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उसकी मौत का जिम्मेदार:तुषार उसे जान से ज्यादा चाहता था, इसके बावजूद उसने उसकी मृत्यु की कामना की, यह कैसा प्यार

3 महीने पहले
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अस्पताल में बैठा हुआ मैं अपने मन को विचरने से रोक नहीं पा रहा था। उससे हुई पहली मुलाकात बार-बार मुझे याद आ रही थी।

वह भी उसी कॉलेज में पढ़ती थी जिसमें मैं था। वह मेरा अंतिम वर्ष था और उसका पहला। पहली नजर में हो जाने वाले प्यार पर तब तक मैं विश्वास नहीं करता था, जब तक मेरी उससे मुलाकात नहीं हुई थी।

वह सीढ़ियों से तेजी से नीचे उतर रही थी, सूरज की रोशनी खिड़की से छनती हुई उसके पीछे-पीछे चल रही थी। धूप के कुछ टुकड़े उसके चेहरे पर भी चमक जाते। किसी परी की तरह लगी वह मुझे। शायद परियां ऐसी ही होती होंगी, मैंने सोचा।

उसके पीछे ही उतर रही उसकी फ्रेंड ने उसका नाम पुकारा तो मुझे उसका नाम पता चल गया। वह उसे धीरे उतरने के लिए कह रही थी।

वह कब आती है, कब जाती है, उसकी क्लास किस दिन, किस समय शुरू होती है, कब खत्म होती है, यह मैंने बहुत कोशिश करके जान लिया था। हालांकि इसके लिए मुझे अपनी क्लासेस छोड़नी पड़ी थीं। मैंने खुद जाकर उसका पूरे हफ्ते का रूटीन जान लिया। मैं उसी समय पर हर रोज वहां जाकर खड़ा हो जाता, जहां से वह गुजरती थी। उसकी एक झलक पाने के लिए मैं बेचैन रहता। जिस दिन वह कॉलेज न आती, मैं उदास हो जाता।

मेरे दोस्त ने मेरी दीवानगी देख मुझसे कहा कि मुझे उसे बता देना चाहिए कि मैं उससे प्यार करता हूं। साल खत्म होने वाला था इसलिए मुझे उसकी बात सही लगी।

मैं स्वभाव से शर्मीला था। इससे पहले कभी लड़कियों से खुलकर बात भी नहीं की थी। डेट पर ले जाने का तो सवाल ही नहीं उठता था।

मैं बहुत हिम्मत जुटाकर उसके पास गया। इससे पहले कि मैं नाम बताकर अपना परिचय देता, वह बोली, “मुझे पता है, तुम्हारा नाम तुषार है। तुम स्वीट होम सोसाइटी में रहते हो और थर्ड ईयर में हो। हिस्ट्री ऑनर्स कर रहे हो। कल तुम्हारी आखिरी परीक्षा है और तुम लगभग 4 महीने से मुझे फोलो कर रहे हो।”

यह सुनकर मैं चौंक गया। मेरे चेहरे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं। मुझे यकीन हो गया था कि अब जबरदस्त मार मुझे पड़ने वाली है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और वह सीधे मेरी आंखों में आंखें डालकर ऐसे देखने लगी मानो चाहती हो कि मैं कुछ बोलूं। मेरे दोस्त ने पहले ही मुझे सिखाकर भेजा था कि मैं चुप न रहूं। चाहे जो हो जाए, इस मौके को हाथ से न जाने दूं।

मैंने पसीना पोंछा और आवाज में आत्मविश्वास घोलते हुए कहा, “तुम पहले से ही मेरे बारे में बहुत कुछ जानती हो, तो क्या कल मैं तुम्हें डिनर पर ले जा सकता हूं?”

“तुम बहुत लंबे समय से इस बात इंतजार कर रहे हो इसलिए मैं "ना’ नहीं कहना चाहती। लेकिन कल परीक्षा के तुरंत बाद मैं सिंगापुर जा रही हूं। तो क्या हम अभी कॉलेज कैंटीन में जाकर कुछ खा सकते हैं?”

वह पीले टॉप और लाल स्कर्ट में बहुत सुंदर लग रही थी और जब वह मुस्कराई तो उसकी आंखें भी मुस्करा उठीं। मेरा दिल तेजी से धड़क रहा था और मैं अपनी धड़कनें सुन पा रहा था। मुझे अपना शरीर जलता महसूस हुआ, कान लाल हो गए। ऐसा तभी होता था जब मैं घबराहट महसूस करता था। वह मुझसे बात कर रही है, मेरे साथ कैंटीन जाने को तैयार है, वह सिंगापुर जा रही है, सारी बातें मुझे हैरान कर रही थीं।

उसके हावभाव से आत्मविश्वास झलक रहा था। वह बहुत सहज थी। मुझे खुद पर गुस्सा भी आ रहा था कि चार महीने मैंने डरते-डरते क्यों गुजारे। कैंटीन में खाते हुए वह लगातार मुझसे सवाल करती रही कि मैं क्या करना चाहता हूं। भविष्य को लेकर मेरी योजनाएं क्या हैं।

मैंने उससे पूछा कि उसे मेरे बारे में इतना सब कैसे पता है, तो वह हंसने लगी और उसके साथ मैं भी।

उसने कहा कि मेरे साथ बीता यह समय बहुत अच्छा था। उसने यह भी तसल्ली दी कि जाने से पहले कल वह मुझसे मिलकर जाएगी। मुझे लगा कि अपनी परी के साथ मैं बादलों में उड़ रहा हूं।

एक्जाम खत्म हो जाने के बाद क्लासरूम में पार्टी रखी गई। अब सबकी राहें अलग होने वाली हैं, यह सोचकर हम आपस में एक-दूसरे से मिलने और कहकहे लगाने में व्यस्त हो गए। इस सब में मैं पूरी तरह भूल गया कि उसने मिलने के लिए कहा था।

चार बजे मैं उसकी क्लास की तरफ भागा, लेकिन वहां कोई नहीं था। अब उससे कैसे मिलूंगा। मुझे यकीन था कि जब वह छुट्टियों से वापस आएगी तो मेरे बारे में सब कुछ भूल चुकी होगी। लेकिन अंदर ही अंदर मुझे महसूस हो रहा था कि एक ही मुलाकात ने हमारे बीच काफी कुछ ऐसा कर दिया था कि दोनों के लिए भूलना नामुमकिन होगा। मुझे लग रहा था जैसे मैं उसे बहुत लंबे समय से जानता हूं और हम एक दूसरे के लिए बने हैं।

पापा ने मुझे आगे की पढ़ाई करने के लिए मेरी बुआ के पास स्कॉटलैंड भेज दिया। पढ़ाई के साथ-साथ मैं नौकरी भी करने लगा। मैं अक्सर उसके बारे में सोचता, उसे याद करता। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं कभी कविताएं लिख सकता हूं, लेकिन उसकी याद को, उसके एहसास को मैंने कविताओं का रूप देना शुरू कर दिया और एक पत्रिका में उन्हें भेज दिया।

प्रिय के लौटने की प्रतीक्षा कर रहे प्रेमी के दर्द और पीड़ा की कविताएं मैं लिखने लगा। उस प्यार की प्रतीक्षा में जिसे व्यक्त करने के लिए शब्दों की भी जरूरत नहीं होती।

कविताओं ने किताब का रूप ले लिया और लोगों ने उसे खूब पसंद किया।

वहां मैंने कई लड़कियों को डेट किया। मेरे दोस्तों ने समझाया कि ऐसी लड़की की याद में जीना जिससे एक ही बार मुलाकात हुई थी, बेवकूफी है। लेकिन वह कुछ देर की मुलाकात मेरे लिए इतनी अहम थी कि अन्य लड़कियों के साथ बिताया लंबा समय भी मुझे बेमानी लगता।

कई बार मन हुआ कि मैं इंडिया जाकर उससे मिल लूं, लेकिन यह सोचकर डर गया कि उसके मन में भी मेरे लिए ऐसी ही भावनाएं हैं या नहीं, यह मैं नहीं जानता। उस एक मुलाकात में कैसे जान सकता था मैं?

मुझे लगा दिल और कविताओं में उसके साथ प्यार करते रहना ही ठीक होगा। मैं ऐसे ही खुश था।

मुझे उन लड़कियों से मिलने में कोई दिलचस्पी नहीं थी जो केवल टाइम पास के लिए संबंध बनाना चाहती थीं। पर मेरे दोस्त मुझे यह कहकर एक दिन जबरदस्ती एक रेस्तरां में ले गए कि इसके बाद वे किसी लड़की से मिलने के लिए मुझसे नहीं कहेंगे।

रेस्तरां में बहुत कम रोशनी थी। वह लड़की जिससे मुझे मिलाने लाया गया था, एक कोने में बैठी थी। मेरे दोस्त उसकी ओर इशारा कर इधर-उधर खिसक गए।

मैं उसके पास जाकर खड़ा हो गया। रोशनी इतनी हल्की थी कि चेहरा साफ नजर नहीं आया।

मैंने गौर से देखा तो विश्वास नहीं हुआ कि जिससे मिलने के लिए मैं हमेशा बेताब रहता था, वह वहां बैठी है। मेरे दिल की धड़कनें बढ़ गईं।

“तुम?” वह चहकी।

“मुझे नहीं पता था कि मेरी ब्लाइंड डेट उसके साथ है जिसे मैं पहले से जानती हूं।”

“मुझे भी। क्या तुमने एक्जाम के बाद मेरा इंतजार किया था?” मैंने बरसों से मन में अटका सवाल पूछा।

“मैंने बहुत देर तक इंतजार किया। पापा का गुस्सा बेकाबू होने के बाद ही मैं वहां से निकली थी। फ्लाइट का समय हो रहा था। तुम आए क्यों नहीं? मैंने सोचा, एक बार की मुलाकात के बाद शायद तुम्हारा मुझे लेकर इरादा बदल गया है। मुझे बहुत बुरा लगा था। मुझे लगा था वह मुलाकात हम दोनों के लिए खास थी। वे पल बहुत कुछ दे गए थे हमें। मुझे लगा था कि तुम मेरे लिए बने हो। मैंने आज तक किसी और के साथ ऐसा महसूस नहीं किया।” वह एक सांस में बोल गई।

उसकी आंखों में नमी थी। वह उतनी ही खूबसूरत लग रही थी जितनी उस दिन, जब मैंने उसे पहली बार देखा था। वह वही सब कह रही थी जिसकी मैंने उससे मिलने पर उसे बताने के लिए हजारों बार रिहर्सल की थी। मैं उसे फिर खोना नहीं चाहता था। मैं घुटने के बल बैठ गया और उसे प्रपोज किया। मैंने पूरे आत्मविश्वास के साथ उससे पूछा, “मुझसे शादी करोगी?”

उसने ‘हां’ में सिर हिलाया और हम दोनों ने एक दूसरे के अधरों को चूम लिया। चुंबन के साथ हमने अपने जीवन को एक-दूसरे से बांध लिया था।

हमने शादी कर ली। मैंने अपनी कविताओं की एक और पुस्तक प्रकाशित की और उसे समर्पित की। हम लगभग पच्चीस वर्ष एक दूसरे के साथ बिता चुके हैं। इस दौरान हम लड़े भी और फिर सुलह भी की। हमने कई देशों की यात्राएं कीं। हमारे दो बच्चे हैं। जीवन के तमाम उतार-चढ़ावों को हमने साथ झेला। अपने शरीर को समय के साथ बदलते देखा, लेकिन एक दूसरे के लिए हमारे प्यार में कभी कमी नहीं आई। हमारा प्यार नहीं बदला।

लेकिन आज समय मुझे हराना चाहता है। वह बता रहा है कि मेरा प्यार इस दुनिया की सीमाओं को पार कर मुझसे दूर जा सकता है।

वह आईसीयू में है। मैं उसे देखना चाहता हूं, पर हिम्मत नहीं हो रही। उसके शरीर पर नलियां लगी हैं। मैं उसे उस हाल में नहीं देख सकता। लेकिन उसे देखे बिना रहना भी मेरे लिए मुश्किल है। इच्छा-मृत्यु की अनुमति मिल चुकी थी। मैं उसे तकलीफ में आखिर कैसे देख सकता था।

मैंने उसका हाथ पकड़ कर उससे बात की। मैंने कहा कि मैं नहीं चाहता कि उसे अब और तकलीफ हो। मैं उसके पास जल्दी ही आऊंगा। हम फिर से मुलाकात करेंगे, फिर से अपने एहसास बांटेंगे, और इस बार मैं उसे दूर नहीं होने दूंगा।

मैंने उसका थामे रखा। वह धीरे-धीरे शिथिल हो रहा था। उसकी आंखें बंद हो रही थीं, जिनमें मेरे लिए प्यार के सिवाय और कुछ नहीं था।

जिस दिन से वह बीमार हुई है, मैं हर पल मरा हूं। मुझे नहीं पता उसे इस तरह जाने देना ठीक था या नहीं, पर उसे रोज इस तरह तिल-तिल मरते देखना मेरे लिए मुमकिन नहीं था। मैं जानता हूं कि आखिर यूं रोज-रोज हर पल मरना कैसा होता है।

- सुमन बाजपेयी

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