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नन्ही-मुन्नी और मुन्नों की देखभाल:छोटी-सी लापरवाही पड़ सकती है बजट पर भारी, थोड़ी एहतियात से बनाएं बचपन खुशहाल

नई दिल्ली4 महीने पहलेलेखक: राधा तिवारी
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बच्चों की सेहत की बात करें तो पिछले तीन साल में पैदा हुए बच्चों में बीमारी बढ़ी है। कोरोना के बाद जन्मे बच्चों में कई तरह की दिक्कतें देखने को मिल रही हैं। इसकी अहम वजह यह है कि 3 साल से वे अपने घर में बंद हैं। छोटे बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए सबसे ज्यादा जरूरी होता है कि वे घर से थोड़ा बाहर निकलें, अपने आसपास की जगहों और चीजों को महसूस करें। कोरोना के चक्कर में बच्चे घर से ज्यादा बाहर नहीं निकल पा रहें हैं। बच्चे अपना ज्यादा समय टीवी, फोन और आईपैड पर बिता रहे हैं। इस वजह से उनका मानसिक विकास के साथ-साथ शारीरिक विकास भी सही तरीके से नहीं हो पा रहा है। अर्बन डिक्शनरी डॉट कॉम के मुताबिक, साल 2020 की जेनरेशन को कोरोनियल कहा गया है। कोरोनियल जनरेशन के अधिकतर बच्चे दिसंबर 2020 के बाद और साल 2021 में पैदा हुए हैं।

कोरोना के बाद जन्मे बच्चों में कई तरह की दिक्कतें देखने को मिल रही हैं।
कोरोना के बाद जन्मे बच्चों में कई तरह की दिक्कतें देखने को मिल रही हैं।

जीरो से 3 साल के बच्चों में इनएक्टिवनेस ज्यादा
गुरुग्राम के मैक्स हॉस्पीटल के सीनियर पीडियाट्रिशियन डॉक्टर हिमांशु अग्रवाल बताते हैं कि नवजात शिशु से लेकर 12 महीने तक के बच्चे को 12 से 16 घंटे की नींद दिन में चाहिए होती है। अगर आपका बच्चा इससे ज्यादा सो रहा है तो यह खतरे की घंटी है। बीमार होने या थकान में चार से छह महीने के बच्चे एक या दो घंटा कभी-कभी ज्यादा सो सकते हैं लेकिन, अगर बच्चा पूरे दिन में 20 से 22 घंटा ज्यादा सोता है और दूध पीने तक के लिए नहीं उठता है तो यह चिंता की बात है। कोरोना में जन्में कई बच्चों में ऐसे लक्षण दिख रहे हैं, पेरेंट्स को लगता है कि उनका बच्चा आराम से सो रहा है, लेकिन ऐसा करना खतरनाक हो सकता है। बच्चे का काफी देर तक सोना या उसका इनएक्टिव रहना कई बीमारी के लक्षण हो सकते हैं। ऐसे में जितना जल्दी हो डॉक्टर को कंसल्ट करें।

बच्चे का काफी देर तक सोना या उसका इनएक्टिव रहना कई बीमारी के लक्षण हो सकते हैं।
बच्चे का काफी देर तक सोना या उसका इनएक्टिव रहना कई बीमारी के लक्षण हो सकते हैं।

छोटे बच्चों में हो रही स्पीच की दिक्कत
इन तीन साल में जन्मे बच्चों में स्पीच की दिक्कत हो रही है। उनमें स्पीच डेवलपमेंट के साथ अंडरस्टैंडिंग डेवलपमेंट में दिक्कत हो रही है, क्योंकि इनकी बातचीत सिर्फ घर में रह रहे पेरेंट्स के साथ ही हो पा रही है। पेरेंट्स भी वर्क फ्रॉम होम में बिजी हैं, जिस वजह से उनके पास भी समय की कमी है। बच्चे अपने ग्रैंड पेरेंट्स से भी नहीं मिल पा रहे हैं क्योंकि अब ज्यादातर फैमिली न्यूक्लियर है लोगों को ज्वॉइंट फैमिली में रहना पसंद नहीं है। वे न पार्क में किसी बच्चे से मिल पा रहे हैं न पड़ोसी के बच्चों के साथ खेल पा रहे हैं। छोटे बच्चों को पता ही नहीं चल पाता कि हम पार्क में भाग सकते हैं या खेल सकते हैं।

तीन साल में जन्मे बच्चों में स्पीच की दिक्कत हो रही है।
तीन साल में जन्मे बच्चों में स्पीच की दिक्कत हो रही है।

नन्हे-मुन्ने हो रहे ऑटिज्म के शिकार
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चों का दिमाग अलग तरह से काम करता है। इसमें बच्चा अपनी ही धुन में खोया रहता है। ये दिमाग के डेवलपमेंट के दौरान होने वाली समस्या है। दो से तीन साल के बच्चों में इसके लक्षण नजर आने लगते हैं। ऐसे बच्चों का विकास सामान्य बच्चों की तुलना में कम होता है। ऑटिज्म के शिकार बच्चे एक ही काम को बार-बार दोहराते हैं। कुछ बच्चे डर से जल्दी प्रतिक्रिया नहीं देते। ऐसा माना जाता है कि कई बार गर्भावस्था के दौरान अच्छा खानपान न होने के कारण बच्चे का ब्रेन ठीक से डेवलप नहीं होता।

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चों का दिमाग अलग तरह से काम करता है।
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चों का दिमाग अलग तरह से काम करता है।

छोटे बच्चों की आंखों में हो रही समस्या
​​​​​​​आज के दौर में इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गई हैं। बच्चों को व्यस्त रखने के लिए माता-पिता अकसर उनके हाथ में फोन थमा देते हैं या फिर उन्हें टीवी के सामने बैठा देते हैं। बच्चों का खेल-कूद, भाग-दौड़ कम होती जा रही है। बच्चे ज्यादा से ज्यादा समय घर की चारदीवारी के अंदर इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के साथ बिताते हैं। इसका प्रभाव लंबे समय के बाद देखने को मिलता है। बच्चों की आंखों के साथ-साथ फिजीकल और मेंटल एक्टिविटीज पर भी इसका असर पड़ रहा है। डॉक्टर्स का कहना है अब छोटे बच्चों में चश्में के नंबर तेजी से बढ़ने लगे हैं। ऐसे में पैरेंट्स को साल में एक बार रेगुलर चेकअप कराना जरूरी है।

अब छोटे बच्चों में चश्में के नंबर तेजी से बढ़ने लगे हैं।
अब छोटे बच्चों में चश्में के नंबर तेजी से बढ़ने लगे हैं।

घर में लॉक बच्चे बन रहे मोटापे का शिकार
​​​​​​​कोरोना के चलते लॉकडाउन में लगातार घर में रहने से पेरेंट्स बच्चों को अपने खाने की चीजें भी खिला देते हैं। मोटापा बढ़ने से उनका वजन बढ़ता जाता है। इससे कम उम्र के बच्चों में कमर दर्द, पेट दर्द की समस्याएं बढ़ रहीं हैं। वहीं, वजन बढ़ने से बच्चों की सॉफ्ट हड्डियों में आकार बदलना, टेढ़ापन जैसी समस्याएं भी सामने आ रही हैं। बच्चों में मोटापे के कारण बीपी, शुगर, सांस, अस्थमा, हार्ट डिजीज जैसे गंभीर रोग बढ़ रहे हैं।

बच्चों में मोटापे के कारण बीपी, शुगर, सांस, अस्थमा, हार्ट डिजीज जैसे गंभीर रोग बढ़ रहे हैं।
बच्चों में मोटापे के कारण बीपी, शुगर, सांस, अस्थमा, हार्ट डिजीज जैसे गंभीर रोग बढ़ रहे हैं।

बच्चों में दिख रहा एमआईएससी
3 से 15 साल तक के बच्चों में एसआएससी(‘मल्टी सिस्टम इंफ्लेमेटरी सिंड्रोम इन चिल्ड्रन') की वजह से कई बार गंभीर मामले देखने को मिले हैं। बच्चों में कोविड के बाद होने वाली बीमारी MIS-C को लेकर भी ज्यादा चिंता है। दूसरी लहर में ICU जाने वाले ज्यादातर गंभीर बच्चे ‘मल्टी सिस्टम इंफ्लेमेटरी सिंड्रोम इन चिल्ड्रन' यानी MIS-C से ही ग्रसित थे। यह बीमारी कोरोना से ठीक होने के दो से 12 हफ्ते बाद होती है। कोविड की तुलना में MISC ज्यादा खतरनाक है। ये बच्चों को ज्यादा तकलीफ देता है। इस बीमारी में बच्चों का हर ऑर्गन इन्वोल्व होता है। यह बच्चों के हार्ट और लीवर को प्रभावित करती है।

बच्चों में कोविड के बाद होने वाली बीमारी MIS-C को लेकर भी ज्यादा चिंता है।
बच्चों में कोविड के बाद होने वाली बीमारी MIS-C को लेकर भी ज्यादा चिंता है।

पांच साल के बच्चे को मास्क लगाएं
लगभग 60 फीसदी बच्चों को बुखार, जुकाम-खांसी की परेशानी देखने को मिल रही है। ऐसे में बच्चों को भीड़भाड़ वाली जगहों पर ले जाने से बचें। पांच साल से ज्यादा उम्र के बच्चों को मास्क जरूर पहनाकर ले जाएं। बच्चों की इम्युनिटी बढ़ाने के लिए रोज ड्राई फ्रूट्स खिलाएं। शाम को दूध भी जरूरी है। इसमें सब्जी का सूप भी फायदेमंद है। फास्ट फूड को नजरअंदाज करें। फल और विटामिन-प्रोटीन वाली सामग्री पर जोर दें। अगर आपका बच्चा कमजोर है तो आप उसकी डाइट में घी, मक्खन, दाल, दूध, केला, शकरकंद समेत हरी सब्जियां जरूर शामिल करें। बच्चों के दूध में केसर डालकर पीने से डाइजेशन ठीक रहता है।

लगभग 60 फीसदी बच्चों को बुखार, जुकाम-खांसी की परेशानी देखने को मिल रही है।
लगभग 60 फीसदी बच्चों को बुखार, जुकाम-खांसी की परेशानी देखने को मिल रही है।