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E-इश्क:कॉलेज की कटिंग चाय जिंदगी में इतनी मिठास घोल देगी, इतना प्यारा रिश्ता जोड़ देगी, सोचा न था

4 महीने पहले
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मयंक का मैसेज देख चाय का स्वाद और बढ़ गया। लिखा था, ‘खुश हो जाओ, तुम्हारे मन की करने जा रहा हूं।’

अगले मैसेज में उसने शादी का कार्ड भेजते हुए लिखा, ‘शादी में पहुंच जाना, मेरा कत्ल होते देख सबसे ज्यादा खुशी मेरी मां और तुम्हें ही होगी।’

मैंने जवाब में स्माइली और जादू की झप्पी वाली इमोजी भेजते हुए लिखा, ‘अब तुमसे कोई शिकायत नहीं मयंक, दिल खुश कर दिया सुबह-सुबह।’

‘पति देव के साथ पहुंच जाना शादी में, मैं कन्या न सही, लेकिन मेरा ‘दान’ तुम्हीं करोगी आकर।’

मयंक की इसी साफगोही और मासूमियत पर मर मिटी थी मैं। आज भी ऐसा कोई दिन नहीं बीतता जब चाय की चुस्की के साथ उसकी याद न आए। चाय की लत मयंक ने ही लगाई थी मुझे। बिल्कुल अलग मिजाज थे हम दोनों के, फिर भी न जाने उसमें ऐसी क्या बात थी कि मुझे उसका साथ अच्छा लगने लगा था। एक ही कॉलेज, एक ही क्लास में होते हुए भी हमारा ग्रुप अलग था। वो ऐसे ग्रुप का हिस्सा था, जिसका पढ़ाई से कोई लेनादेना नहीं था और मेरा ग्रुप किताबी कीड़ों के नाम से मशहूर था।

एक दिन मैं कॉलेज की कैंटीन में अपनी फ्रेंड का इंतजार कर रही थी और मयंक का ग्रुप हमेशा की तरह कैंटीन में महफिल जमाए बैठा था। तभी मेरे कानों में निदा फाजली का शेर गूंजा,

एक महफिल में कई महफिलें होती हैं शरीक

जिसको भी पास से देखोगे अकेला होगा

शेर सुनते ही उसके दोस्त हंसने लगे। मैं जानती थी, ये शेर सुनाकर मुझ पर तंज कसा जा रहा है, फिर भी न जाने क्यों मुझे उसकी आवाज में दर्द झलकता महसूस हुआ। मैं उसके बारे में जानने को उत्सुक हो गई। मेरी फ्रेंड को आने में अभी वक्त था इसलिए मैंने सोचा, कुछ देर के लिए ही सही इस ‘बदमाश कंपनी’ को ज्वॉइन कर लेती हूं।

मैंने तुरंत उस शेर की तारीफ करते हुए कहा, “वाह! मयंक, तुम्हारा शायरी का अंदाज तो बड़ा शानदार है।”

उसने अपनी उसी लापरवाही से कहा, “आपको पसंद आया, तो मेरा दिन बन गया मैडम। इसी बात पर हमारे साथ एक कटिंग चाय पी लीजिए।”

“सॉरी, मैं चाय नहीं पीती।”

“जिसे चाय से प्यार नहीं, उसे शायरी से प्यार करने का कोई हक नहीं,” मयंक ने मुझ पर ताना कसा।

मैंने भी दिल की भड़ास निकाल दी, “जिसे किताबों से प्यार नहीं, उसे शायरी से प्यार करने का कोई हक नहीं।”

“शायरी किताबें नहीं जिंदगी सिखाती है मैडम।”

बात तो उसकी सही थी, जब मुझे कोई जवाब नहीं सूझा तो मैंने खीझते हुए कहा, “मेरा नाम मैडम नहीं, सुरीली है। चलो, आज तुम्हारी शायरी के नाम पर चाय का चीयर्स कर लेती हूं।” मेरे जवाब पर सब तालियां बजाकर हंसने लगे।

उस दिन मयंक के ग्रुप के साथ चाय पीकर इतना अच्छा लगा कि घर आकर मैंने मां से भी चाय पीने की फरमाइश कर दी। मां को मेरा बदला हुआ अंदाज अजीब लगा, लेकिन मैंने तुरंत सर्दी का बहाना बनाकर अदरक वाली चाय के फायदे गिना दिए।

मुझे मयंक का साथ अच्छा लगने लगा था। मैं रोज उसके ग्रुप के साथ गपियाते हुए कैंटीन की चाय पीने लगी। लेकिन मैंने महसूस किया कि मयंक को मेरा उस ग्रुप के साथ बैठना अच्छा नहीं लग रहा था।

एक दिन घर लौटते समय उसने मुझे रोककर कहा, “तुमसे कुछ जरूरी बात करनी है।”

मैंने सोचा, वो कहेगा कि उसे भी मेरा साथ अच्छा लग रहा है, लेकिन मयंक ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा।

“देखो सुरीली, तुम एक होनहार स्टूडेंट हो, तुम्हें इस तरह कैंटीन में बैठकर वक्त बर्बाद नहीं करना चाहिए।”

अब मुझे उस पर गुस्सा आने लगा था। मैंने भी तपाक से जवाब दिया, “तुम्हें भी अपने भविष्य के बारे में सोचना चाहिए, तुम क्यों बैठे रहते हो वहां? तुम्हारी मां को तुमसे कितनी उम्मीदें होंगी, तुम्हें उनका ख्याल क्यों नहीं आता?”

मयंक हैरानी से मुझे देखने लगा, “क्या जानती हो मेरे बारे में?”

“सबकुछ।”

“तो तुम मेरी जासूसी करने लगी हो?”

“नहीं, तुमसे प्यार करने लगी हूं।”

“लेकिन मैं तुमसे प्यार नहीं करता।”

“मैंने कब कहा तुमसे कि तुम भी मुझसे प्यार करो?”

“मैं अपनी मां के सिवाय किसी से प्यार नहीं करता, किसी पर विश्वास नहीं करता।”

“तो क्या ऐसे ही जिंदगी गुजारोगे? मां के विश्वास पर कौन-सा खरे उतर रहे हो। कम से कम खुद से तो झूठ बोलना बंद करो मयंक।”

“जिसकी जिंदगी खुद एक बड़ा झूठ बन गई हो, वो क्या झूठ बोलेगा!” मयंक के दिल में छुपा दर्द फिर से छलक आया।

मयंक के पापा का एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर चल रहा था और वे उसी महिला के साथ रहते थे। उसके पावरफुल पापा मयंक और उसकी मां को किसी चीज की कमी नहीं होने देते थे। उनके पास मां-बेटे को देने के लिए सबकुछ था, नहीं था तो समय और प्यार। मयंक को ये बात इतनी चुभती कि उसके अंदर पूरी दुनिया के लिए नफरत भर गई थी। उसे लगने लगा था कि अच्छे लोगों के साथ बुरा ही होता है। इसलिए, अच्छा बनकर कुछ हासिल होने वाला नहीं। मां उसके मन की हालत को समझती थीं। लेकिन, बेटे के लिए कुछ नहीं कर पा रही थीं।

उसकी मां की तरह मैं भी उसे अन्य लड़कों की तरह हंसता-खेलता देखना चाहती थी, लेकिन मयंक बदलने का नाम नहीं ले रहा था। मैं जानती थी कि उसे भी मेरा साथ अच्छा लगता है, लेकिन उसके दिल की बात कभी उसकी जुबान पर नहीं आई और मुझे यही बात चुभती थी।

मयंक के साथ रहकर मैंने उसे पढ़ाई और करिअर को लेकर तो सीरियस बना दिया, लेकिन वो मुझे लेकर कभी सीरियस नहीं हो पाया। मुझे अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाने से वो डरता था। इसलिए, अपनी कसम देकर उसने मुझे पापा की मर्जी से शादी करने के लिए मजबूर कर दिया।

अपनी शादी के दिन मैंने भी उससे वादा लिया कि अब मैं उससे तब मिलूंगी, जब वो शादी कर लेगा।

आज मयंक एक कामयाब चार्टर्ड अकाउंटेंट है। उसके पापा भी घर लौट आए हैं। और अब मयंक की शादी की खुशखबरी! ऐसा लग रहा है कि जिंदगी की हर मुराद पूरी हो गई। सोचा न था कि कॉलेज की कटिंग चाय जिंदगी में इतनी मिठास घोल देगी, इतना प्यारा रिश्ता जोड़ देगी। मयंक और चाय आज भी ये दोनों मेरे चेहरे पर मुस्कान ला देते हैं।

- कमला बडोनी

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