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E-इश्क:उन स्क्रीनशॉट्स में पापा की किसी दूसरी महिला से सेक्स चैट के मैसेज और ढेरों बातें थीं, पापा की बेवफाई का सच मां के सामने खुल चुका था

2 महीने पहले
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नीला, पीला, हरा, गुलाबी... रंगों से भरा ब्रश मुझे कैनवास पर कुछ न कुछ उकेरने को मजबूर कर देता था, क्योंकि रंगों से बेहद मोहब्बत थी मुझे। अपने से लगने वाले यही रंग अब क्यों बेगाने से हो चले हैं...? और अब मैं इस बात को भी लिखने बैठी हूं। जबकि शब्दों की दुनिया मेरे लिए अनचीन्ही सी रही है। मुझे तो हमेशा से रंगों की भाषा समझ आती है। लेकिन इस कहानी को कहने के लिए मुझे शब्दों का ही सहारा लेना पड़ा।

एक वीकेंड पर जब मैं अपनी अलमारी अरेंज कर रही थी, तब मुझे मेरी मां का एक पुराना बैग मिला। बैग में उनकी सीक्रेट डायरी थी। लैदर बैग पूरी तरह खराब हो चुका था। सोचा कूड़े के हवाले करने से पहले एक बार बैग चेक कर लूं। जैसे मां वॉशिंग मशीन में कपड़े डालने से पहले सभी कपड़ों की जेब चेक किया करती। मैंने बैग की एक जिप खोली तो उसमें पुराने सिक्के मिले। दूसरे पॉकेट में कुछ विजिटिंग कार्ड थे, जिन पर लिखे फोन नंबरों के दस डिजिट भी पूरे नहीं बचे थे। अंदर की आखिरी पॉकेट में हाथ डाला ही था कि उनकी सीक्रेट डायरी हाथ में आ गई। डायरी के सभी पीले पड़ चुके पन्नों की स्याही लगभग मिट गई थी। कुछेक की लिखावट पढ़ी जा सकती थी और कुछ पन्ने अधूरे लिखे भी थे।

डायरी के कवर पर एक ई-मेल आईडी और उसके ठीक नीचे उसका पासवर्ड भी लिखा था। पासवर्ड इसलिए पहचान सकती हूं, क्योंकि उनके सारे पासवर्ड पापा के नाम या उनके सरनेम के इर्द-गिर्द ही घूमते। इस बात से आजिज़ आकर मुझे कई बार गुस्सा भी आता कि पापा के लिए मां की कभी उतनी अहमियत नहीं रही, जितनी मां से उनको मिलती रही। क्यों वह पापा की जली-कटी सुनकर भी उनसे बात करने को आतुर रहतीं? और मेरे गुस्सा करने पर वह मुझे ये कहकर चुप करा देती कि तुम पापा के लिए एक लफ्ज भी नहीं कहोगी।

उस ई-मेल आईडी को मैंने अपने लैपटॉप पर खोला। मेल के इनबॉक्स में मां ने अपनी एक दूसरी ई-मेल आईडी से खुद को कई ई-मेल्स भेज रखे थे। उन सभी ई-मेल्स में मोबाइल के कुछ स्क्रीनशॉट्स थे। उन स्क्रीनशॉट्स में पापा की किसी दूसरी महिला से सेक्स चैट के मैसेज और ढेरों बातें थीं। पापा की बेवफाई का सच मेरी मां के सामने खुल चुका था। साफ था कि पापा मेरी मां को धोखा दे रहे थे। मैंने एक-दो स्क्रीनशॉट पढ़ने के बाद उन सभी मैसेज को इग्नोर किया और फिर मां के ड्राफ्ट मैसेज पर नजरें घुमाईं, उन्हें पढ़कर मेरी आंखें डबडबा गईं।

मेरी मां, ड्राफ्ट मैसेज में उस धुंधली पड़ चुकी स्याह डायरी के अधूरे पन्नों को पूरा कर रही थी। मां ने उसकी सब्जेक्ट लाइन दी थी, 'वो काली रातें..'। उन सभी ड्राफ्ट मैसेज को मैंने अपनी ई-मेल आईडी पर सेव कर लिया। मां के लिखने के हुनर को पहचान देने और उनके दर्द को बाहर लाने के लिए मैंने वो सभी ड्राफ्ट मैसेज जमा करके उन्हें एक किताब की शक्ल दी और छपने भेज दिया। मां के दर्द की कहानी दुनिया के सामने लाना मुझे अपना फर्ज लगा। क्योंकि यह कहानी सिर्फ मेरी मां की ही नहीं, उनकी जैसी जिंदगी जी रही हजारों औरतों की है, जो न जाने क्यों खुद से झूठ बोलती हैं और परिवार या समाज न जाने किसके लिए चुप रहती हैं। सब सहते हुए भी किसी ऐसे इंसान पर अपना जीवन न्योछावर कर देती हैं, जिसे अपने साथ सांस लेने वाले रिश्ते की फीलिंग्स की कोई क्रद नहीं होती। उन ड्राफ्ट मैसेज से ही पता चला कि मां गंभीर डिप्रेशन के दर्द से हर रात खुद से जूझती थी और शायद इसी दर्द ने उनकी...। खैर, आज, इस मौके पर लगभग सभी हाथों में मेरी मां की किताब की हस्ताक्षरित प्रति थी। देहरादून के प्रतिष्ठित बुक स्टोर में मैंने उनके उपन्यास का रीडिंग सेशन रखा था। सोशल डिस्टेंसिंग की तमाम हिदायतों के बावजूद इस उपन्यास के आकर्षण में डूबी युवा पीढ़ी खिंची चली आई थी।

अपना रीडिंग ग्लास उतारते हुए मैंने किताब बंद कर मेज की एक तरफ रख दी। मेरी नजर अनायास ही टेबल पर रखी अपनी मां की तस्वीर पर चली गई, जिसमें वो तमाम तकलीफों को छिपाए अपने होठों पर एक उदास सी हंसी ओढ़े दिख रही थी। मैं श्रोताओं की ओर देखकर मुस्कुराने लगी। वहां मौजूद लोगों के बीच बस एक महिला ही थी जो मेरी आंखों की कोरों पर अटकी कुछ बूंदों के बाहर निकलने की बेताबी देख सकती थीं। तालियों की गड़गड़ाहट के बीच मेरी सर्द निगाह उस महिला पर टिकी हुई थी। मैंने आंसू छुपाने की नाकाम कोशिश करते हुए सिर उठाया और बाकी लोगों की ओर देखा। शॉल और स्कार्फ से चेहरा छुपाए वो महिला हॉल से जा चुकी थी। कुछ पलों बाद मेरे मोबाइल पर एक मैसेज फ्लैश हुआ- ‘मैं चाहकर भी तुम्हारा दर्द हल्का नहीं कर सकती। कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जिनका कोई हमदर्द नहीं होता। मैसेज पापा की नई वाइफ के नंबर से था।

- गीतांजलि

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