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बांह में रखी ‘तीली’ रोकेगी अनचाही प्रेग्नेंसी:नेपाल जाकर डिवाइस लगवा रहीं भारतीय महिलाएं, पिल्स-कंडोम से ज्यादा असरदार; 3 साल की छुट्टी

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: मनीष तिवारी
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दुनिया का 28वां सबसे गरीब देश नेपाल इन दिनों अनचाही प्रेग्नेंसी रोकने के मामले में रोल मॉडल बना हुआ है। ‘कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स’ की एक छोटी सी डिवाइस इस छोटे से देश को बड़ा बना रही है।

फैमिली प्लानिंग का सबसे पुराना और सफल मॉडल लागू करने वाले भारत में भी अनचाही प्रेग्नेंसी रोकने की करीब 100 फीसदी कामयाब यह तकनीक नहीं अपनाई गई है। यहां से बड़ी संख्या में महिलाएं सीमा पार करके नेपाल जा रही हैं।

कपल्स के लिए अनचाही प्रेग्नेंसी हजारों साल से समस्या बनी हुई है। तभी इससे बचने के लिए तरह-तरह के जतन किए जाते रहे हैं। साढ़े 3 हजार साल पहले इजिप्ट में शहद, पेड़ों की छाल और पत्तियों से बने लेप का इस्तेमाल स्पर्म को यूट्रस में जाने से रोकने के लिए किया जाता था।

दुनिया के पहले कंडोम का जिक्र ग्रीक माइथोलॉजी में मिलता है। जिसके मुताबिक क्रीट के राजा मीनोस के लिए बकरी के ब्लैडर से कंडोम बनाया गया था। आज के जमाने में यूज किए जाने वाले गर्भनिरोधक कब और किसने बनाए, आइए जानते हैं...

इतनी तरह के गर्भनिरोधकों के आविष्कार के बाद भी ऐसे परफेक्ट कॉन्ट्रासेप्टिव की तलाश खत्म नहीं हुई, जो मेल और फीमेल दोनों के लिए सेफ हो, जो उन्हें संतुष्टि दे और जिसे वे बेहिचक, खुलकर अपना सकें। ऐसे में ‘कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स’ कपल्स के लिए बेहतर साबित हो सकते हैं।

'वर्ल्ड कॉन्ट्रासेप्टिव डे' के खास मौके पर जानिए ‘कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स’ मेल-फीमेल के लिए फैमिली लाइफ में कैसे बदलाव ला रहे हैं, इसे 2 केस स्टडी से समझिए...

केस-1

29 साल की मीना पुणे में रहती हैं। 3 बच्चे होने के बाद उन्होंने कॉपर टी लगवा ली, लेकिन इंटरकोर्स के दौरान पति इसकी वजह से असहज महसूस करते थे। फिर कपल इसे निकलवाने फैमिली प्लानिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FPA) के क्लीनिक पहुंचा। वहां काउंसलर ने उन्हें दूसरे तरीके बताए। जिनमें से उन्होंने कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स को चुना, ताकि वे एक-दूसरे के साथ को एंजॉय कर सकें और अनचाही प्रेग्नेंसी से भी बच सकें।

केस-2

23 साल की समीरा वर्किंग मदर हैं। बेटी के एक साल के होते ही वह दोबारा प्रेग्नेंट हो गईं। उन्हें अबॉर्शन कराना पड़ा। फिर वह प्रेग्नेंसी रोकने वाली गोलियां खाने लगीं। इस बीच उन्हें ऐसे कॉन्ट्रासेप्टिव की जरूरत महसूस हुई, जिसे वह लंबे समय तक यूज कर सकें। FPA इंडिया के पुणे स्थित क्लिनिक से समीरा को भी कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स का पता चला। इसे लगवाए हुए उन्हें एक साल हो गया है, लेकिन अब तक किसी तरह की कोई शिकायत नहीं हुई।

FPA इंडिया के पुणे स्थित क्लिनिक में गाइनेकोलॉजिस्ट डॉ. मीनल के पास अक्सर ही ऐसे कपल आते हैं, जिन्हें ऐसी प्रेग्नेंसी से बचने के लिए ऐसे तरीकों की तलाश होती है, जिन्हें सेक्शुअल प्लेजर पर बिना किसी असर के आसानी से यूज किया जा सके। डॉ. मीनल बताती हैं कि कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स मौजूदा सभी तरीकों में सबसे मॉडर्न हैं। इन्हें यूज करना आसान है और ब्रेस्टफीडिंग कराने वाली महिलाओं के लिए भी ये सेफ हैं।

कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स के बारे में और जानकारी हासिल करने से पहले यह जान लीजिए कि गर्भनिरोधक आखिर कितने तरह के होते हैं...

FPA इंडिया की डिप्टी डायरेक्टर जनरल (प्रोग्राम्स) अमिता धनु कहती हैं कि इस डिवाइस के आने से कॉन्ट्रासेप्टिव्स के इस्तेमाल को बढ़ावा मिलेगा। उम्मीद है कि सरकार इसे नेशनल फैमिली प्लानिंग प्रोग्राम में जल्द शामिल करेगी, ताकि ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को इसका लाभ मिल सके।

अब आप सोच रहे होंगे कि कॉन्स्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स क्या हैं? तो आइए सबसे पहले इसी को जानते हैं...

‘माचिस की तीली’ बराबर डिवाइस रोकेगी अनचाही प्रेग्नेंसी

इस मेडिकल डिवाइस का इस्तेमाल प्रेग्नेंसी रोकने के लिए किया जाता है। इसे महिला की बांह में स्किन के अंदर डाल दिया जाता है। फ्लेक्सिबल प्लास्टिक से बने कॉन्स्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स का साइज माचिस की तीली जितना छोटा होता है।

मेडिकल भाषा में इसे फ्लेक्सिबल प्लास्टिक रॉड कहते हैं। इस रॉड से ‘प्रोजेस्टोजन’ (Progestogen) नाम के एक सिंथेटिक हॉर्मोन का रिसाव होता है, जो प्रेग्नेंसी रोकने में मदद करता है। एक बार यह छोटी सी रॉड लगवा ली, तो 3 साल तक के लिए छुट्‌टी। इस बीच, अगर आप प्रेग्नेंट होना चाहें, तो आराम से इसे निकलवाइए और कुछ ही दिनों में अपनी फर्टिलिटी वापस पाइए।

अब जानेंगे कि कॉन्स्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट कैसे काम करता है, लेकिन इसे समझने के लिए यह पता होना जरूरी है कि कोई महिला कैसे प्रेग्नेंट होती है...

यह डिवाइस 3 तरीकों से काम करती है-

1. डिवाइस से प्रोजेस्टोजन हॉर्मोन का रिसाव धीरे-धीरे होता रहता है। इससे शरीर में प्रोजेस्टोजन का स्तर बढ़ जाता है। इससे ओवरी से एग के रिलीज होने की प्रक्रिया रुक जाती है।

2. असल में स्पर्म को यूट्रस के अंदर जाने के लिए सर्विक्स से होकर गुजरना पड़ता है। सर्विक्स में मौजूद लिक्विड स्पर्म को जीवित रहने और तैरने में मदद करता है। इस लिक्विड को सर्वाइकल म्यूकस कहते हैं। प्रोजेस्टोजन हॉर्मोन इसी लिक्विड को गाढ़ा करता है। जिससे स्पर्म आगे नहीं बढ़ पाता।

3. प्रोजेस्टोजन यूट्रस की भीतरी लाइनिंग को बहुत पतला कर देता है। अगर किसी तरह एग और स्पर्म मिल भी जाएं, तो इसके बाद इससे फर्टिलाइज एग यूट्रस में टिक नहीं पाता और मेंस्ट्रुअल पीरियड्स के समय शरीर से बाहर निकल जाता है।

एग और स्पर्म की बात हो रही है, तो यह भी जानें कि इनकी संख्या कितनी होती है और प्रेग्नेंसी में इनकी भूमिका क्या होती है...

6 महीने में 400 महिलाओं ने नेपाल जाकर लगवाई ये डिवाइस

भारत में सरकारी अस्पतालों में कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स नहीं लगाए जाते। प्राइवेट अस्पतालों में भी इन्हें लगवाना आसान नहीं है। जबकि पड़ोसी देश नेपाल के सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर यह फ्री में लगाए जाते हैं।

ऐसे में भारत के कई राज्यों से महिलाएं यह डिवाइस लगवाने के लिए सीमा पार कर पड़ोसी देश नेपाल जा रही हैं।

‘फैमिली प्लानिंग एसोसिएशन ऑफ नेपाल (FPAN)’ परिवार नियोजन के मुद्दे पर नेपाल सरकार के साथ काम कर रही है। FPAN के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर डॉ. नरेश प्रताप के.सी. ने दैनिक भास्कर को बताया, ‘कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स नेपाल में नेशनल फैमिली प्लानिंग प्रोग्राम का हिस्सा हैं। नेपाल में इन्हें लगवाने के लिए डॉक्टर की जरूरत नहीं है। यहां नर्स और स्वास्थ्य कर्मचारी महिलाओं को यह डिवाइस लगा रहे हैं। हमारे पास भारत से आने वाली महिलाओं की संख्या भी काफी ज्यादा है। ये महिलाएं उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से आती हैं।

नेपाल के तराई वाले इलाके में FPAN के 5 क्लिनिक हैं, जहां भारतीय महिलाएं डिवाइस लगवाने जाती हैं...

प्रेग्नेंसी रोकने में 99% से ज्यादा कारगर कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स

यह डिवाइस प्रेग्नेंसी रोकने में 99% से ज्यादा कामयाब है। इसे इस्तेमाल करना भी काफी आसान है। जिसके बाद प्रेग्नेंसी रोकने के लिए इंजेक्शन (इंजेक्टिबल कॉन्ट्रासेप्टिव) लगवाने, गोली खाने की टेंशन छूमंतर हो जाती है।

जो महिलाएं एस्ट्रोजन हॉर्मोन वाली गोलियां नहीं खा सकतीं या जिनके लिए गोली खाने की टाइमिंग याद रखना एक बड़ी समस्या है, उनके लिए इम्प्लांट बेहतर विकल्प साबित हो सकता है। बच्चे को जन्म देने के बाद इसे कभी भी लगवाया जा सकता है और ब्रेस्टफीडिंग के दौरान यह पूरी तरह सेफ है।

कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स को दूसरे गर्भनिरोधकों से ज्यादा असरदार क्यों कहा जा रहा है, इसका कारण इस ग्राफिक से जानिए...

ये तो रही सबसे छोटे और गरीब देशों की बात। अब बात करते हैं अमेरिका जैसे बड़े देशों की, जहां ये तकनीक अपनाई जा चुकी है।

अमेरिका-यूरोप में काफी पॉपुलर है ये तरीका

अमेरिका की फेडरल एजेंसी 'सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन' के मुताबिक कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स वहां प्रेग्नेंसी रोकने के लिए अपनाया जाने वाला तीसरा सबसे पॉपुलर तरीका है। यूरोप में भी ये तकनीक बेहद कारगर है।

अमेरिका में 15-49 साल की करीब 18 फीसदी महिलाएं नसबंदी करवाती हैं, जबकि 14 फीसदी महिलाएं गोलियों का इस्तेमाल करती हैं और 10.4 फीसदी महिलाएं कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स या कॉपर-टी जैसे तरीके आजमाती हैं।

अमेरिका का हाल तो आपने जान लिया, लेकिन क्या आपको पता है कि प्रेग्नेंसी से बचने के लिए भारत में कौन सा तरीका सबसे ज्यादा पॉपुलर है...

पड़ोसी देशों में वहां की सरकारें दे रहीं सुविधा

‘इंटरनेशनल प्लांड पेरेंटहुड फेडरेशन’ नाम की संस्था भारत सहित कई देशों में फैमिली प्लानिंग और सेक्स एजुकेशन जैसे मुद्दों पर काम कर रही है। इसके साउथ एशिया रीजन के डायरेक्टर डॉ. श्रीजीत ने बताया कि अनचाही प्रेग्नेंसी रोकने के लिए अपनाए जाने वाले दूसरे तरीकों की तुलना में कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट कहीं बेहतर है।

कॉपर-टी जैसी डिवाइस की तुलना में इसे इस्तेमाल करना भी आसान है। एक बार बांह में डालने के बाद 3 साल तक एक्सीडेंटल प्रेग्नेंसी की चिंता नहीं रहती। दुनिया भर में हुई कई रिसर्च में इसे ज्यादा इफेक्टिव पाया गया है। इसे कई देशों के फैमिली प्लानिंग प्रोग्राम में शामिल किया जा चुका है। इनमें बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका जैसे देश शामिल हैं। वह कहते हैं कि लॉन्ग टर्म में भारत के लिए यह काफी किफायती भी है।

भारत में ICMR भी करवा चुका है रिसर्च

2016 में आईं कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स के क्लीनिकल ट्रायल की रिपोर्ट स्वास्थ्य मंत्रालय को सौंपी थी। देश के 22 सरकारी अस्पतालों में 3 साल तक 3,119 महिलाओं पर की गई रिसर्च के दौरान 66 फीसदी महिलाओं ने इसका इस्तेमाल जारी रखने का फैसला लिया था।

फैमिली प्लानिंग के मामले में भारत हमेशा से ही बाकी दुनिया से आगे रहा है, जब बढ़ती जनसंख्या की तरफ बहुत से देशों का ध्यान भी नहीं गया था, भारत में तभी इसके लिए योजना लागू हो गई थी...

चीन से पहले बढ़ती जनसंख्या के खतरे को पहचानने वाला भारत लेटेस्ट टेक्नोलॉजी में पीछे क्यों रह गया?

इस सवाल का जवाब दिया श्री गंगा राम हॉस्पिटल, नई दिल्ली की गाइनेकोलॉजिस्ट डॉ. रूमा सात्विक ने। उन्होंने बताया कि लोग उन्हीं चीजों को अपनाना चाहते हैं, जिन्हें वह आसानी से यूज कर सकें। जैसे कंडोम और गोलियों के पॉपुलर होने की बड़ी वजह यह है कि लोग उन्हें खुद से खरीद सकते हैं और ये आसानी से उपलब्ध भी हैं। कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स के साथ ऐसा नहीं है। अभी तो अधिकतर लोगों को इसके बारे में पता ही नहीं है।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स के पॉपुलर न हो पाने की कई वजहें हैं। सरकार ने इसे नेशनल फैमिली प्लानिंग प्रोग्राम में शामिल नहीं किया है।

भारत में ट्रेंड गाइनेकोलॉजिस्ट को ही इसे लगाने की अनुमति दी गई है। एमबीबीएस और आयुष डॉक्टर से इसे नहीं लगवाया जा सकता। देश में प्रशिक्षित गाइनेकोलॉजिस्ट की कमी और कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स के बारे में जानकारी नहीं होने के कारण ज्यादा महिलाओं को इसका फायदा नहीं मिल पा रहा है।

सरकारी अस्पतालों में फिलहाल इसका इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। एक डिवाइस की कीमत करीब 3 हजार रुपए है। प्राइवेट अस्पतालों में जाकर इन्हें लगवाने पर वहां की फीस का खर्च भी इसमें जुड़ जाता है।

कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स का पीरियड्स पर पड़ता है सबसे ज्यादा असर

ऐसा नहीं है कि कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स का कोई साइड इफेक्ट नहीं है। पीरियड्स पर कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स के असर को लेकर रिसर्च हुई हैं। हिंदवी डॉट कॉम पर मौजूद एक ऐसी ही रिपोर्ट के अनुसार कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स लगवाने के 24वें महीने में 30% महिलाओं के पीरियड्स एकदम बंद हो गए। करीब 6% महिलाओं के पीरियड्स कम हो गए, जबकि 19% के बढ़ गए और 45% महिलाओं के पीरियड्स नॉर्मल रहे।

जानिए कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स के और क्या-क्या साइड इफेक्ट व फायदे हैं...

कॉन्स्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट्स कैसे लगवाएं या हटवाएं

इस डिवाइस को बड़ी आसानी से इंजेक्शन की तरह बांह में लगवाया जा सकता है और किसी सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती। प्रेग्नेंट होने की तैयारी करने या फिर किसी तरह की दिक्कत महसूस होने पर इसे किसी भी समय निकलवा भी सकते हैं। इसके लिए डॉक्टर हल्का सा कट लगाकर प्लास्टिक की इस रॉड को बाहर निकाल देते हैं।

कब न करें इस्तेमाल

  • अगर आपको लगता है कि आप प्रेग्नेंट हैं।
  • अगर अपने पीरियड्स में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं चाहतीं।
  • ऐसी कोई दवा ले रही हैं, जिसका असर इम्प्लांट पर हो सकता है।
  • पार्टनर के साथ संबंध बनाने या पीरियड्स के दौरान ज्यादा ब्लीडिंग हो।
  • कभी स्ट्रोक की समस्या हुई हो या दिल से जुड़ी बीमारी हो।
  • लिवर से जुड़े रोगों की शिकार रही हों।
  • ब्रेस्ट कैंसर हो या पहले कभी हो चुका हो।

एक्सपायरी डेट के बाद कॉपर-टी और कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट बाहर निकलवाना जरूरी

कॉपर-टी हो या कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट, एक्सपायरी डेट के बाद तुरंत बाहर निकलवा दें। कॉपर-टी 3 से 10 साल तक चलती है। इसकी सही जानकारी आपके डॉक्टर बता सकते हैं।

एक्सपायरी डेट के बाद न निकालने पर इन्फेक्शन का खतरा रहता है। इसी तरह कॉन्ट्रासेप्टिव इम्प्लांट को 3 साल बाद न निकलवाने पर प्रेग्नेंट होने में दिक्कत हो सकती है। या फिर ट्यूबल प्रेग्नेंसी हो सकती है। इसमें गर्भाशय के बाहर, जैसे कि फेलोपियन ट्यूब में ही भ्रूण विकसित होने लगता है।

कॉन्ट्रासेप्टिव इस्तेमाल न करने की वजह से दुनिया भर में करोड़ों महिलाएं न चाहते हुए भी प्रेग्नेंट हो जाती हैं...

अनचाही प्रेग्नेंसी के लिए ये कारण भी जिम्मेदार

‘यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड’ के मुताबिक प्रेग्नेंट होने से बचने के लिए कॉन्ट्रासेप्टिव के जो तरीके अपनाए जाते हैं, उनमें से कुछ महिलाओं के शरीर पर अच्छा असर नहीं डालते। इससे अनचाही प्रेग्नेंसी की आशंका बढ़ती है। महिलाओं को यौन हिंसा और बच्चे पैदा करने का दबाव भी झेलना पड़ता है। खराब स्वास्थ्य सेवाएं, शेमिंग, जज किए जाने के डर के कारण भी महिलाएं कॉन्ट्रासेप्टिव नहीं यूज कर पाती हैं। गरीबी, लैंगिक असमानता भी अनचाही प्रेग्नेंसी की वजह बनती हैं। सोसाइटी में लड़कियों-महिलाओं पर जल्द मां बनने का दबाव इतना ज्यादा होता है कि उन्हें न चाहते हुए भी प्रेग्नेंट होना पड़ता है।

इस अनचाही प्रेग्नेंसी का खमियाजा महिलाओं को उठाना पड़ता है...

कॉन्ट्रासेप्टिव यूज करने की जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं पर

NFHS-5 के आंकड़ों के मुताबिक देश में नसबंदी कराने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ी है, जबकि अभी भी बेहद कम पुरुष नसबंदी करा रहे हैं। NFHS-4 के अनुसार 2015-16 में 36 फीसदी महिलाएं नसबंदी करा रही थीं। यह संख्या 2019-21 में बढ़कर 37.9% हो गई। सबसे ज्यादा बढ़ोतरी मध्य प्रदेश (9.7% से बढ़कर 51.9%), बिहार (14.1% से बढ़कर 34.8%) और गोवा में (13.6% से बढ़कर 29.9%) हुई।

वहीं, देश में 10 में से सिर्फ एक पुरुष ही कंडोम का इस्तेमाल करता है। कंडोम यूज करने वाले पुरुषों की संख्या सबसे ज्यादा चंडीगढ़ (31.1%) और उत्तराखंड (25.6%) में है। NFHS-5 के अनुसार देश में 82% फीसदी पुरुषों को कंडोम यूज करने के फायदे पता हैं। इसके बावजूद प्रेग्नेंसी रोकने में जिम्मेदारी निभाने से वह पीछे हट जाते हैं। NFHS-4 के मुताबिक 40% पुरुष मानते हैं कि प्रेग्नेंसी रोकने की जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं की है।

पीरियड्स के दौरान महिलाओं की समस्याओं पर बनी फिल्म 'फुल्लू' में लीड रोल निभाकर क्रिटिक्स और दर्शकों की तारीफ बटोर चुके एक्टर 'फैमिली मैन' शारिब हाशमी से भी इस बारे में बात हुई। जानिए दैनिक भास्कर के जरिए शारिब ने पुरुषों को क्या संदेश दिया...

कॉन्ट्रासेप्टिव आविष्कारों से पॉलिसी तक सारा दबाव महिलाओं पर क्यों, पॉपुलेशन साइंटिस्ट ने बताईं 5 वजहें:

पुरुषों की तुलना में महिलाओं के लिए गर्भनिरोधक के विकल्प ज्यादा हैं। सरकार की पॉलिसी में भी महिलाओं के कॉन्ट्रासेप्शन पर ही ज्यादा जोर दिखता है। इस्तेमाल की बात आती है, तो महिलाएं ही गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल करते हुए ज्यादा दिखाई देती हैं। पॉपुलेशन साइंटिस्ट डॉ. श्रीनिवास गोली ने इसके 5 कारण बताए-

1.समाज की पितृसत्तामक सोच का असर: हम पैट्रिआर्कल सोसाइटी में रहते हैं। जहां बच्चों को जन्म देना, पालना और गर्भनिरोधकों का जिम्मा भी महिलाओं पर ही है।

2.लीडरशिप में महिलाओं की कमी: गर्भनिरोधकों का आविष्कार, उनके उत्पादन और पॉलिसी बनाने तक, टॉप लेवल महिलाओं की कमी है। इसलिए कॉन्ट्रासेप्शन भी महिलाओं के लिए बनाए जाते हैं।

3.सोसाइटी ने पॉलिसी को नहीं अपनाया: कोई भी पॉलिसी कितनी इफेक्टिव होगी, इस पर निर्भर करती है कि समाज उसे कितना अपनाता है। 90 के दशक में फ्री कंडोम बांटे गए, लेकिन सफलता नहीं मिली, क्योंकि पुरुषों ने कंडोम के इस्तेमाल से बचना चाहा।

4.सरकार के लिए नसबंदी सबसे किफायती: नसबंदी किफायती तरीका है। सरकार को इस पर ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता। इसीलिए इसे बढ़ावा दिया गया। इन कारणों से महिलाओं की नसबंदी सबसे ज्यादा हो रही है।

5.पुरुष लेते हैं गर्भनिरोधक के इस्तेमाल का फैसला: एचआईवी-एड्स हो या सेक्स से फैलने वाली दूसरी संक्रामक बीमारियां, उनका संक्रमण पुरुषों से ही ज्यादा फैलता है। फिर भी कॉन्ट्रासेप्टिव यूज करने के मामले में पुरुष ही फैसला लेते हैं।

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंस में डेमोग्राफी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. श्रीनिवास ने बताया कि ये बड़े मुद्दे हैं, जिनकी वजह से पुरुषों की सहूलियत को ध्यान में रखकर ही कॉन्ट्रासेप्शन प्लान किए गए और अनचाही प्रेग्नेंसी रोकने की सारी जिम्मेदारी भी सोसाइटी ने महिलाओं पर थोप दी। अगर हेल्दी सोसाइटी और सभी की हेल्थ को साथ लेकर चलना है तो पुरुषों और महिलाओं दोनों की जिम्मेदारी बराबर होनी चाहिए।

अब जब आप गर्भनिरोधकों से जुड़ी इतनी जानकारियां हासिल कर चुके हैं, तो इनके इस्तेमाल पर अपने ख्याल भी साझा करते चलें...

ग्राफिक्स: सत्यम परिडा

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