पहले इसे न लिया तो क्या होता है, ये भी जान लेते हैं।

अमेरिका की न्यूक्लियर रिएक्टर इंजीनियर कैथरीन हफ बताती हैं कि 1986 में उत्तरी यूक्रेन के प्रिपायत में चेर्नोबिल न्यूक्लियर प्लांट में विस्फोट हुआ था। तब हिरोशिमा में परमाणु हमले से निकले रेडिएशन के मुकाबले चेर्नोबिल में 400 गुना ज्यादा रेडिएशन हुआ था।

तब घटना के कुछ दिनों बाद लोगों को पोटैशियम आयोडाइड के टैबलेट बांटे गए थे। लेकिन तब तक लोगों के शरीर में रेडियोएक्टिव आयोडीन प्रवेश कर चुका था। यह भी देखा गया कि जब अधिक मात्रा में पोटैशियम आयोडाइड लिया गया तो थायरॉयड ग्लैंड का साइज बढ़ गया।

इससे उनकी परेशानी और बढ़ गई। कैथरीन हफ का कहना है कि आयोडीन टैबलेट के कारण कितने लोगों की जान बचाई गई, यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता लेकिन इससे रेडिएशन का असर कम करने में मदद मिली।

कोई अधिक मात्रा में आयोडीन ले तो क्या होगा?

CHIP फाउंडेशन नोएडा के सीईओ और कैंसर एक्सपर्ट डॉ. रवि मेहरोत्रा बताते हैं कि अधिक मात्रा में आयोडीन लेना भी खतरनाक हो सकता है। उदाहरण के लिए जर्मनी में आयोडीन सप्लीमेंट्स खाने से लोग ओवरएक्टिव थायरॉयड के शिकार हो रहे हैं।

‘इंडियन र्जनल ऑफ इंडोक्राइनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म’ के अनुसार, भारत में 4.5 करोड़ लोग थायरॉयड की बीमारी से जूझ रहे हैं। इनमें हाइपरथॉयरडिज्म के भी मरीज हैं। डॉ. मेहरोत्रा बताते हैं कि थायरॉयड ग्लैंड्स एक सीमित समय के लिए आयोडीन को स्टोर रखता है।

बिना किसी परेशानी या डॉक्टर की सलाह के आयोडीन टैबलेट लिए जाते हैं तो इससे थायरॉयड ग्लैंड को नुकसान पहुंचता है। इसमें निकलने वाले हाॅर्मोंस में गड़बड़ियां शुरू हो जाती हैं।

‘मैरीलैंड स्कूल ऑफ मेडिसिन’, अमेरिका की प्रोफेसर इसाबेल लॉरेन जैकसन का कहना है कि आयोडीन सप्लीमेंट्स रेडिएशन के संपर्क में आने के बाद ही लेना चाहिए। इससे बच्चों और युवाओं में थायरॉयड कैंसर के खतरे को कम किया जा सकता है।

आयोडीन केवल नमक में ही नहीं होता। इसके अलग-अलग रूपों का इस्तेमाल उद्योगों में किया जाता है। आगे बढ़ने से पहले इसे जानते हैं।

अब भारत की ओर लौटते हैं। आयोडीन नमक क्यों जरूरी है और सरकार ने कब से इस पर ध्यान देना शुरू किया इसे जानते हैं।

वी रामालिंगास्वामी, टीए सुब्रमनियन और देव एमजी ने अपनी रिसर्च ‘द एटियोलॉजी ऑफ हिमालयन एंडेमिक गॉइटर’ में बताया है कि भारत में नेचुरल रूप से आयोडीन की कमी है। 1956 में भारत सरकार ने एक अध्ययन कराया जिसकी रिपोर्ट में बताया गया कि हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा वैली में आयोडीन की कमी के कारण लोगों में घेंघा बीमारी है।

इसकी रिपोर्ट के आधार पर 1962 में भारत सरकार ने नेशनल गॉइटर कंट्रोल प्रोग्राम (NGCP) की शुरुआत की। इसके जरिए देश के उन इलाकों की पहचान करनी थी जहां आयोडीन की कमी के कारण लोग घेंघा बीमारी से पीड़ित हो रहे थे। NGCP ने बताया कि देश का कोई इलाका ऐसा नहीं है जहां आयोडीन की कमी न हो।

इसके बाद सरकार ने आयोडीन युक्त नमक को लेकर जागरुकता फैलाना शुरू किया। सरकार ने 12 सॉल्ट आयोडाइजेशन प्लांट खोले। 1983 में प्राइवेट कंपनियों को भी आयोडीन युक्त नमक बनाने की अनुमति दे दी। 1992 में बड़ा कदम उठाते हुए सभी तरह के खाने के नमक को आयोडीन युक्त बनाना अनिवार्य कर दिया गया। आयोडीन युक्त नमक को ‘प्रिवेंशन ऑफ फूड अडल्टरेशन एक्ट’ के तहत लाया गया।

1997 में केंद्र सरकार ने गैर आयोडीन युक्त नमक की बिक्री पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। हालांकि कुछ राज्यों के विरोध के कारण सन 2000 में यह प्रतिबंध हटा दिया गया। लेकिन फिर से जब घेंघा के मामले बढ़ने लगे तो 2005 में गैर आयोडीन नमक पर बैन लगा दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने बैन को बताया असंवैधानिक : सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान गैर आयोडीन युक्त नमक की बिक्री पर बैन को असंवैधानिक बताया। जिस PFA एक्ट के तहत इसकी बिक्री पर बैन किया गया था, उस पर सवाल उठाए गए।

सरकार को निर्देश दिया गया कि यूनिवर्सल सॉल्ट आयोडाइजेशन प्रोग्राम को रिव्यू करें। इस पर कोई भी निर्णय करने के लिए अलग नियम बनाएं। दरअसल, याचिका में कहा गया था कि जिन्हें आयोडीन की कमी नहीं है उन्हें भी जबरन आयोडीन युक्त नमक खाने को बाध्य किया जा रहा है। अधिक मात्रा में आयोडीन लेने से शरीर को कई तरह की बीमारियां होने का डर है।

चलते-चलते कुछ सवालों के जवाब जान लेते हैं।

अभी गैर आयोडीन युक्त नमक लोगों के खाने के लिए बेच सकते हैं या नहीं?

जवाब है नहीं। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड रेगुलेशंस 2011 के अनुसार, गैर आयोडीन युक्त नमक लोगों के खाने के इस्तेमाल के लिए नहीं बेचा जा सकेगा।

गैर आयोडीन युक्त नमक का इस्तेमाल किस रूप में होगा?

आयोडीन युक्त बनाने के लिए, जानवरों के लिए, आयरन फोर्टिफिकेशन, प्रिजर्वेशन, दवाइयां बनाने या इंडस्ट्रियल यूज के लिए गैर आयोडीन युक्त नमक बेचा जा सकेगा या इसे स्टोर किया जा सकेगा।

भारत में घेंघा बीमारी से कितने लोग पीड़ित हैं?

भारत में लगभग 6 करोड़ लोग घेंघा बीमारी से पीड़ित हैं जबकि 17 करोड़ लोग आयोडीन डिफिशिएंसी डिसऑर्डर (IDD) से जूझ रहे हैं।

तो यह जान लीजिए कि आयोडीन हमारे शरीर के ठीक से काम करने के लिए जरूरी है। लेकिन मात्रा भी सही होनी चाहिए। अनावश्यक रूप से आयोडीन के सप्लीमेंट्स नहीं लेने चाहिए।

अब जब आयोडीन के बारे में इतनी बातें जान ली है तो यह GK भी देख लेते हैं।

ग्रैफिक: सत्यम परिडा
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