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E-इश्क:मैं आगे बढ़ा और उसके बिल्कुल करीब पहुंच गया, उसके जिस्म की भीनी खुशबू मेरी रग-रग में भर रही थी

4 महीने पहले
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“अब आज से अपनी कॉफी खुद बनाओ। 6 महीने से बना रही हूं, अब आगे मुझसे उम्मीद मत रखना।”

रूही ने कॉफी मग उठाते हुए कहा तो मैंने कुछ रिएक्ट नहीं किया। ऐसी धमकियां वो अक्सर दिया करती थी। मेरा तो पूरा ध्यान मोबाइल स्क्रीन पर था। बॉस ने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया था। वो मेरे काम से खुश नहीं थे इसलिए मेरा मूड खराब हो रहा था।

अब इधर रूही बेवजह शुरू हो गयी थी।

“तुम सुन रहे हो ना?”

मेरी खामोशी पर वो फिर से बोल उठी।

मैंने चिढ़ कर कहा, “सुबह-सुबह क्यों माहौल खराब कर रही हो? क्या कर दिया मैंने?”

मेरी बात सुनते ही किचन में जाती हुई रूही पलट आई बोली, “तुमने कुछ नहीं किया। किया तो मैंने, 20 मिनट लगा कर कॉफी बनाई, फेंटते-फेंटते हाथ दुखने लगे, लेकिन! नहीं, तुम कुछ नहीं बोलोगे। अपनी बीवी के लिए तारीफ का एक लफ्ज...”

“हद है! तुम देख रही थी न मैं जरूरी बात कर रहा था। और ये हर रोज सुबह शाम तारीफ कौन करता है यार?”

मैंने उसकी बात काटते हुए अपनी बात रखी, और यहीं गुनाह हो गया। रूही की चलती हुई गाड़ी के आगे कोई बैरियर आ जाए, ये हो नहीं सकता। वो दुगुने जोश से लड़ने के मूड में आ गई।

“सुबह शाम? कितने झूठे हो तुम। जाकर देखो नए शादीशुदा जोड़ों को। दूर न जाओ मेरे भैया को ही देख लो, भाभी से कितना प्यार करते हैं वो। उनकी छोटी-छोटी बातों को सराहते हैं।” रूही ने मुझे घूरती नजरों से देखते हुए कहा।

“हां तो करते होंगे, क्यूंकि वो तुम्हारे भाई हैं, तुम्हारे जितना ही वो भी लविंग हैं।” मैंने जल्दी से ताना मारा।

“और वैसे भी तुम्हारी भाभी हर वक्त लड़ती नहीं होंगी।” कहते हुए मैं फटाफट तौलिया उठाये बाथरूम में घुस गया। अब रूही अकेले बोल रही होगी, सोचते हुए मैं हंस पड़ा।

मेरी और रूही की शादी को 6 महीने हो गए थे। शादी में बड़ी मुश्किल से १२ दिन की छुट्टी मिली थी। तेरहवें दिन मुझे अपनी रोजी रोटी वाले शहर में वापस आना था। मैंने सोचा था रूही कुछ दिन मां के पास रहेगी, फिर दो-चार महीने बाद उसे साथ ले आऊंगा। लेकिन वापसी के सफर में मां ने बाकी चीजों के साथ रूही की उंगली भी थमा दी थी मुझे। बोलीं,”अब तक अकेला ही रहता आया है, रूही साथ रहेगी तो तेरा मन बहलेगा और खाने पीने की भी आसानी हो जाएगी।”

बात तो उनकी एकदम सही थी। मैं भी मन ही मन खुश हो गया। नई बीवी को छोड़कर आना मुझे भी अच्छा नहीं लग रहा था। लेकिन यहां आते ही दो चार दिनों में मेरा जोश भक्क से उड़ गया।

रूही जरा-जरा सी बात पर तुनक जाती, चादर बिछा रही होती तो बोलती,”आधी तरफ की तुम बिछाओ तुम भी तो सोते हो न। भैया के यहां मेरा छोटा भाई और मैं मिलकर सारा काम करते थे।”

चाय की प्याली टेबल पर रखते हुए अगर जरा सा निशान बन जाता तो उसी टाइम मुझे कपड़ा लाकर थमा देती। मैं भले ही लैपटॉप पर नजरें गड़ाए ऑफिस का काम कर रहा हूं, मगर वो काम छोड़कर मुझे पहले रगड़-रगड़ कर चाय का दाग छुड़ाना होता था। और हां, पानी पीकर गिलास किचन में ही रखना है, अगर कहीं बेड की साइड टेबल या डायनिंग पर रख दिया तो आफत आ जाती थी।

माना उसके आने से घर चमकने लगा था, लेकिन मुझे इतना डिसिप्लिन सहने की आदत नहीं थी। बरसों से मैं अकेले अपनी मर्जी से रह रहा था। अब ये न करो, वो न करो वाली सिचुएशन से चिढ़ हो रही थी। मैं रोज-रोज की किच किच से तंग आने लगा था।

ख्यालों का शावर बंद करके, नहा कर बाहर आया। देखा रूही किचन के दरवाजे के पास खड़ी उचक-उचक कर ऊंचे हैंगर से किचन टॉवल उतार रही थी। वो एड़ियों के बल खड़ी दोनों हाथ हैंगर के करीब ले जाने की कोशिश में लगी थी। लेकिन टॉवल शायद हुक में फंस गया था। रूही के लंबे स्याह बाल जुड़े की शक्ल में कैद थे, और पीछे गर्दन पर बालों की लट भंवर के जैसे गोल-गोल बिखरी थीं। सुनहरी पीठ पर पसीने की बूंदें फिसल रही थीं जो उसकी संदली रंगत में घुलकर सोने जैसी चमक रही थीं। मैं उस पल किसी जादू से घिर उठा। मेरा मन हुआ उसे बांहों में भरकर चूम लूं। मैं आगे बढ़ा और उसके बिल्कुल करीब पहुंच गया, उसके जिस्म की भीनी खुशबू मेरी रग-रग में भर रही थी।

“ये तुम चोरों की तरह दबे पांव क्यों चलते हो? और ये नहा कर किचन के पास आने की क्या जरूरत थी, फर्श गीला हो जाता है।”

मेरे कुछ करने से पहले ही रूही पलट कर मुझे धक्का देती आगे बढ़ गई।

“हर वक्त धोते-पोंछते रहती हूं, फिर भी घर साफ नहीं रहता।”

मेरे कच्चे-पक्के रोमांस का गला घोंट कर रूही, पोंछे वाले कपड़े से गीले पैरों के निशान पोंछ रही थी।

और इधर मेरा मन कर रहा था कि मैं एक बाल्टी पानी लाऊं और फर्श पर गिरा कर भाग जाऊं।

मैं सोचने लगा मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?

अभी पिछले हफ्ते ऑफिस से आते हुए मैंने रास्ते में चॉकलेट और 3 मोगरे के गजरे लिए।

पूरे रास्ते सोचता रहा, आज रूही की कलाइयों पर, बालों पर मोगरे की कलियां सजाऊंगा। और फिर रोमांटिक माहौल में चॉकलेट का रैपर खोलकर उसे अपने हाथों से खिलाऊंगा।

लेकिन घर पहुंचा तो देखा दरवाजा खुला था। दबे पांव सरप्राइज के खयाल से भीतर गया तो रूही मैडम अपनी भाभी से फोन पर हमारी तारीफें कर रही थीं, ”भाभी सच कह रही हूं इतना आलसी इंसान मैंने आज तक नहीं देखा। इस लड़के में एक अच्छी आदत नहीं। ऑफिस से आने के बाद या तो लैपटॉप या फिर टीवी। कुछ बोलो तो उल्टा जवाब, इतना बोरिंग इंसान है कि लगता है जैसे किसी दीवार से शादी हो गयी मेरी।”

रूही की बात सुनते हुए मैं अपने हाथ में लिए गजरे देखने लगा, वो आगे बोली, “और लापरवाह इतना है कि भीगा तौलिया हमेशा सोफे पर फेंक कर चला जायेगा। सच में भाभी, मैं तंग आ गयी हूं। हां-हां, सब्र तो कर रही हूं, क्या पता किसी जमाने में सही हो जाए।”

मैं चुपचाप बिना कुछ बोले कमरे में आ गया था। आराम से बेड पर लेट कर चॉकलेट खाई और गजरे का पैकेट डस्टबिन में डाल दिया।

आज ऑफिस में अजीब सी उदासी महसूस हो रही थी। मैं बेमन से अपनी डेस्क पर बैठे हुए काम निपटाता रहा। लंच टाइम में मेरी कलीग नेहा आ गई और मेरे पास वाली चेयर खींच कर बैठ गई। वो अक्सर लंच मेरे साथ करती थी।

”आज क्या बनाया है रूही ने? वाह, पनीर के पराठे!” मेरे लंच बॉक्स खोलते ही नेहा खुश होते हुए बोली।

“लो खाओ ना।” मैंने पराठे उसकी तरफ बढ़ाए।

”काश, मेरी शादी किसी रूही टाइप लड़की से हुई होती तो ऐश हो जाते मेरे। ये धवल तो किसी काम का नहीं।” नेहा चहक कर पराठा खाते हुए बोली।

”तुम न पागल हो।” कहते हुए मैंने हंस कर नेहा की तरफ देखा। एक साल पहले ही उसने धवल से शादी की थी। खुशमिजाज सी नेहा और धवल खूब मस्ती करते होंगे।

”तुम दोनों शादी को एंजॉय कर रहे हो, मैं फेसबुक, इन्स्टा पर तुम दोनों की फोटोज देखता हूं। बड़ा अच्छा लगता है, ऐसे ही होना चाहिए,” बोलते हुए मेरे लहजे में रश्क उतर आया।

”यार, जो दिखता है वो होता नहीं। सच तो ये है हम लड़कियां शादी करने के बाद अजीब पछतावे से घिर जाती हैं। तुम्हें पता है? यही धवल जो पहले मेरी छोटी-छोटी बातें याद रखता था, मेरे ड्रेसिंग सेन्स की तारीफें करते नहीं थकता था, मेरे लिए सरप्राइजिंग मोमेंट्स अरेंज करता था, वही धवल अब बदल गया है।”

नेहा की बात सुनकर मैंने गौर से उसका चेहरा देखा, जहां गहरे काजल के पीछे स्याह दुख सिमटे हुए थे। इस वक्त नेहा की आंखें रूही की आंखों जैसी लगीं मुझे।

”नेहा, हो सकता है वो बिजी रहता हो अपने काम में, और वैसे भी कई बार हम कहते नहीं, मगर अपने पार्टनर से प्यार तो होता है न।” मैंने नेहा को समझाना चाहा, जबकि खुद मुझे अपनी बात खाली-खाली सी लग रही थी।

”प्यार है तो दिखना चाहिए। सराहा जाना, चाहा जाना किसे अच्छा नहीं लगता? ये पतियों का कैसा प्यार है जो अदृश्य रूप में रहता है?” कहते हुए नेहा हंस पड़ी और नैपकिन से हाथ साफ करती हुई उठ गई।

“सराहा जाना, चाहा जाना किसे अच्छा नहीं लगता!”

नेहा की ये बात दरअसल वो चाबी थी, जिससे बंद रिश्ते खुल जाते हैं।

मेरा मन एकदम से हल्का हो गया।

मैंने मोबाइल उठाया और रूही का नंबर लगाया, उधर से रूही की आवाज उभरी,”हां बोलो।”

”रूही, आज तुम्हारे बनाए पराठे की बड़ी तारीफ़ हुई। वाकई टेस्टी बने थे।” मैंने मुस्कुराते हुए पराठे वाली बात कही तो रूही कुछ देर चुप रही, फिर बोली, “पता होता तो और रख देती। सिर्फ दो ही रखे थे। तुमने क्या खाया फिर?”

“कुछ नहीं खाया, भूख लग रही है। क्या करूं, छुट्टी लेकर घर आ जाऊं?” मैंने जल्दी से कहा।

“ठीक है, आ जाओ, तब तक मैं कुछ बना लेती हूं।”

“नहीं, कुछ मत बनाना। तैयार हो जाना, फिर बाहर चलेंगे।” मैंने कहा तो रूही कुछ नहीं बोली।

उसकी खामोशी से मुझे कुछ याद आ गया, मैंने मोबाइल होंठों से सटा कर धीमे से कहा,”वही ब्लैक चूड़ीदार-कुरता पहनना जो भैया के यहां पहन कर गई थी।

जवाब में रूही ने ‘हां’ कहा तो मैं मुस्कुरा उठा। जेब से गाड़ी की चाबी निकालते हुए याद आया कि जाते हुए रस्ते में चॉकलेट भी खरीदनी है। उस शाम वाली चॉकलेट की तरह आज चॉकलेट अकेले नहीं, रूही के साथ खानी है।

- सबाहत आफरीन

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