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आंख और होठों के बीच केवल सूतभर का फर्क:ठंडी रात में मैं और शिवम अपनी गर्म सांसों में जल रहे थे, बनारस की फिजां ने इतना खूबसूरत नजारा शायद ही कभी देखा होगा

2 महीने पहले
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रात के गहरे सन्नाटे को उसकी बाइक की आवाज चीरती चली जा रही थी। कुछ मोहब्बत, तो कुछ सर्दी की और कुछ उबड़-खाबड़ रास्तों की मेहरबानी से न जाने कितनी बार मेरा बदन उससे जा लगा। तेज रफ्तार की वजह से मेरे बाल उड़-उड़कर उसके चेहरे से जबरदस्ती दोस्ती गांठने में लगे थे। वह बिना कुछ बोले चुपचाप बाइक चलाता रहा। कल उसको दिल्ली जाना था। परसों उसे नई नौकरी ज्वाइन करनी थी। शायद आज हम आखिरी बार मिल रहे थे। पिछले दो साल से मैं उसकी जूनियर थी, लेकिन दोस्ती सात महीने पुरानी हो चुकी थी, अब तो लगने लगा कि मामला दोस्ती का नहीं दिल का भी हो गया है।

बनारस की सड़कों के अंधेरे रास्तों से गुजरती हुई, बाइक गंगा के सीने पर सजे पीपे के पुल की तरफ बढ़ गई। आज इन रास्तों पर डर नहीं लग रहा था। पुल के बीचों बीच लाकर शिवम ने बाइक रोक दी। आज पूर्णिमा की रात नहीं थी, लेकिन इतनी रोशनी तो थी कि गंगा, शिवम और मैं, तीनों एक दूसरे को देख पा रहे थे और हां हमारी स्प्लेंडर बाइक भी। उसने कहा, मैं दिन में अक्सर यहां आता हूं, क्या तुम कभी आई हो? मैंने कहा, नहीं, मैं बेवजह हॉस्टल से बाहर नहीं निकलती, नौकरी और यूनिवर्सिटी बस। सीधी-सादी हूं, सहेलियां गंवार बनारसी कहती हैं। इसके बाद हम दोनों की हंसी रामनगर और बनारस के बीच पुल पर गूंज उठी।

मैंने कहा, सुना है गंगा में डॉल्फिन रहती है। शिवम ने कहा, “अवाज देकर देखो, शायद तुमसे मिलने ही आ जाए।”

बाइक से उतरने से पहले शिवम को थाम कर बैठने की सिरहन की खुमारी अभी उतरी नहीं थी। रात अंधेरी जरूर थी पर मेरी आंखें चमक रही थी. तनिक भी डरे बिना मैं जोर से चिल्लाई, “डॉल्फिन राजा, बाहर आजा।” एक-दो बार और ट्राई किया, डॉल्फिन नहीं आया। मैं वापिस बाइक पर बैठते समय लड़खड़ा गई। शिवम ने एक हाथ बाइक से हटाकर जोर से मुझे थामा और नीचे गिरने से पहले अपनी तरफ खींच लिया। पिछले सात महीने में आज हम सबसे करीब थे। हमारे सिर, आंख और होठों के बीच सूतभर का फर्क था, लेकिन फर्क तो था ही और इसका सुख अद्भुत भी। उस ठंडी रात में हम अपनी गर्म सांसों में जल रहे थे। नदी होने की वजह से पुल पर कोहरा घना था। इस कोहरे की चादर में हम सिमटे थे, लेकिन लिपटे नहीं। उस रात के पहले बनारस की फिजां ने इतना खूबसूरत नजारा शायद ही कभी देखा होगा। चुपके-चुपके मिल रहे दो दिलों के दो ही गवाह। रौशन आसमां और उसकी रोशनी को चूमती गंगा।

आज बनारस की गलियों और सुनसान सड़कों पर ही रात गुजरने वाली थी। कल सुबह शिवम की ट्रेन थी। वापस बाइक पर बैठने के बाद मैं सोच रही थी कि जिस लड़के को मैंने कभी पसंद नहीं किया, उसकी जुदाई में कहीं बर्बाद न हो जाऊं। दो साल पहले जब मैंने ऑफिस ज्वाइन किया, तो शिवम मुझे सबसे ज्यादा अनकल्चर्ड, इल मैनर्ड लगा। उसे किसी से बात करने की तमीज नहीं थी, न तो जूनियर से न सीनियर से। बॉस का मुंहलगा होने के कारण लोग उसे पलट कर जवाब भी नहीं दे पाते। कई बार मुझे लगता कि वह मुझसे बात करना चाहता, लेकिन मैं उसे इग्नोर करती। ऐसा करते समय मुझे बहुत मजा आता। उससे काफी जूनियर होने के बावजूद मैं उसकी हर बात को कभी टालती तो कभी काटती। मैं मजबूर थी, मुझे ऐसा आदमी पसंद ही नहीं था, जो बड़ों की इज्जत नहीं करता, जिसकी आवाज सुनकर हर कोई सहम जाए, जिसके ऑफिस में आते ही माहौल खौफनाक हो जाए। मैं कहां खुशमिजाज लड़की, वह सड़ा मनुष्य। गेट कीपर से लेकर प्यून तक सबकी हमदर्द और वह कहां सबको बात-बात पर झिड़कने और लताड़ने वाला। फिर मैं इसके प्यार में क्यों और कैसे पड़ गई?

मुझे एहसास हो गया था कि हमारी दोस्ती उन्हीं दिनों दिल लगी बन गई थी जब कई बार नाईट शिफ्ट के दौरान हम दोनों अकेले होते। हमारे बीच बातें होने लगी। कुछ ही मुलाकातों में हम दोनों को यह पता चल चुका था कि हम दोनाें ही अधूरे रिश्ते जी चुके हैं। शायद यही अधूरापन अब हमें एक-दूसरे के नजदीक आने पर मुकम्मल होने का अहसास करा रहा था। मैंने ऑफिस की कुछ लड़कियों के साथ उसकी जोड़ी बनाने की भी सोची पर बात नहीं बनी। शिवम सबकुछ समझता पर हल्की सी मुस्कुराहट के साथ मुड़ जाता।

पिछले दो महीने से मुझे यह महसूस होने लगा था कि शिवम का तो पता नहीं मैं ही उसकी ओर अनजाने में बढ़ने लगी हूं । उसने चतुराई के साथ ऑफिस में मुझे प्रोटेक्ट करना शुरू कर दिया था। उसने मेरी सीट बदलने के चक्कर में ऑफिस का सिटिंग अरेंजमेंट बदलवा दिया। अब मैं जहां बैठती वहां से हम दोनों एक दूसरे को देख सकते थे मुझे समोसे खिलाने के लिए वह कंजूस अब पूरे डिपार्टमेंट के लिए समोसे मंगाने लगा था। अगर ऑफिस में मुझे काम करते हुए देर होती और दूसरे पुरुष सहकर्मी भी ऑफिस में होते तो वह अपने केबिन में बैठा बहुत व्यस्त नजर आता, मेरी थर्ड हैंड स्कूटी भी अब केवल उसी के किक से स्टार्ट होने लगी थी। मैंने भी तो अब उससे बहस करनी छोड़ दी। कोई उसके बारे में कुछ भला बुरा कहता, तो उसमें शरीक होने के बजाय बाहर निकल जाती। कभी-कभी ऑफिस की बालकनी में खड़ी होकर उसके आने का इंतजार करने लगती।

दो घंटे में हम जुदा होने वाले थे, सुबह की ट्रेन से वह लखनऊ और वहां से दिल्ली जाने वाला था। क्या मेरी यह मोहब्बत भी अधूरी रह जाएगी, अब तो लगता है गंगा में ही छलांग लगाना पड़ेगा। कौन कहता है लड़के बेशर्म हो गए हैं, आई लव यू तक तो मुंह से फूटा नहीं। मेरी भी जिद थी, मैं तो बच्चू कुछ नहीं कहूंगी, घुटने टेककर आई लव यू तो तुम्हें ही कहना होगा। शिवम की ट्रेन आ गई, जाते वक्त शिवम ने इतना ही कहा, चलोगी मेरे साथ? मैं ऊपर से मुस्कुरा कर और अंदर से कसमसा कर रह गई। भला, ये क्या बात होती है, पहले दिल की बात तो कहो, फिर ले चलो जहां ले जाना है।

दिल्ली जाने के बाद भी शिवम रोज रात को फोन करता, जब तक मैं ऑफिस से हॉस्टल तक का रास्ता तय नहीं कर लेती वह बातें करता रहता। फोन पर इधर-उधर की बातें होती ही रहतीं, लेकिन इन बेकार की गप्पाें में मोहब्बत का कहीं नामोनिशां नहीं होता। एक दिन उसने दिल्ली आने को कहा, उसके ऑफिस में इंटरव्यू चल रहे थे। मैं दिल्ली पहुंच गई। वह स्टेशन पर मुझे लेने आया। दिन में इंटरव्यू हो गया और शाम को मेरी ट्रेन थी। शाम तक मेरे इंटरव्यू का रिजल्ट भी आ जाता। उस जाने-पहचाने अजनबी के साथ, मैं दिल्ली मेट्रो से दिलवालों के शहर की सैर पर निकल पड़ी।

करोल बाग मेट्रो स्टेशन पर जैसे ही वह मेट्रो के अंदर गया, मैं भीड़ में ही बाहर छूट गई। मेट्रो का दरवाजा बंद हुआ, हमारी निगाहें मिली। मेट्रो के आंखों से ओझल होने तक हमदाेनों की आंखों से आंसू भर आए थे। उस बड़े से प्लेटफॉर्म पर मैं और मेट्रो की भीड़ में शिवम तनहा रह गया।मुझे लगा मैं भीड़ से भरे प्लेटफॉर्म पर ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में अकेली हो गयी हूँ। मेरे अन्दर की चुलबुली चहकती निडर लड़की उस पल न जाने कहाँ खो गई थी? न चाहते हुए भी, स्टील की बेंच पर बैठते ही मैं रो पड़ी पड़ी। अपने अपने इश्क पर बिसूरती लड़कियों के चेहरे जिनकी मैं खिल्ली उड़ाती आई थी, जैसे मुझे एकसाथ मिलकर मुंह चिढ़ा रहे थे। पांच मिनट बाद ही शिवम दूसरी तरफ की मेट्रो से वापस आता नजर आया। उसे देखते ही मेरे आंसू हिचकियों में बदल गए और शिवम् ने मुझे पूरी बेफिक्री के साथ बांहों में भर लिया। शिवम उस पल भी कुछ नहीं बोला पर उसकी आंखें वो सब कह गईं जो मैं सुनना चाह रही थी।

- निशा सिन्हा

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