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E-इश्क:प्यार कोई धूप थोड़े ही है जो सांझ हुए ढल जाए, एक साथी की जरूरत इस उम्र में सबसे ज्यादा होती है

4 महीने पहले
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“क्या? तूने भी अविनाश नाम के हजार छान डाले? किसी सोशल प्लेटफार्म पर एकाउंट नहीं मिला? भाई कोई तो तरीका होगा उन्हें ढूंढ़ने का। अब…” मैं मायूसी से बात करते हुए पलटी तो मम्मी को सामने देखकर चोरों सी सकपका गई। लेकिन मम्मी अपने चिर-परिचित ममतामई अंदाज में मुस्कुराईं, “अविनाश जी से कुछ काम था तो मुझे बताया होता। ये ले,” कहते हुए मम्मी अपने मोबाइल में वो नंबर निकालकर देकर चली गईं, जो ‘इमरजेंसी’ के नाम से सेव था।

धड़कते दिल से फोन मिलाया तो पहली ही घंटी में उठ गया। “शांभवी! ठीक है, मैंने नाम नोट कर लिया है। जगेंगे तो बता दूंगी। अगर कोई काम है तो आप मुझे भी बता सकती हैं मैं उनकी…”

“किसका फोन है?” तभी उधर से आवाज आई और मेरा नाम सुनते ही शायद लपककर फोन ले लिया गया।

मन में लाखों तूफान लिए कार अंकल के घर की ओर दौड़ रही थी। भाई और मेरे बीच पसरे सन्नाटे में निराशा और दुख की लहरों का कितना शोर था, हम ही जानते थे। क्या हमारे बचपने के कारण एक पावन प्रेम हमेशा के लिए बिछड़ चुका है? सिर्फ बचपने नहीं, उपेक्षा के कारण भी। अब सूझी है ये बात जब जीवन साथी का सुख भोगते इतना समय हो चुका है। समझदार होने से अब तक, नौकरी से लेकर गृहस्थी में सेटल होने तक कितने साल बीत गए... अविनाश अंकल की अच्छी यादों के मन को मथते हुए।

सोसायटी का छोटा सा फ्लैट। अपना बड़ा सा बंगला छोड़कर उस ‘पिंजरे’ में शिफ्ट हुए दो थके और टूटे बच्चे। गले की फांस की तरह चुभती अदालत की यादों से व्यथित ‘हम दोनों के साथ रहना चाहते हैं’ ‘ऐसा नहीं हो सकता बच्चे’ तभी पीछे से एक व्यक्ति दोनों के कंधों पर दोनों हाथ रख देता है। उसकी आंखों में अतुलित स्नेह है और हाथों में चॉकलेट। वो अजनबी तब तक हमसे बात करता रहता है, जब तक हमें हंसा नहीं देता। मम्मी उसे बिदा करने दरवाजे तक आई हैं। उनकी पलकें अब भी नम हैं। लगता है भरपूर रोई हैं। वो कहता है ‘किसी भी तरह की कोई भी जरूरत हो तो बताना जरूर’ और मम्मी के होंठों पर एक तृप्त सी मुस्कान आ जाती है।

वो व्यक्ति हमारी हर समस्या का समाधान बन जाता है। इतने बड़े नहीं थे हम कि उस नजर को समझ सकें जो मम्मी के होंठों पर एक मुस्कान देखने को तरसती रहती थीं। जिसकी व्याकुलता मां की अक्सर नम हो गई पलकों से समुद्र के ज्वार सी चढ़ती जाती थी।

मम्मी के बिजनेस सेटअप के लिए की गई भागदौड़ हो या हमारे स्कूल एडमिशन के लिए। रोजाना की हजारों व्यावहारिक समस्याओं के लिए एक ही नाम रहा अविनाश।

पापा को अदालत ने महीने में एक दिन हमें साथ ले जाने की इजाजत दी थी। हम इंतजार करते, पर पता चलता पापा यूरोप चले गए हैं। अंकल आते और हमें घुमाने ले जाते। उसी दिन हम मम्मी को हंसते देखते। बहुत अच्छा लगता। हम सोचने लगते मम्मी पहली बार हंसी हैं क्या। शायद मम्मी को भी हमारी तरह घूमना पसंद है। घूमने जाते भी तो पहली बार देखा है न उन्हें।

पापा साल भर बाद लौटकर आते और हमें अपने घर ले जाते। हमारे लिए खरीदे गए कीमती खिलौनों और ढेर सारे प्लास्टिकी लाड़ की चकाचौंध में हम एक साल की नाराजगी कैसे भूल जाते, आज इस बात का आश्चर्य होता है कि कैसे उन्होंने एक दिन में हमारे दिल के बहुत करीब पहुंचे अविनाश अंकल के लिए नफरत के बीज बो दिए।

तभी मम्मी को डेंगू हो जाता है। कैसे बेहोश मम्मी को बांहों में उठाए अविनाश अंकल अस्तपाल-दर-अस्पताल प्लेटलेट्स और बेड के इंतजाम में दौड़ते रहते हैं। हमारी देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ते और कैसे पापा को इस घटना से हमारी नफरत में खाद पानी डालने का बहाना मिल जाता है। हम अविनाश अंकल के घर आने पर अपनी नाराजगी साफ जाहिर करने लगते हैं।

और वो दिन जब भाई बुखार से तड़पता है। डॉक्टर घर आकर चेकअप कर जाता है, लेकिन अविनाश अंकल दरवाजे पर खड़े होकर सब इंतजाम कर देते हैं। दवाइयां भी दरवाजे से ही देकर चले जाते हैं। उस सुबह बॉलकनी पर आकर देखती हूं कि अविनाश अंकल सामने वाले पार्क की बेंच पर शाल ओढ़े सो रहे हैं। मम्मी को बताती हूं, मम्मी उन्हें फोन करके भाई का हाल बताती हैं और वो चले जाते हैं।

वो दिन जब नानी को मम्मी से लिपटकर रोते सुना, "हमारी गलती की सजा तू इतने साल भुगतती रही। हम नहीं पहचान पाए अविनाश जैसे हीरे को और उस मक्कार अय्याश को। हमने उसके पल्ले बांधा था तुझे और अब हम ही भूल सुधारेंगे। अविनाश से बात की है मैंने। वो... " हम भड़क जाते हैं। पापा ने हमारे दिमाग में डाल दिया है कि यदि अविनाश अंकल को बीच से हटा दिया जाए तो अब भी हम सब एक साथ...

उनका वो सौम्य चेहरा आज भी मन पर छपा है जब उन्हें अंतिम बार देखा-सुना था, “ठीक है, मैं वादा कर सकता हूं कि तुम्हारी मम्मी से बिना मतलब न मिलूंगा न बात करूंगा। अगर एक वादा तुम लोग भी करो। किसी भी मुश्किल में होने पर या कोई ऐसा काम आने पर जो तुमसे न संभले, तुम मुझे अपनी मम्मी से मिलने से नहीं रोकोगे।” हम तुरंत हाथ बढ़ा देते हैं। मन में भरोसा है कि ऐसा समय आएगा ही नहीं। पापा जो साथ होंगे।

धीरे-धीरे हम बड़े हो गए, सब समझने लगे। पापा के फरेब, दुनिया की कड़वी सच्चाइयां और अविनाश अंकल का प्यार...

उनके घर पहुंचकर धड़कते दिल से अंदर घुसे। जिन आंटी ने फोन पर बात की थी वो हमारा मनपसंद नाश्ता सजाए बैठी मिलीं। पर हम अंकल से मिलने को उतावले थे। वो हमें उनके कमरे में ले जाती हैं। वो बिस्तर पर हैं। पांव में प्लाटर है। “बोलो बच्चे,” उनके चेहरे पर वही ममतामई मुस्कान है। हमें इतने सालों बाद देखने की खुशी उनकी आंखों से छलक रही है और हम अपने अपराधबोध के बीच खामोश हैं। कैसे पूछें? तभी उन आंटी की आवाज सुनाई देती है, "सर, मेरा जाने का टाइम हो गया है और गौरव आ गया है। मैं जाऊं?” अंकल हां में सिर हिला देते हैं और हम खुशी से उछल पड़ते हैं।

मम्मी और अंकल को आमने-सामने बिठाकर हम बच्चों की तरह बिलखे जा रहे हैं और अपनी बात कहे जा रहे हैं। "प्लीज, हमारी बात मान लीजिए। हमें माफ कर दीजिए, हम आपको पहचान न सके। हमारी वजह से आपकी उम्र के खूबसूरत साल..."

"ऐसा नहीं कहते, प्यार कोई धूप थोड़े ही है जो सांझ हुए ढल जाए। ये तो प्राणवायु है जो हमारे मन में स्पंदन बनकर रहती है। यकीन मानो, एक साथी की जरूरत इस उम्र में सबसे ज्यादा होती है," अंकल हमें सांत्वना देते हैं।

कमरे से बाहर निकलकर भी मन नहीं माना। एक-दूसरे की आंखों में पूरा युग पढ़ते, धीरे-धीरे एक दूसरे के आंसू पोंछते, फिर गले लगकर आंसुओं में पूरी उम्र की वेदना धोते युगल को देखकर हम देर तक खुशी से पलकें भिगोते रहे।

- भावना प्रकाश

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