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तालिबान से हार नहीं मान रहीं महिलाएं:अफगानी लड़कियों की लड़ाई में लड़के भी कूदे, बैनर-पोस्टर और पत्थरों से कर रहे हथियारों का मुकाबला

काबुलएक महीने पहले
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तालिबान का विरोध - Money Bhaskar
तालिबान का विरोध
  • पंजशीर में तालिबान लड़ाकों से लड़ीं महिलाएं
  • महिलाओं ने पत्थर से तालिबान पर किया अटैक
  • लड़कियों के स्कूल बंद करने का लड़के कर रहे विरोध

तालिबान ने भले ही 15 अगस्त को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर कब्जा कर लिया, लेकिन अब भी उसे वहां के लोगों से चुनौती मिल रही है। खासतौर पर महिलाओं ने तालिबान के लड़ाकों से हार मानने से इनकार कर दिया है। लड़कियों की देखादेखी अब लड़के भी उनकी जंग में साथ खड़े हो रहे हैं। यही नहीं, अंतरराष्ट्रीय संगठन भी अफगानी महिलाओं के पक्ष में आवाज उठा रहे हैं।

लड़कियों के साथ आए लड़के, स्कूल बंद करने का विरोध

तालिबान के लड़कियों के लिए स्कूल नहीं खोलने का अफगानिस्तान में विरोध हो रहा है। स्कूली लड़कों ने सोशल मीडिया पर कैम्पेन चलाया है कि अगर उनकी बहनों को स्कूल जाने की अनुमति नहीं दी गई तो वे भी पढ़ने के लिए नहीं जाएंगे। बकायदा पोस्टर के साथ बच्चों की फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हैं जिसमें लड़के कह रहे हैं कि जब तक लड़कियों के लिए स्कूल नहीं खुलेंगे, वे पढ़ने नहीं जाएंगे।

अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक जैसे ही स्कूल खुले काबुल में कुछ लड़कों ने क्लास जाने से इनकार कर दिया। ये लड़के यह कहते हुए घर वापस आ गए कि महिलाएं समाज का आधा हिस्सा हैं और जब तक लड़कियों के लिए भी स्कूल नहीं खुल जाते, तब तक वे स्कूल नहीं जाएंगे।

तालिबान शिक्षा मंत्रालय ने शुक्रवार को लड़कों के माध्यमिक विद्यालयों को फिर से खोलने का आदेश दिया, जबकि लड़कियों के स्कूल अब भी बंद हैं। रॉयटर्स के मुताबिक काबुल में प्राइवेट स्कूल के एक टीचर ने स्कूलों को फिर से खोलने से पहले किए गए कई बदलावों की जानकारी दी। उन्होंने कहा, “लड़कियां सुबह और लड़के दोपहर में पढ़ते हैं। पुरुष शिक्षक लड़कों को पढ़ाते हैं और महिला टीचर लड़कियों को पढ़ाती हैं।”

वहीं एक स्कूल के प्रिंसिपल मोहम्मदरेज़ा ने कहा, “लड़कियों की शिक्षा से पीढ़ियां तैयार होती हैं। लड़कों की शिक्षा एक परिवार को प्रभावित कर सकती है लेकिन लड़कियों की शिक्षा समाज को प्रभावित करती है। हम इस मामले पर बारीकी से नजर रखे हुए हैं ताकि लड़कियां अपनी पढ़ाई फिर से शुरू और पूरी कर सकें।''

संयुक्त राष्ट्र ने जताई चिंता, कहा- पिछड़ जाएंगी बेटियां

संयुक्त राष्ट्र (यूएन) ने अफगानिस्तान में लड़कियों को स्कूल जाने से रोकने को लेकर चिंता जाहिर की है। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) और संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) ने कहा कि अफगान लड़कियों के स्कूलों को बंद करना शिक्षा के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। यूनेस्को के महानिदेशक आद्रे अजोले ने जारी बयान में कहा कि अगर लड़कियों के स्कूल बंद रहते हैं, तो यह लड़कियों और महिलाओं के लिए शिक्षा के मौलिक अधिकार का एक महत्वपूर्ण उल्लंघन होगा। यूनेस्को ने चेतावनी दी है कि इससे लड़कियां काफी पीछे रह जाएंगी। स्कूल जाने से रोकने के चलते लड़कों और लड़कियों के बीच सीखने में अंतर पैदा होगा।

पत्थरों से किया तालिबान लड़ाकों का मुकाबला

तालिबान से जंग में सिर्फ पुरुष ही नहीं बल्कि पंजशीर की महिलाओं ने भी लोहा लिया। 24 साल की लैलुमा भी परिवार के साथ तालिबान से लड़ीं। आधुनिक हथियारों से लैस तालिबान से वह पत्थरों से लड़ीं। लैलुमा की तरह ऐसी कई महिलाएं थीं जिन्होंने तालिबान लड़ाकों पर पत्थरों से वार किए। न्यूयॉर्क पोस्ट को दिए इंटरव्यू में लैलुमा ने बताया कि उनका पूरा परिवार पति, भाई, सास-ससुर- तालिबान से लड़ा। उन्होंने खुद तालिबान पर पत्थरों से हमला किया। उनके साथ और भी महिलाओं ने तालिबान से मोर्चा लिया। अब लैलुमा काबुल के एक रिफ्यूजी कैंप में हैं। इसके बाद भी लैलुमा ने खुद से वादा किया है कि वो आखिरी सांस तक मसूद को ही अपना नेता मानेंगी। उन्हें उम्मीद है कि किसी दिन वे लौटकर अपने घर वापस जा सकेंगी। पंजशीर की जंग अभी खत्म नहीं हुई है।

पंजशीर के एक और नागरिक मुर्तजा ने बताया कि वह लंबे समय तक पंजशीर की पहाड़ियों में छिपे रहे। आखिरकार उन्हें तालिबान ने खोज निकाला और काबुल के कैंप में लाकर रख दिया। 115 किलोमीटर के विस्तार वाली पंजशीर घाटी चारों तरफ से पहाड़ों से घिरी है। इसके चलते रेजिस्टेंस फोर्स को स्वाभाविक तौर पर फायदा मिलता था। लेकिन इस बार पंजशीर की यह खासियत भी तालिबान से उसे नहीं बचा सकी।