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E-इश्क:उस पहाड़ी लड़के की मुस्कुराहट, उसकी बातें अक्सर याद आतीं उसे, कितना मुश्किल है प्यार भरे लम्हों को भूल पाना

4 महीने पहले
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पहाड़ की सड़क के किनारे पत्थरों की कतारें थीं। वहां एक लड़की उदास चेहरा लिए अपने आप में गुम अकेले बैठी थी। दूर कहीं से एक लड़का उसे देख रहा था… आर्ट गैलरी में लगी ये पेंटिंग किसी आशीष कुमार की थी! ज़ेबा देर से एकटक सफेद दीवार में लगी उस पेंटिंग को देखे जा रही थीं। न जाने ऐसा क्या था जो उन्हें अपनी तरफ खींचे जा रहा था।

"ज़ेबा, बाकी पेंटिंग्स भी देख लो। तुम कब से यहीं खड़ी हो।" दिव्या मैम ने उनका कंधा हौले से छुआ तो ज़ेबा चुपचाप उन्हें देखने लगीं।

दरअसल ये तस्वीर ज़ेबा को उनके अतीत की याद दिला रही थी। 20 साल पहले का गुजरा कल! उस वक्त ज़ेबा यही कोई 17-18 बरस की रही होंगी, पापा की पोस्टिंग दार्जिलिंग हो गयी थी। सहेलियों का साथ छूट जाने से और नए कॉलेज में मन न लगने से वो उदास रहने लगी थी। घर के बिल्कुल सामने पहाड़ी सड़क थी, जहां कभी कभार कोई बस दिख जाती, वरना पूरे वक्त सन्नाटा छाया रहता।

ज़ेबा उसी सड़क के किनारे पत्थरों पर घंटों बैठी रहती। पापा को काम से फुर्सत नहीं मिलती और मां..." मां को ज़ेबा ने देखा ही नहीं था।

इधर बीच ज़ेबा को एहसास होने लगा, कोई छुप कर उसे देख रहा है। कौन है वो? पहाड़ी रस्ते, तीखी ढलान, दूर तक फैले हुए बेजान पत्थरों के दरमियां... वो कौन था जो उसे चोरी-छुपे निहारता था और उसके पलटते ही बिजली की तेजी से छुप जाता था। ये खयाल आते ही ज़ेबा का नाजुक दिल धड़क उठता, चोरी-चोरी उसकी निगाहें भी उस देखने वाले का इंतजार करने लगीं।

आखिर लुकाछिपी का खेल खत्म हुआ। चुपचाप उसे निहारने वाले लड़के का नाम पिंकी था। गोरा, गुलाबी, शर्मीला लड़का और नाम पिंकी! ज़ेबा हंसते-हंसते दोहरी हो गयी थी। मिलते-मिलाते हंसते हंसाते जाने कब पहला प्यार हो गया ज़ेबा को।और पिंकी... वो तो पहली नजर में ज़ेबा को दिल दे बैठा था।

कहता था, “तुम बुरांश के फूलों जैसी लगती हो, मैं सुधबुध खोये घंटों तुम्हें देखता रहता था।”

ज़ेबा हंस कर बोलती, “अरे, तो बोलते क्यूं नहीं थे बुद्धू? एक बार मुझे बुलाते तो। तुम्हें पता भी है शुरू-शुरू में कितना डर गयी थी मैं...”

“सोचता था कहीं तुम नाराज न हो जाओ, यहां आना न छोड़ दो,” फिर कुछ सोचते हुए उसने कहा, “पता है ज़ेबा, तुम यहां पत्थरों के बीच चुपचाप गुमसुम बैठी किसी पेंटिंग जैसी लगती हो। एक दिन मैं तस्वीर बनाऊंगा तुम्हारी। तुम बहुत सुंदर हो।”

वो उसकी तरफ देखता हुआ खोये हुए लहजे में यूं बोलता जैसे सच में उसके हाथों में ब्रश है और सामने कैनवास।

ज़ेबा इस मासूम लड़के का चेहरा देखती जहां प्यार और अपनापन था, जहां सच्चाई की रौशनी बिखरी हुई थी।

अकेलेपन और उदासी के भंवर से निकल कर ज़ेबा को खुशियों का संमदर मिल गया था, मगर वो कहां जानती थी कि ये चाहतें महज चंद रोज की हैं। न जाने मुस्कुराहटों की उम्र इतनी कम क्यूं होती है?

कुछ ही दिन बीते थे कि पापा को चपरासी बाबा ने ये सारी खबर दे दी थी। वे दो जोड़ी हथेलियां जिनके मिलते ही दो दिल खुशी से झूम जाते थे, हमेशा के लिए अलग हो गए।

पापा ने आनन-फानन फैसला लिया। वैसे भी बिन मां की बेटियों के पिता दुनिया की सर्द गर्म देख कुछ ज्यादा ही सख्त दिल हो उठते हैं।

फौरन ज़ेबा को दिल्ली भेज दिया गया, बुआ के घर। वो रोती रही। अपने घर से निकलना और जबरदस्ती कहीं और भेजा जाना उसे दुखी कर रहा था।

कुछ रोज ज़ेबा रोती रही, उस पहाड़ी लड़के की मुस्कुराहट, उसका एकटक निहारना, उसकी बातें अक्सर याद आतीं उसे... कितना मुश्किल है प्यार भरे लम्हों को भूल पाना।

कहते हैं वक्त सबसे बड़ा मरहम है। दिन बीतने लगे, गुजरते सालों की गर्द ने उन कदमों के निशान हल्के कर दिए। नया कॉलेज, नये दोस्त... ज़ेबा को वो ‘गुलाबी लड़का’ अब कम याद आता था।

यादों के सिक्के परे रखकर ज़ेबा ने गुलाबी फ्रेम का चश्मा उतारा। निगाहें अभी तक उसी पेंटिंग पर थीं। आंखें नम हो रही थीं, उन्हें खुद पर खीझ हो आयी। दो बच्चों की मां और मशहूर फिजीशियन असद गिलानी की बीवी होकर ऐसी कमजोर दिल? ये बचकानी हरकत? 17-18 साल की उम्र में हुई मुहब्बत अब याद आ रही है? तौबा-तौबा! इस उम्र में इतना जज्बाती होना अच्छा लगता है क्या?

मगर जाने क्यों उस गुलाबी चेहरे वाले लड़के को फिर से देखने की ख्वाहिश होने लगी थी। ये दिल भी न! उन्होंने जबरदस्ती की मुस्कुराहट लाकर दिव्या मैम को देखा, जो उन्हें अपनी ओर आने का इशारा कर रही थीं।

"इनसे मिलो, मशहूर आर्टिस्ट आशीष कुमार। मैं इन्हें बता रही थी हमारी सिस्टर आपकी पेंटिंग पर पीएचडी कर रही हैं। आधे घंटे से आपकी पेंटिंग निहार रही हैं मैडम।”

दिव्या मैम ने हंस कर कहा।

"हेलो"आशीष कुमार ने हल्का सा सिर को झुकाते हुए कहा।

"हेलो, माई सेल्फ…”

"ज़ेबा!" आशीष कुमार ने ज़ेबा की बात पूरी कर दी।

वो हैरानी से देख रही थीं। ये चेहरा... दुआएं इतनी जल्दी कुबूल होती हैं क्या? वो दुबला-पतला गुलाबी सा लड़का कितना बदल गया था। लंबे भूरे बाल अब सलीके से कटे हुए थे। भरा-भरा चेहरा… लेकिन जीन्स के साथ पहना गुलाबी चिकन का कुर्ता अब भी उसके चेहरे पर जैसे वही गुलाबी रंग ला रहा था। ज़ेबा की नजरें नहीं हट रही थीं उस पर से।

"आप दोनों एक दूसरे को जानते हैं?" दिव्या मैम ने पूछा तो आशीष मुस्कुरा कर ज़ेबा को देखने लगे।

"नहीं, मैं आशीष साहब को नहीं जानती, मैं सिर्फ पिंकी को जानती हूं।” ज़ेबा के इतना कहते ही आशीष कुमार के चेहरे पर वही वर्षों पुरानी मुस्कान बिखर गई। सालों बाद आज पिंक मुलाकात हुई थी। एक गुलाबी लकीर दोनों के चेहरों पर झलक रही थी।

- सबाहत आफरीन

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