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गलतफहमी की सजा:निशांत को इस तरह एक लड़की के साथ देखकर वसुधा का दिल टूट गया, वह अब फैसला कर चुकी थी

2 महीने पहले
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कुछ दिनों से वसुधा का कोई पीछा कर रहा था। उस दिन वसुधा ऑफिस से निकली तो उसने ठान लिया था कि आज तो वो इस आवारा को डांट लगा कर रहेगी और ज्यादा बात बिगड़ी तो पुलिस भी बुला देगी।

गुस्से में कुछ बड़बड़ाते हुए वसुधा जैसे ही पीछे मुड़ी उसने देखा कि अचानक एक मोटर साइकिल वाले ने पीछा करने वाले लड़के को जोरदार टक्कर मार दी और धांय से वहां से निकल गया।

वो लड़का जमीन पर गिर गया और उसे कुछ मामूली चोटें लग गईं। वसुधा को उस पर दया आ गई और वह उसे पास के मेडिकल क्लिनिक में ले गई।

असल में इतना दर्द था नहीं जितना वो वसुधा के गुस्से से बचने के लिए बहाना कर रहा था। क्लीनिक से बाहर निकलते ही वसुधा ने उसे सहारा देने की कोशिश की और उसका हाथ अपने कंधे पर रख लिया। लड़के ने भी वसुधा का हाथ थाम लिया।

"नाम क्या है आपका और क्या करते हैं आप?" वसुधा ने लगभग उसकी आंखों में देखते हुए पूछा।

"जी, निशांत! मैं सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूं, आपके ऑफिस बिल्डिंग में आठवें फ्लोर पर,” उसने एक सांस में जवाब दिया।

कुछ सोचते हुए वसुधा ने फिर पूछा, "लगते तो अच्छे घर से हो, फिर इतने दिनों से मेरा पीछा क्यों कर रहे थे?"

इस पर वह कुछ शर्माते हुए बोला, “जी, माफ कीजिएगा, अगर आपको ऐसा लगा हो। वो मैं पीछा नहीं कर रहा था, बस कुछ दिन से आपसे बात करना चाहता था। आपको जानना चाहता हूं।"

“वो क्यों?” वसुधा ने उसकी बात को बीच में ही काटते हुए पूछा।

निशांत ने पूरे कांफिडेंस के साथ कहा, “जी, आप अच्छी लगती हैं मुझे। अब आप पूछेंगी ‘वो क्यों?’ तो बता देता हूं कि आप बहुत शालीन और सुंदर हैं।"

वसुधा अपनी तारीफ सुन मन ही मन खुश हो रही थी। उसने हंसते हुए जवाब दिया, "तो अब जान लिया आपने?"

वसुधा को निशांत कॉफी पर बुलाना चाहता था, पर झेंप गया। कुछ देर बाद हिम्मत कर के बोला "आपका नंबर मिल सकता है क्या?"

"बहुत जल्दबाज हैं आप!” कहते हुए वसुधा हंस पड़ी।

फिर उसे छेड़ते हुए बोली, “चोट का असर है शायद। चलिए कहीं रुक कर कुछ खा-पी लेते हैं, फिर हम घर निकलेंगे।”

निशांत अपने जख्मों को दुआएं देता हुआ मुस्कुरा कर बोला, “जी ये तो आपने मेरे मन की बात कह दी! लेकिन ट्रीट मेरी तरफ से होगी।"

दोनों पास के कैफे में जा कर बैठ गए। वसुधा ने नीले रंग की साड़ी पहनी थी जिसके साथ स्लीवलेस ब्लाउज था। आंखों में नीला काजल और हाथों में सलेटी रंग की चूड़ियां थीं। वह बहुत ही आकर्षक लग रही थी। कैफे में बड़े से शीशे वाली एक खिड़की के पास लगी मेज और किर्सियों पर दोनों बैठ कर कॉफी के इंतजार में बातें करने लगे और न जाने कब एक दूसरे के साथ घुल मिल गए।

इतने में कॉफी आ गई थी। इत्तेफाक से दोनों ने मेज पर रखे दो कप में से एक को ही उठाना चाहा, जिस वजह से उनके हाथ आपस में टकरा गए।

वसुधा को एक अलग तरह की सिरहन महसूस हो रही थी, वह निशांत का हाथ थाम लेना चाहती थी। उन्होंने कॉफी की आखिरी घूंट तक जितनी बातें हो सकती थी की, लेकिन अब वक्त था जाने का।

इस हसीन मुलाकात को अधूरा छोड़ने का उन दोनों का ही मन नहीं था। ऊपर से हिचकिचाहट थी कि कहीं अगला इंसान बुरा न मान ले और बनती बात बिगड़ न जाए। वसुधा ने जाते समय निशांत से हाथ मिलाते हुए कहा, "उम्मीद है, आपको वसुधा त्रिपाठी से मिल कर अच्छा लगा होगा।”

इससे पहले निशांत कुछ कहता वह जा चुकी थी।

वसुधा को जैसी उम्मीद थी वैसा ही हुआ, अभी वह घर पहुंची भी नहीं थी कि उसके पास सोशल मीडिया पर निशांत की रिक्वेस्ट आ गई। फिर क्या था, बातों का सिलसिला यूं ही ऑनलाइन चलता रहा।

अक्सर दोनों ऑफिस की लिफ्ट में एक दूसरे से टकरा जाते, तो कभी लंच में किसी फूड कार्नर में, कभी राह चलते बात कर लेते।

एक दिन दोनों ने फैसला किया के उसी कैफे में जाएंगे जहां पहली मुलाकात पर गए थे। निशांत जल्दी फ्री हो गया इसलिए समय से थोड़ा पहले पहुंच गया। वो वसुधा की फोटो देख कर सोच ही रहा था कि उसे आज प्रोपोज कर देगा, तभी किसी ने पीछे से आवाज लगाई। वो निशांत की मुंहबोली बहन करिश्मा थी, निशांत ने उसे बैठने को कहा और हालचाल पूछने के बाद वसुधा से अपने प्रेम की बात बताने लगा।

वसुधा जैसे ही कैफे में घुसी तो उसने निशांत को किसी अनजान लड़की के साथ पाया और वो गुस्से में तमतमाती हुई वहां से निकल गई।

निशांत उसके पीछे लगभग भागता हुआ गया और हाथ थाम कर उसे रोकता हुआ बोला, "कहां जा रही हो वसुधा ! कोई गलतफहमी हुई है शायद ,वो मेरी बहन थी तुम्हारे बारे में ही बात हो रही थी।"

वसुधा ये सुन कर थोड़ा झेंप सी गई और खुद को कोसने लगी।

थोड़ा रुक कर निशांत से बोली, “माफ़ करना मैंने आपको गलत समझा…” इससे पहले कि वह अपनी बात पूरी करती निशांत ने अपनी एक उंगली उसके होंठों पर रख दी और बोला "कुछ मत कहो... मैं सब समझ गया हूं।"

थोड़ी देर बाद दोनों कैफे के अंदर गए। इस बार वेटर बस एक ही कॉफी का कप लेकर आया, जिसे दोनों शेयर कर पी रहे थे।

- हेमा काण्डपाल

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