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दोनों इस पसोपेश में कि पहल कौन करे:मेरा तेज दिमाग और तुम्हारा शरीर मिलकर धमाल मचाएंगे, है न मजेदार बात, उसने कहा

3 महीने पहले
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जब स्मृति ने विवेक से सवाल किया तो कुछ देर के लिए कार में सन्नाटा पसर गया। आज एमबीबीएस करने के बाद दोनों का पहला दिन था। विवेक के मन में जरा भी नहीं था कि वह स्मृति को नाराज करे। इसलिए उसने कहा क्या हम दोनों एक नहीं हो सकते, हम बिल्कुल एक हो सकते हैं। मेरा तेज दिमाग और तुम्हारा खूबसूरत शरीर ... मिलकर दोनों धमाल मचाएंगे... है ना मजेदार बात?

विवेक के इस जवाब पर स्मृति झल्लाई और पलट कर कहा, बच्चू, ऐसा तो आज तक मेडिकल साइंस में भी नहीं हो पाया। तुम यह सोचना भी छोड़ दो कि ऐसा कुछ हो सकता है। दोनों खिल-खिलाकर हंस पड़े। दोनों सोचने लगे कि इतने साल तक साथ रहे। पहली क्लास से लेकर अब तक वह एक-दूसरे को प्रपोज करने वाले थे, लेकिन दोनों ही इस पसोपेश में रहे, कि पहल कौन करे, विवेक और स्मृति के मन में भले ही उनके जाति और रंग अलग थे, लेकिन दोनों एक-दूसरे को जी-जान से प्यार करते थे।

तभी अचानक स्टीयरिंग घूम गई और कार डिवाइडर से जा टकराई स्पीड अधिक होने के कारण टक्कर इतनी जोर की थी कि कार के आगे के हिस्से के परखच्चे उड़ गए। डिवाइडर पर लगी लोहे की रॉड सीधी विवेक के बगल में बैठी स्मृति के सिर से जा लगी और स्मृति के सिर में गहरी चोट आई। वहीं, विवेक ड्राइविंग सीट से उछल कर सड़क पर जा गिरा और तेज रफ्तार से आ रही कार उसके शरीर को कुचल गई।

हॉस्पिटल में दोनों के परिजनों ने डॉक्टरों से दोनों को बचाने का अनुरोध किया। वे पैसों को पानी की तरह बहाने के लिए तैयार थे, बस उनके बच्चे की जान बचनी चाहिए।

अमेरिका से लौटे न्यूरो सर्जन डा. ज्योति प्रकाश समझ गए कि दोनों को बचाना बहुत मुश्किल है, फिर भी उन्होंने परिजनों को सांत्वना दी और ऑपरेशन थिएटर की ओर बढ़ गए। इधर, ओटी में मौजूद सहायक डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि दोनों की हालत बहुत नाजुक है। जहां स्मृति का दिमाग धीरे-धीरे काम करना बंद कर रहा है, वहीं विवेक के शरीर का कोई भी अंग सलामत नहीं बचा।

अपने 30 साल के अनुभव पर डा. ज्योति प्रकाश ने फैसला सुनाया दोनों को बचाना होगा। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम एक का दिमाग दूसरे के दिमाग से बदल दें। इससे एक शरीर तो बेजान हो जाएगा, लेकिन दूसरे शरीर में दोनों ही जिन्दा रहेंगे।

डा. ज्योति प्रकाश की बात सुनते ही ऑपरेशन थिएटर में सन्नाटा छा गया। उन्होंने तुरंत ऑपरेशन शुरू करने का निर्णय लिया और टीम काम में जुट गई। मेडिकल साइंस में यह एक अजूबा था। आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ। ऑपरेशन खत्म होने तक किसी को भी अनुमान नहीं था कि इसका परिणाम क्या होगा, लेकिन हर कोई जी-जान से जुटा था। सात घंटे के अथक परिश्रम के बाद डॉ. ज्योति प्रकाश ऑपरेशन थिएटर से बाहर आए और उन्होंने परिजनों से कहा ऑपरेशन तो हो गया है, लेकिन अभी कुछ कह नहीं सकते हैं। आप करीब सात दिन बाद ही उन्हें देख पाएंगे और उनसे मिल पाएंगे।

वह परिजनों से ऑपरेशन थिएटर की अंदर की कहानी छुपा गए। लेकिन जब सात दिन बाद दोनों के परिजन अंदर गए, तो उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई, क्योंकि वहां उन्हें सिर्फ स्मृति ही नजर आई।

डा. ज्योति प्रकाश ने एक-एक कर दोनों के परिवार वालों के सवालों का जवाब दिया। विवेक का दिमाग निकालने के बाद मृत शरीर शवगृह में रखवा दिया। उसका दिमाग स्मृति के शरीर में प्रत्यारोपित कर दिया। क्योंकि स्मृति का दिमाग काम करना बंद कर चुका था।

स्मृति ने अपने सामने इतने लोगों को देखा तो एक पल को वह होश खो बैठी। कुछ सामान्य हुई तो दोनों परिवारों को एक झटका और लगा। स्मृति ने "अपने" परिजनों की ओर नहीं देखा बल्कि विवेक के परिजनों से बात करने की कोशिश की,चूंकि स्मृति के शरीर में दिमाग विवेक का था। विवेक के दिमाग ने स्मृति के परिजनों को पहचानने से इनकार कर दिया और वह "अपने" परिजनों से बात करने लगा।

जब विवेक के परिजनों ने देखा कि लड़की उनसे बात कर रही है, जबकि उनका बेटा मृत शरीर के रूप में शवगृह में पड़ा है, तो वे लड़की के रूप में अपने बेटे को अपना नहीं पाए। आज इस घटना को करीब सात साल हो गए। परिवार के नकारे जाने और अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद स्मृति ने एक कमरा किराए पर ले लिया। शरीर में दिमाग विवेक का था, इसलिए शरीर में कई प्रकार के बदलाव आ गए।

जब एक लड़की अकेले रहती है, तो लोग उसके चरित्र पर सवाल उठाते हैं। कोई यह नहीं समझ पाया कि स्मृति का शरीर क्या भोग रहा है और विवेक का दिमाग किन परिस्थितियों से गुजर रहा है। विवेक का दिमाग जब भी कोई निर्देश स्मृति के शरीर को देता तो वह सहज करने को तैयार रहता, लेकिन पुरुष का दिमाग स्त्री के शरीर को समझ ही नहीं पाया और न ही स्त्री के शरीर ने पुरुष के दिमाग को। इसलिए शरीर उस निर्देश को क्रियान्वित तो करता लेकिन वह अजीबोगरीब में ।

बहुत कठिन हो गया बढ़ती हुई उम्र का सामना करना। अब स्मृति की उम्र बढ़ती ही जा रही थी। विवेक के दिमाग से कई शारीरिक परिवर्तन भी अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे। लेकिन व्यावहारिक स्तर पर शरीर को बहुत कष्ट भोगने पड़ रहे थे। इस बात का एहसास विवेक के दिमाग को भी होने लगा।

फिर एक दिन विवेक के दिमाग ने निर्णय लिया कि वह अब स्मृति के शरीर को और कष्ट नहीं देगा और उसे मुक्त कर देगा। अपने अंतिम पत्र में उसने लिखा कि मेरे मरने के बाद शरीर को जला दिया जाए, ताकि हम दोनों को मुक्ति मिल सके। यह महज संयोग था, हम दोनों एक-दूसरे के लिए एक होना चाहते थे, लेकिन एक नहीं हो पाए। इसलिए अब दोनों ही मुक्त होना चाहते हैं। स्मृति ने पिस्तौल से अपने दिमाग में गोली मार कर आत्महत्या कर ली।

- ब्रजेश कुमार मिश्रा

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