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E-इश्क:नमस्ते के आदान-प्रदान के तुरन्त बाद उसने नश्तर सा अपना सवाल दाग दिया, “यह लड़की कहां मिली आपको?”

2 महीने पहले
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कहानी जो आपको सुनाने जा रही हूं वह सन् 1957 की है। पुस्तकालय विज्ञान की छात्रा शुभ्रा की थ्योरी क्लासेज़ लगभग समाप्त हो चुकी थीं और टीचर्स ने पूरी क्लास को ग्रुप्स में बांट कर शहर के अलग-अलग पुस्तकालयों में प्रैक्टिकल ट्रेनिंग के लिए भेज दिया था। अपनी प्रिय सखियों को अपने ही ग्रुप में पाकर वह बहुत ही ख़ुश थी। इन्हें सचिवालय के पुस्तकालय में काम करना था। कक्षा के लिए शुभ्रा साइकिल से जाती थी किन्तु सचिवालय घर से बहुत दूर होने के कारण सहेलियों के साथ वह बस से जाने लगी। दो बसें बदलनी पड़तीं वहां पहुंचने के लिए। शुभ्रा सबसे पहले स्टाॅप से चढ़ती और लौटते समय सबसे बाद में बस से उतरती।

एक दिन उसकी सहेलियों ने नोटिस किया कि 28-30 की आयु का एक छरहरा सा आकर्षक व्यक्ति शुभ्रा के पीछे-पीछे बस में चढ़ा और निरन्तर उसे घूरे जा रहा था। बीच में दूसरी बस बदलने पर उसमें भी वह आ गया। स्मिता ने उसके कान में फुसफुसाया, “वह तेरा पीछा कर रहा है। मैंने कल भी उसे अपनी बस में देखा था। तू पीछे मुड़ कर मत देखना अगर वह बीच में उतर जाता है तो मैं तुझे बता दूंगी।” किन्तु ऐसा कुछ हुआ नहीं। अपना-अपना स्टाॅप आने पर सब सहेलियां उतर गईं। उतरते हुए श्वेता ने उसे सजग किया, “अपना ध्यान रखना। वह अब भी अजीब नज़रों से तुझे घूर रहा है।”

घबराहट के कारण शुभ्रा की रगों में ख़ून जमने सा लगा। माथे पर पसीने की बूंदें छलक उठीं। वह दम साधे सिर झुकाए बैठी रही। ठसाठस भरी बस अन्तिम स्टाॅप आते तक लगभग आधी खाली हो चुकी थी। उतर कर वह तेज़ क़दमों से घर की तरफ़ बढ़ चली। किसी की पदचाप निकट आई और बहुत प्यार भरे लहजे में कहा, “सुनिए, रुकिए ना। आज आप इतना डर क्यों रही हैं मुझसे?”

शुभ्रा को काटो तो ख़ून नहीं। उसके पैरों में पंख लग गए। हांफती हुई घर में घुसी और भड़ाक से दरवाज़ा बन्द कर सांकल लगा ली। एक पल में मां को झिंझोड़ते हुए बोली, “मम्मा एक आदमी मेरा पीछा कर रहा है।” मां ने शान्त भाव से पूछा, “दरवाज़ा बन्द कर लिया ना? फिर क्यों डर रही है? जाओ पहले पानी पियो जाकर।” हे भगवान किस मुसीबत में फंस गई वह! मां ने फिर सवाल किया, “तुम जानती हो उसे?”

“नहीं”

“अरे, छिछोरे होते हैं ऐसे लोग। ज़रा अच्छी सूरत देखी लगे पीछा करने।”

उसे ज़रा दम में दम आया ही था कि दरवाज़े की घंटी बजी। “देख तो बाहर कौन है?” मां बोली। दहशत भरी उसने दरवाज़े के बजाए खिड़की से झांका। वही आदमी था। बेतहाशा भाग कर मां के पास आई, “वह आ गया यहां भी।”

“वह कौन?”

“अरे वही आदमी जो मेरा पीछा कर रहा है।” इत्तफ़ाक़ से भाई और पापा घर पर ही थे। मां ने दरवाज़े पर जा कर भाई से देखने को कहा।

बड़ी शाइस्तगी से आने वाले ने पूछा, “आपके वालिद साहब घर पर हैं? मैं उनसे मिलना चाहता हूं।” भाई ने इज़्ज़त से उसे ड्राइंग रूम में बिठाया और पापा को बुला लिया। नमस्ते के आदान-प्रदान के तुरन्त बाद उसने नश्तर सा अपना सवाल दाग दिया, “यह लड़की कहां मिली आपको?”

हैरान पापा बोले, “कौन सी लड़की?”

“वही जो अभी-अभी आपके घर के अन्दर गई है।”

“मिली से आपका क्या मतलब? वह मेरी बेटी शुभ्रा है।”

“जी नहीं, वह मेरी मंगेतर रेहाना है। हमारी सगाई हो चुकी है। आज़ादी के दंगे भड़के और उनका पूरा कुनबा न जाने कहां गुम हो गया? मैं रेहाना से बेपनाह मोहब्बत करता हूं। जी नहीं सकूंगा उसके बिना।” कहते हुए वह भलामानुस पापा के सामने घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गया। पापा ने उठा कर उसे सोफ़े पर बैठाया और भाई से चाय लाने को कहा। वे उस अजनबी, जिसने अभी तक अपना नाम पूछने का मौक़ा भी नहीं दिया था, को समझाने लगे, “नादानी की बातें मत कीजिए। यह मेरी बेटी है और हो सकता है कि आपकी मंगेतर रेहाना इसकी हमशक्ल हो।”

चाय पी कर आंसू भरी आंखों से वह बिदा हुआ। ओह! कैसे दूसरे मुल्क से छिपते-छिपाते यहां अपने प्यार को खोजता फिर रहा है यह शख़्स? हम सब सकते में एक दूसरे का मुंह ताक रहे थे। भाई ने मेरी छेड़ बना ली, दरवाज़े की घंटी बजते ही कहता, “आ गया तुझे लेने तेरा मंगतेर।”

पापा सुनकर अपने लिखे शेर का एक मिसरा पढ़ देते, “यह ग़ायबाना इश्क़ अज़ल से मिला मुझे।”

*ग़ायबाना इश्क (अमूर्त प्रेम)

- रत्ना कौल

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