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E-इश्क:मेरे और तुम्हारे अलावा यहां कोई नहीं है जो हमारी बात सुन सके, मुझे तुम्हारी चुप्पी बहुत चुभती है

6 महीने पहले
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“आशीष तुम अपने ख्वाब मुझे दे दो, मैं उन्हें अपने सीने में छुपाकर, पलकों पर सजाकर रखूंगी जब तक पूरे न हो जाएं उनकी हिफाजत करूंगी।”

आशीष चुप था।

सरिता फिर बोली, “आशीष, तुम सुन रहे हो ना? वैसे भी यहां मेरे और तुम्हारे अलावा कोई नहीं है। हां, यह बरगद का पेड़ है जो हमारी बात सुन सकता है, लेकिन किसी को बता नहीं सकता। कुछ तो बोलो, मुझे तुम्हारी चुप्पी बहुत चुभती है।”

“क्या बोलूं सरिता, मेरी तो ख्वाब देखने की भी औकात नहीं है जो तुम्हें अपने ख्वाब दे सकूं। चलो, तुम्हारे ख्वाब को ही अपनी जिंदगी का ख्वाब बना लेता हूं।”

“तुम मुझे अपना ख्वाब बताओ।" आशीष ने आग्रह किया तो सरिता ने शर्माते हुए कहा, "धत !"

वह हंसा, “मुझे क्या पता तुम क्या ख्वाब देख रही हो।” उसने बरगद के तने पर बाइक की की रिंग से गहरी तरह गोद कर लिख दिया ‘धत’ उसके नीचे लिखा आशीष।

“सरिता, ये देखो तुम्हारा ख्वाब!”

“पागल हो तुम आशीष, इसीलिए इतना प्यार करती हूं तुम्हें।” इतना कह कर दोनों बरगद की छांव में लिपट गए।

तभी सरिता का मोबाइल बजा और दोनों जैसे होश में आ गए।

“मुझे अब घर जाना होगा आशीष,” कहते हुए सरिता जाने लगी, तो आशीष ने बरगद पर गुदे हुए ‘धत’ को चूमा और उसके साथ घर की तरफ चल पड़ा।

रास्ते में भी दोनों की प्यारभरी बातें जारी थीं। “आशीष, क्या उम्रभर मुझे ऐसे ही प्यार करोगे?” सरिता ने पूछा तो आशीष ने उसका हाथ पकड़कर मुस्कुराते हुए कहा, “मेरी नहीं इस बरगद के पेड़ पर लिखे ‘धत’ की गवाही ले लो।”

आशीष की बात सुनते ही सरिता का चेहरा लाल हो गया। वह हल्के से आशीष का हाथ छुड़ाते हुए फिर बोली "धत! अब चलो, नहीं तो पापा से दोनों को बहुत डांट पड़ेगी।”

सरिता के पापा की जूस की दुकान पर ही तो काम करता था आशीष, लेकिन दोनों का प्यार पूरा न हो सका। सरिता किसी और की हो गई।

आज एक लंबा अरसा बीत जाने के बाद सरिता अपने पति के साथ बुद्धा गार्डन घूमने आई है। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा है।

वह मन ही मन बुदबुदाई, “तो क्या बरगद का पेड़ आज भी मौजूद होगा… और आशीष..?”

अचानक सरिता ने मिहिर से कहा, “वो देखो टी स्टॉल, यहां प्रकृति के करीब बैठकर चाय पीने का अपना ही सुख है।”

दोनों बेंच पर बैठ गए।

"जी मैगी और चाय मिलेगी, कहिए तो बना दूं?” किसी ने पूछा तो आवाज सुन सरिता चौंक गई।

“उफ्फ! यह तो आशीष है,” उसे अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हो रहा था।

"हां भाई, जरा अच्छी चाय बनाना," मिहिर ने सुनते ही कहा।

शाम का वक्त था, वहां पर दो-तीन जोड़े और बैठे थे। मिहिर बोले "सरिता, मैं बस अभी आया पांच मिनट में, सनसेट कैप्चर कर के, तुम बस चाय बनवाओ।"

मिहिर के जाते ही सरिता आशीष के पास पहुंच गई। “आशीष, यह दुकान..?”

“हां, तुम्हारी शादी के बाद अंकल ने मुझे यह शॉप अलोट करा दी थी। मैं भी कितने दिन जूस पिला कर लोगों की सेवा करता।”

तभी भीतर से उसकी पत्नी आई तो वह बोला, “उर्मी, यही सरिता मेम साहब हैं, जिनके पापा ने हमें यह शॉप दिलाई थी।”

उर्मी ने सरिता को हाथ जोड़ कर नमस्ते किया जैसे उसके अहसान के नीचे दबी हो। फिर वह तुरंत चाय और मैगी लाने चली गई।

सरिता ने देखा, यह दुकान तो किसी बड़े से पेड़ की छांव में है। फिर जैसे ही उसकी नजर ऊपर उठी, तो ‘धत’ पर जाकर रुक गई, जो इन बीस सालों में पहले से काफी बड़ा हो गया था, लेकिन तने पर वैसे ही गुदा था।

पेड़ को देखते हुए सरिता ने आशीष पूछा, “क्या तुम अब भी मुझे प्यार करते हो?”

उसने धीरे से कहा, “बरगद से गवाही ले लो।”

आशीष ने भी सरिता से पूछा, “और तुम?”

सरिता फिर बोली "धत!"

आशीष हंसा, "खुश हो?”

“मैंने कहा था ना, मेरा कोई ख्वाब नहीं है, तुम्हारा ख्वाब ही मेरा ख्वाब है। मैं तुम्हारा ख्वाब जी रहा हूं सरिता।"

- शिखर प्रयाग

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