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  • She Was Bound By His Magnetic Attraction, Forgetting That Love May Do It, But She Will Not Be Able To Take The String Of Love To The High Skies

E-इश्क:इठलाती, इतराती वह उसके चुंबकीय आकर्षण में बंधी यह भूल गई थी कि प्यार बेशक कर ले, पर प्यार की डोर को वह ऊंचे आसमान तक नहीं ले जा पाएगी

2 महीने पहले
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समुद्र किनारे बैठी वह रेत पर उंगलियां घुमाते हुए आकृतियां बना रही थी। अनगढ़, अबूझ आकृतियां… आकार विहीन… शायद जब मन उद्वेलित होता है तो ऐसा ही होता है। सब गड्डमड्ड हो जाता है। आखिर मन की स्थिरता ही तो आकार देती है, फिर चाहे जीवन में हो या रेत पर। क्यों नहीं दे पा रही है वह आकार? इतनी दुविधा कि सोच पर जैसे जाले लटक आए हों। चेहरा तो उसकी आंखों में ही नहीं, दिल में भी उतरा हुआ है, फिर भी रूप नहीं दे पा रही। अस्पष्ट है सब कुछ... धुंधला नहीं, बस उसी के अंदर एक झिझक है शायद।

वर्षों का अंतराल मन में बीहड़ बना देता है। हर कदम संभाल कर रखना होता है कि कहीं कोई कांटा न चुभ जाए, कहीं कोई नुकीली शाखा लहूलुहान न कर दे। एक लहर आई और सारी आकृतियों को मिटा गई। चलो अच्छा ही हुआ। भीतर सुकून की एक बयार चलने लगी। फिर से बनाएगी तो हो सकता है चेहरा सही बन जाए। मुस्कुराती आंखें, होंठों पर खिली हंसी, दाएं गाल पर प्यारा-सा तिल और एक कान में पड़ा स्टड।

‘‘क्या पहन लिया है,’’ वह पूछती तो उसकी झूलती लटों को पीछे करते हुए कहता, ‘‘यार, स्टाइल भी तो कोई चीज होती है। तुम्हारी तरह लंबे-लंबे झुमके तो नहीं लटका सकता।’’ उस समय उसकी आंखों में लहराते प्यार के समुद्र को देख वह नदी बन उसमें समा जाना चाहती।

बिंदास, मनमौजी और बेबाक... कोई असहजता नहीं, फिर क्यों आज उसके अस्तित्व को वह कोई रूप कोई नाम नहीं दे पा रही है? मोबाइल बजा। अनजान नंबर था, नहीं इस बार नहीं उठाएगी। पिछली बार उठाया था तो वह जिंदगी में आता चला गया था। रॉन्ग नंबर कहकर तब उसने फोन जैसे ही रखा था, पलटकर फिर फोन आ गया था। ‘‘आपकी आवाज बहुत सुरीली है, क्या मैं आपको कभी-कभी फोन कर सकता हूं?’’ अजीब लगा था उसे। यह सोचकर हां कह दिया था कि कौन फोन करता है।

लेकिन उसने किया, बार-बार किया। बातें हुईं, एहसास बांटे जाने लगे और कब वह उसके मन के अंदर आकर बैठ गया, उसे पता ही नहीं चला। प्यार ऐसे ही होता होगा! अनजान, अजनबी दो दिल एक साथ धड़कने लगे थे। इठलाती, इतराती वह उसके चुंबकीय आकर्षण में बंधी यह भूल गई थी कि प्यार बेशक कर ले, पर प्यार की डोर को वह ऊंचे आसमान तक नहीं ले जा पाएगी। अपनी जिम्मेदारियों का बोझ वह कुणाल पर नहीं डाल सकती। समेट लिया था उसने अपने आपको।

तीन साल हो गए हैं। प्यार कोई चीज तो है नहीं कि उसे यहां-वहां सरका दो या उठाकर फेंक दो। वह तो उम्र भर की जुंबिश होता है, सात सुरों का लयबद्ध संगति होता है।

एक-दो बार फिर फोन बजा, वही अननोन नंबर। उसके बाद मैसेज, …‘‘मुंबई में हो, मन नहीं हुआ कि एक बार मिल ही लो? अकेले समुद्र किनारे बैठे हुए कब तक उस पार जाने के लिए किसी किश्ती का इंतजार करोगी? खुद नदी बन समा क्यों नहीं जाती मेरे प्यार के समुद्र में? ऐसा करते हैं मैं ही किश्ती बन जाता हूं।’’

नंबर बदल लिया है उसने क्या? पीछे मुड़कर देखा। आंखों में लहराते प्यार के समुद्र को लिए खड़ा था कुणाल।

‘‘तुम?’’ काश! वह नदी बन पाती!

‘‘पिछले तीन सालों से हर पल की खबर रख रहा है यह तुम्हारा अननोन नंबर। बहुत हुआ, अब थोड़ा मौका दो अपनी जिम्मेदारियां बांटने का। क्यों सुखाना चाहती हो अपने भीतर कल-कल करती प्रेम की नदी को? मैं किश्ती बन जाता हूं। चलो संग-संग बहें।’’

फैली हुई बांहों में इस बार न समाई तो सचमुच रेगिस्तान बन जाएगी। लहरें उसके पांवों से टकराने लगीं। मन पर आकृति उभर आई थी, स्पष्ट, साकार।

- सुमन बाजपेयी

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