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रूप का प्यासा:लड़कियों को दौलत के जाल में फंसाने वाले शाहीन को रूपा से प्यार हो गया, यही उसकी सबसे बड़ी भूल थी

2 महीने पहले
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हिरण झाड़ियों में छिपा था। उसे भी एहसास हो गया था कि उस पर कोई निशाना लगाए है। वो घंटों ऐसे ही बैठा रह सकता था। शाहीन ने अपने साथी कियारा को इशारा किया। ये इशारा झाडियों में कहीं भी गोली दागने का था। गोली की आवाज सुनकर हिरण जरूर भागेगा। पूरा जंगल झाड़ियों से ढका था। बस थोड़ी सी जगह खुली दिख रही थी। हिरण के भागने के लिए छलांग मारते ही गोली चले तभी वो मारा जा सकता था।

शाहीन ने दम साधकर निशाना लगा लिया और उसके साथी ने गोली चलाई।

“आह!” एक स्त्री-स्वर के चीत्कार के साथ दोनो चौंक पड़े।

हिरण भाग खड़ा हुआ। दोनों दौड़कर आवाज की दिशा में पहुंचे।

सामने सहमी हुई लड़की को देखकर शाहीन जैसे मंत्र-मुग्ध हो गया। बिना ब्लाउज के एक साड़ी में आदिवासियों की पोशाक में लिपटी वह किसी म्यूजियम की अप्रतिम मूर्ति के समान लग रही थी। सांवला रंग, बोलती आंखें, गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होंठ, पुरानी फिल्मों की नायिका जैसी लग रही थी वह।

कुछ देर ठगा सा उसे देखते रहने के बाद जैसे शाहीन की चेतना लौटी, “तुम सही सलामत दिखती हो, फिर चीखी क्यों थीं?”

“गो... गोली...” उसके सहमे हुए गले से बस इतना ही निकला और उसने अपनी एक बांह आगे कर दी। एक लाल चकत्ता सा था। शायद गोली इतनी पास से गुजरी थी कि वो हिस्सा गर्मी से लाल हो गयाा।

शाहीन ने उस हिस्से को हौले से छुआ तो वह शर्म से लाल होते हुए सिहरकर छिटक गई। उसकी सिहरन, लाज भरी मुस्कान ने उसके चेहरे की खूबसूरती बढ़ा दी। शाहीन का मन हुआ कि तुरंत आगे बढ़कर उसे आलिंगन में समेट ले, लेकिन संस्कारों ने उसके कदम रोक दिए।

मुफलिसी और गलत संगत में भटकता शाहीन उस उम्र में जंगली जानवरों और उनसे प्राप्त वस्तुओं का स्मगलर बन चुका था जब उसे इस अपराध की गंभीरता का अंदाजा भी नहीं था। हां, अम्मी की परवरिश और बचपन के संस्कारों के कारण अभी तक उसने किसी लड़की के साथ जबरदस्ती करने का अपराध नहीं किया था।

हालांकि लड़कियां उसकी कमजोरी थीं। अपने वैभव पर आकर्षित लड़कियों से पहले दोस्ती करना, फिर उनका इच्छित देकर उन्हें जरखरीद समझकर भोगना उसके स्वभाव में था। पर बंधता वो किसी के साथ न था। हमेशा जी भर जाने पर दिल तोड़कर आगे बढ़ जाना उसकी फितरत बन चुकी थी।

उसकी काली कमाई का अतुलित वैभव जल्द ही किसी नई गोरी को अपनी ओर आकर्षित कर लेता। लेकिन आज उसने अपनी ओर अपलक देखती उस लड़की की आंखों में झांका तो सम्मोहित सा हो गया। इस अनछुई कली का स्वाद चखने को उसका जी तड़प उठा।

रूपा नाम था उसका। आदिवासी थी वो। शहरी भाषा कैसे जानती हो, इसके उत्तर में उसने बताया कि जंगल के अफसर के यहां मां के साथ बचपन से काम करती है।

दूसरे दिन शाहीन उसी रास्ते पर उसका इंतजार कर रहा था। वो मिली तो उसकी भोली कौतूहल भरी आंखें अपनेपन से गोल हो गईं। तभी शाहीन ने उसका हाथ पकड़ा तो वह सिर से पैर तक कांप उठी। उसकी पलकें झुक गईं और गाल सुर्ख हो गए।

शाहीन की जिंदगी में अब तक कोई ऐसी अनछुई लड़की नहीं आई थी। उसे रूपा की मासूम हरकतों पर प्यार आने लगा। उसके मन में रूपा के रूप को चखने की इच्छा तीव्र होती जा रही थी। वे रोज मिलने लगे। कभी शाहीन हौले से उसके शरीर पर फूल फिराता और उसकी धौंकनी बन गई सांसों और तेजी से उठते-गिरते वक्षस्थल को निहारता, तो कभी उंगलियों के पीछे के हिस्से से उसकी गर्दन छूकर उसकी शर्मोहया का आनंद लेता। उसकी भोली और रसीली बातें भी उसके रूप से कम सम्मोहक नहीं थीं।

धीरे-धीरे शाहीन को उसका साथ इतना अच्छा लगने लगा कि वे घंटों बातें करते या अठखेलियां करते रहते। “आप इन निरीह जानवरों को क्यों मारते हैं?” रूपा के इस सवाल पर शाहीन उसे समझाने की कोशिश करता कि ये जंगल कितना कीमती है और इसकी चीजें बेचकर उसने जो वैभव कमाया है, उससे वो उसे कितनी तरह के सुख दे सकता है।

लेकिन वो सबसे जुदा थी। शाहीन ने प्रलोभनों से उसे आकर्षित कर पाना असंभव पाया, तो एक दिन धैर्य खोकर उसे अपने बाहुपाश में बांध लिया और चुंबनों की बौछार शुरू कर दी।

रूपा ने एक झटके में खुद को छुड़ा लिया और ‘ये सब शादी के बाद’ कहकर किलकती हुई भाग गई।

शादी? नहीं, शाहीन के मन ने तो न बंधने की कसम खाई है। तो क्या जबरदस्ती या झूठ? सोचते हुए वो सो गया।

दूसरे दिन वो नहीं आई। शाहीन उसे ढूंढ़ने निकला पर ढूंढ़ न पाया। दिन बीतने के साथ शाहीन की तलब बढ़ती जा रही थी। सबसे बड़ी बात तो ये कि वो उसके शरीर ही नहीं, उसकी संगत को, उसकी बातों को भी याद कर रहा था। उसे पता चल गया था कि उसे प्यार हो गया है। न चाहते हुए भी उसका मन बंध गया है। वो रूपा के बिना नहीं जी सकता।

एक आह भरते हुए वह मन ही मन बुदबुदाया, ‘प्यार पर किसी का बस नहीं!’

फिर एक दिन दूर से ही वो दिखी, “अगर मुझसे शादी करना चाहते हो तो मेरे बाबा से मुझे मांगने आना। रास्ता ये जंगली फूल बता देंगे। इनकी कतार के साथ चलते आना।” कहकर तुरंत लौट गई।

सैकड़ों लड़कियों का दिल तोड़ने वाला शाहीन आज अपने दिल के हाथों मजबूर होकर रूपा के घर पहुंचा। बाहर से किसी आदिवासी का गरीबखाना नजर आने वाले उस घर के दरवाजे के अंदर घुसते ही वहां का नजारा साफ हो गया। वहां फॉरेस्ट रेंजर रूपसी सिन्हा सीआईडी की स्पेशल ब्रांच के ऑफिसर्स के साथ मौजूद थीं। जिन्हें वो आज तक रूपा समझता आया था।

उनकी आंखों में आज भोलापन नहीं वितृष्णा थी, “ईमानदार फॉरेस्ट रेंजर तीपेश सिन्हा याद हैं? जिनकी जानकारी में तुम्हारे काले कारनामे आ गए थे और जब तुम उन्हें खरीद न पाए तो उनकी हत्या करके अपने रास्ते से हटा दिया। अपने पैसों की ताकत से अपना कलंक भी उनके ही ऊपर मढ़ दिया। साबित कर दिया कि हाथियों को मारकर हाथीदांत बेचने वाले वही थे? मैं उनकी बेटी हूं। तुम्हारी करनी के सुबूत तुम्हारे द्वारा बताए गए ठिकानों पर तो मिल ही चुके हैं, मैं तुम्हारे कहे शब्दों को भी रिकॉर्ड करती रही हूं।” कहते हुए रूपा ने अपना बाजूबंद खोला जिसके नीचे माइक्रोफोन फिट था।

शाहीन फटी आंखों से अपनी रूपा के असली रूप को देखे जा रहा था। उसकी आंखों में आंसू थे। उसे खुद पता नहीं था कि ये आंसू प्यार में धोखा मिलने के हैं या अपनी करनी पर पछताने के। सैकड़ों निरीह जानवरों और इंसानों का शिकार करने वाला शिकारी आज खुद शिकार हो चुका था।

- भावना प्रकाश

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