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प्रिंस हैरी के डरावने सपनों का इलाज:दो उंगलियां और आंखों की हरकतों से आप भी पा सकते हैं खौफनाक अतीत से छुटकारा

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: संजय सिन्हा
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हाल ही में ब्रिटिश रॉयल फैमिली के प्रिंस हैरी ने खुलासा किया कि वो अपनी मां डायना की असमय मृत्यु से गहरे सदमे में चले गए थे। वो खुद को असहाय महसूस करने लगे थे। लगता था कि अब वो इससे निकल नहीं पाएंगे। उस ट्रॉमा के साथ रहना मुश्किल था। प्रिंस हैरी ने बताया कि वो PTSD यानी पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर से जूझ रहे थे। बचपन की कई ऐसी कड़वी यादें थीं, जो उन्हें परेशान करती थीं। तब उन्होंने EMDR थेरेपी की मदद ली। इस थेरेपी के कारण वह एक सामान्य जीवन में वापस लौट सके।

अब आप सोच रहे होंगे कि ये EMDR थेरेपी क्या है? याद कीजिए आपने बचपन में खेल-खेल में आंखों को खूब घुमाया होगा। दोनों आंखें टेढ़ी कर नाक पर फोकस करने का चैलेंज तो हम सभी ने किया है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह एक थेरेपी हो सकती है और इससे किसी बीमारी का इलाज किया जा सकता है?

आई मूवमेंट डिसेंसिटाइजेशन एंड रिप्रोसेसिंग (EMDR) ऐसी ही साइकोथेरेपी है जिसमें उन यादों को फिर से उभारा जाता है जो दिमाग में घर कर गई हैं। बुरी यादों का असर कम करना और अच्छी यादों को सहेजना ही EMDR थेरेपी है।

EMDR थेरेपी से पहले जान लेते हैं कि PTSD क्या बला है

इसे यूं कहें कि EMDR थेरेपी से ट्रॉमा का इलाज किया जाता है। यानी पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर से जूझ रहे लोग ये थेरेपी लेते हैं। पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) एक ऐसा मेंटल डिसऑर्डर है जिसमें कोई अपने साथ पहले हुई घटना पर बाद में रिएक्ट करता है। ऐसी घटना जिसने इंसान के दिल-दिमाग पर गहरा असर किया हो।

सड़क दुर्घटना में घायल होना, रेप या भूकंप पीड़ित होना, ऊंचाई से गिरना, पानी में डूबने से बचना, आग में घिर जाने जैसी कई घटनाओं को इंसान कभी भुला नहीं पाता। ऐसी डरावनी यादें वर्षों बाद भी जेहन में बनी रहती हैं। कई बार यह बीमारी बन जाती है।

रात में बुरे सपने आना, बेचैनी महसूस करना, खूब पसीना आना, बॉडी में सेंसेशन पैदा होना इसके लक्षण हैं। इन लक्षणों की पहचान कर ही EMDR थेरेपी से इलाज किया जाता है। पिछले 30 वर्षों से EMDR थेरेपी से इलाज किया जा रहा है।

EMDR से दुनिया का परिचय किसने कराया? यह एक मेडिकल ट्रीटमेंट के रूप में काम कर सकता है, यह कैसे बताया गया? आइए जानते हैं।

अमेरिका की डॉ. फ्रांसिन शापिरो ने 1987 में सबसे पहले EMDR का कॉन्सेप्ट दिया। जब वह कैलिफोर्निया के लॉस गैटोस के एक पार्क में लंच ब्रेक में टहल रही थीं। लेकिन किसी बात को लेकर परेशान थीं। उन्होंने अपनी आंखों को तेजी से दाएं-बाएं घुमाया। वह बार-बार ऐसा कर रही थीं। उन्होंने महसूस किया कि जिन बुरी यादों को लेकर वह स्ट्रेस में थीं, वह थोड़ी देर में खत्म हो गया।

डॉ. शापिरो ने इस थेरेपी का प्रयोग पहले खुद पर, फिर दोस्तों और अपने सहकर्मियों पर आजमाया। छह महीने तक 70 लोगों पर उन्होंने थेरेपी का इस्तेमाल किया।

प्रयोग में शामिल लोग अतीत की कड़वी यादों या बुरी घटनाओं को याद करते जबकि उसी समय डॉ. शापिरो अपनी उंगलियां इधर से उधर घुमातीं। लोगों को बुरे ख्यालात याद करते समय उंगलियों को ट्रैक करना होता। डॉ. शापिरो की इस टेक्नीक को EMDR थेरेपी कहा गया। 1989 में पहली बार ‘द जर्नल ऑफ ट्रॉमेटिक स्ट्रेस’ में इस थेरेपी पर आर्टिकल पब्लिश हुआ, तब जाकर दुनिया इस थेरेपी को जान पाई।

ये तो रही अमेरिका की बात, जहां ये थेरेपी शुरू हुई। अब जान लेते हैं भारत में EMDR से इलाज कब शुरू हुआ? इससे पहले इस ग्रैफिक पर नजर डाल लेते हैं।

अमेरिका से बांग्लादेश जाते समय भारत में आई यह थेरेपी

EMDR एसोसिएशन इंडिया की प्रेसिडेंट डॉ. मृणालिनी पुरंदर ने फोन पर दैनिक भास्कर को बताया कि 1990 के दशक में ही EMDR थेरेपी भारत पहुंची।

जब EMDR थेरेपी से जुड़े अमेरिकी लोग बांग्लादेश जा रहे थे तब उनके कई सदस्य भारत भी आए। उनसे पता चला कि यह थेरेपी क्या है। EMDRIA (आई मूवमेंट डिसेंसिटाइजिंग रिप्रोसेसिंग इंटरनेशनल एसोसिएशन) की ओर से ह्यूमैनिटेरिअन असिस्टेंट प्रोग्राम चलाया जाता है। इसकी मदद से अमेरिकी ट्रेनरों ने भारत में भी साइकोलॉजिस्ट को ट्रेनिंग दी।

2001 में भुज में आए भूकंप के बाद पता चली EMDR थेरेपी की अहमियत

मुंबई स्थित SNDT वुमन यूनिवर्सिटी के साइकोलॉजी विभाग की पूर्व एचओडी रहीं डॉ. मृणालिनी बताती हैं कि 26 जनवरी 2001 को गुजरात के भुज में आए भूकंप के बाद बड़े स्तर पर EMDR थेरेपी से लोगों का इलाज किया गया।

भारत में यह थेरेपी अभी शुरुआती चरण में ही थी, लेकिन मुंबई से चार-पांच लोगों की टीम कुछ-कुछ अंतराल पर छह महीने तक भुज जाती रही। इस टीम में EMDR थेरेपिस्ट थे। तब डॉ. सुषमा मेहरोत्रा और डॉ. श्वेता साहा ने इस टीम को लीड किया।

डॉ. मृणालिनी कहती हैं कि भुज में आए भूंकप का लोगों के दिल-दिमाग पर गहरा असर पड़ा था। कोई भी सामान हिलता तो उन्हें लगता कि भूंकप आ गया।

पीड़ितों में एंग्जायटी, डर, बेचैनी थी। उनमें वही लक्षण दिख रहे थे जैसा पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर में होता है। उन्हें बार-बार एक ही चीज दिखती थी। बुरे सपने आते थे। रात को नींद नहीं आती थी। बच्चे बादल गरजने या बिजली कड़कने पर डर जाते थे। उनमें असुरक्षा की भावना बढ़ जाती थी।

डॉ. मृणालिनी बताती हैं कि 11 सितंबर 2001 को अमेरिका वर्ल्ड ट्रेड टावर धराशायी हुआ तो टीवी पर यह देख भुज के बच्चे सहम गए। वो कहने लगे कि हमारे यहां भी ऐसे ही बिल्डिंग गिरी थी। यानी भूकंप के ट्रॉमा ने उन पर गहरा असर किया था।

अब ये जान लेते हैं कि किन लोगों को EMDR थेरेपी की जरूरत पड़ती है।

याददाश्त चली गई तो नहीं काम करेगी ये थेरेपी

जो लोग ऐसी आपदा या किसी ट्रॉमा से गुजरते हैं उनमें से सभी को परेशानी नहीं होती। इनमें से 10 प्रतिशत लोग ही पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर से पीड़ित होते हैं। इन्हें EMDR थेरेपी की जरूरत पड़ती है।

डॉ. मृणालिनी कहती हैं कि अगर ट्रॉमा का असर अगर लंबे समय तक है और लोग घटना को लेकर तनाव में रहते हैं, डिप्रेशन में चले जाते हैं, कटे-कटे रहते हैं, उदास रहने लगते हैं तो तो उनमें PTSD के लक्षण दिख जाते हैं। तब उन्हें EMDR थेरेपी की जरूरत पड़ती है। लेकिन जैसे किसी को सिर में चोट है और उसकी याददाश्त चली गई तो ऐसे में ये थेरेपी काम नहीं करती।

अभी तक आपने EMDR थेरेपी के विभिन्न पहलुओं के बारे में पढ़ा, लेकिन आगे बढ़ने से पहले इस ग्रैफिक से समझते हैं कि नींद में दिमाग में क्या-क्या चल रहा होता है।

EMDR​​​​​​ थेरेपी कड़वी यादों को भुलाने में और अच्छी यादों के साथ आगे बढ़ने में कारगर

डॉ. मृणालिनी कहती हैं कि EMDR को ट्रॉमा के लिए फर्स्ट लेवल की थेरेपी माना जाता है। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी अपने रिसर्च में इसे इफेक्टिव थेरेपी माना है। खासकर ट्रॉमा के लिए कारगर है। अब तो ट्रॉमा ही नहीं, दूसरी बीमारियों के लिए भी इस थेरेपी के जरिए इलाज किया जा रहा है।

ये पूरी थेरेपी स्मृति आधारित है। हमारे साथ हुईं अच्छी घटनाएं, हमें मानसिक रूप से खुश रखती हैं। लेकिन बुरी घटनाएं और उसकी यादें हमें परेशान करती रहती हैं।

जब इस थेरेपी से व्यक्ति ठीक हो जाता है तो ऐसा नहीं है कि उसे घटनाएं याद नहीं रहतीं, बल्कि वह यह कहता है कि हां, मेरे साथ ऐसा हुआ था और मैंने इससे सीखा है कि इससे कैसे उबरना है। मैं अब आगे बढ़ सकता हूं। थेरेपी अच्छी बातें याद रखने और कड़वी यादों के असर को कम करने में मददगार होती है। अगर बच्चा परेशान है तो उसे ये थेरेपी देने से उसकी सहनशक्ति बढ़ जाती है।

EMDR थेरेपी एक केस स्टडी के साथ समझ सकते हैं।

सरकारी नौकरी से रिटायर होने के बाद 68 साल के आमोद सिंघल (बदला हुआ नाम) पत्नी और छोटे बेटे के साथ दिल्ली में रह रहे थे। दूसरे शहर शिफ्ट होने से पहले बड़ा बेटा और बहू उनके साथ रहते थे। लेकिन घर में आए दिन झगड़े हो रहे थे।

बहू अपने ससुर आमोद को जेल भिजवाने की बात कहती थी। एक बार घर पर पुलिस भी आई। इससे आमोद परेशान थे। वो कई बीमारियों से भी पीड़ित थे। उनकी बाईपास सर्जरी हो चुकी थी।

जब आमोद EMDR थेरेपी के लिए गए तो नई बात पता चली। उन्होंने बताया कि मैट्रिक में 80 प्रतिशत आने के बाद भी वह आगे नहीं पढ़ सके। बड़े भाइयों का सपोर्ट नहीं मिला। मजबूरी में उन्हें छोटे-मोटे काम करके गुजारा करना पड़ा। आमोद ने स्केल पर इसे अधिकतम 8 नंबर दिए। EMDR थेरेपी के बाद आमोद ने कहा कि वह अब अच्छा महसूस कर रहे है।

आठ चरणों में कैसे EMDR थेरेपी के जरिए इलाज किया जाता है, इसे ग्रैफिक के जरिए समझते हैं।

डॉ. मृणालिनी कहती हैं कि एक सेशन 60 से 90 मिनट का होता है। कई बार तीन-तीन महीने तक सेशन चलते हैं। परिवार में सपोर्ट मिलने पर जल्दी रिकवरी होती है। बच्चों में बुरी यादें कम होती हैं। वो जल्दी रिकवर कर जाते हैं।

आपके मन में ये सवाल उठ सकते हैं कि क्या किसी ट्रॉमा की स्थिति में ही EMDR थेरेपी काम करेगी। इस पर साइकेट्रिक के नजरिए से जानते हैं कि यह थेरेपी किन-किन बीमारियों में कारगर हो सकती है।

सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकेट्री, रांची के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. वरुण एस मेहता बताते हैं कि PTSD, यौन शोषण या रेप पीड़ित लड़कियों की बुरी यादों को EMDR से दूर किया जाता है। अमेरिका में इसे स्ट्रेस घटाने वाली थेरेपी माना जाने लगा है। वहां पुलिस अफसरों में स्ट्रेस घटाने के लिए ये थेरेपी काम आ रही है।

साइकोलॉजिस्ट एमके गुप्ता और एके गुप्ता ने तो अपनी रिसर्च ‘यूज ऑफ EMDR इन द ट्रीटमेंट ऑफ डरमेटोलॉजिकल डिसऑर्डर’ में यह भी बताया है कि ये थेरेपी उन महिलाओं के भी काम आई है जिनके शरीर पर सफेद दाग थे और वो किसी के साथ बात करने और घुलने-मिलने में कतराती हैं।

EMDR थेरेपी को लेकर सवाल भी उठते हैं। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के साइकोलॉजिस्ट रिचर्ड मैकनैली का कहना है कि EMDR थेरेपी में कुछ भी नया नहीं किया जाता। जिन चीजों को नया बताया जा रहा उनका इतना असर नहीं पड़ता है। तो क्या इस थेरेपी को CBT का ही एक हिस्सा माना जा सकता है?

आइए अब आपको बताते हैं कि CBT यानी कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी क्या है और ये कब काम आती है? साथ ही सीबीटी और EMDR थेरेपी के बीच अंतर को भी समझते हैं।

CBT बनाम EMDR थेरेपीः एक रवैये को ठीक करती है तो दूसरी डर निकालती है

CBT पुरानी थेरेपी है तो EMDR नई। EMDR से इंसान के अंदर मौजूद डर और बुरी यादों को निकाला जाता है तो CBT से रवैया और गलतफहमी को बदलने की कोशिश की जाती है।

EMDR एशिया की ट्रेनिंग, स्टैंडर्ड एंड एक्रिडिएशन कमेटी की चेयरपर्सन डॉ. सुषमा मेहरोत्रा बताती हैं कि दोनों थेरेपी मेंटल हेल्थ में सुधार लाने का ट्रीटमेंट है। लेकिन दोनों का मकसद अलग है। CBT किसी के व्यवहार में या सोचने के तरीके में बदलाव लाती है। जैसे कोई कहे कि मेरी सास बहुत क्रूर है। यह एक सोच है, ट्रॉमा नहीं।

इसी तरह किसी बॉस और इम्प्लॉयी में मतभेद भी रवैये का ही मामला है। लेकिन EMDR तब दी जाती है जब इंसान कहता है कि मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा या अब बर्दाश्त नहीं हो रहा।

बर्तन गिरने को बम फटना समझते हैं युद्ध झेल चुके डरे-सहमे अफगानिस्तानी

फिलीपींस में बम ब्लास्ट या श्रीलंका और अफगानिस्तान में गृहयुद्ध जैसे हालात के बाद कई लोग खौफनाक यादों से जूझते नजर आए।

डॉ. सुषमा मेहरोत्रा ने अपनी टीम के साथ अफगानिस्तान, फिलीपींस और श्रीलंका में डॉक्टरों और एक्सपर्ट को EMDR की ट्रेनिंग दी है।अफगानिस्तान में हालात इतने खराब हैं कि घर में एक पतीला भी गिरा तो लोगों को लगता है कि बम फट गया। वहां लोग पासपोर्ट और ज्वेलरी हमेशा तैयार रखते हैं ताकि ऐसी आपदा में फौरन भाग सकें। वह बताती हैं कि काबुल में अस्पताल की नर्सें भी तनाव का शिकार थीं।

बॉलीवुड सेलिब्रिटीज भी लेते हैं EMDR थेरेपी

बॉलीवुड एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण ने 2015 में खुलासा किया था कि वह डिप्रेशन की शिकार रहीं। उन्हें सुसाइड करने के ख्याल आते थे। उन्हें साइकेट्रिस्ट की मदद लेनी पड़ी, तब वह डिप्रेशन से बाहर आ सकीं।

EMDR एक्सपर्ट बताते हैं कि सेलिब्रिटी का काम और माहौल ऐसा होता है कि उनकी मानसिक स्थिति और खराब हो जाती है। कई सारे एसाइनमेंट्स टाइम पर पूरे करने होते हैं। काम के घंटे ज्यादा होते हैं और वो कभी खुलकर अपनी हालत किसी को बता नहीं सकते। ऐसे में वो EMDR थेरेपी की मदद लेते हैं।

इतनी सारी बातें जानने के बाद अब लग रहा होगा कि EMDR थेरेपी नई जैसी लग रही है लेकिन आंखों को घुमाने का काम तो हम करते रहे हैं जिसमें हमारे मन का इलाज छिपा हुआ है।

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ग्रैफिक्स: सत्यम परिडा

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