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E-इश्क:मुझे पता था कि सुबोध एक ऐसा मर्द है जो मेरे भीतर की औरत को शिकार बनाना चाहता है, तब भी मुझे विश्वास था कि मैं उसे अपने प्यार से जीत लूंगी

2 महीने पहले
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वह गा रही थी| मेरी तरफ पीठ थी उसकी| इस ऑफिस में नया-नया आया था मैं| वीक एन्ड पर यहाँ छुट्टी जैसा माहौल था|फिर किसी ने कहा, “चैताली गा रही है, सुनो, कितना सुरीला गा रही है वो|”

मैंने गाने से अधिक नाम पर ध्यान दिया| चैताली, कितना सुन्दर नाम और कितना मीठा स्वर| पीछे से देखा तो तन्वंगी, घनी लम्बी चोटी वाली युवती| उत्सुकतावश सामने पहुंच गया| चैताली आंखें मूंदे गा रही थी-

‘’पल भर में ये क्या हो गया...’’

लेकिन उसी पल मेरी कल्पना यथार्थ से टकरा कर चूर चूर हो गई| मैं मान कर चल रहा था कि वो खूबसूरत होगी, अपने नाम की तरह, दुबली, पतली, उजली, सलोनी और प्यारी| लेकिन ये वो नहीं थी| मैं उसके सामने स्तब्ध सा खड़ा था| ये सच में कोई और थी| गहरा सांवला रंग, अनाकर्षक आंखें और कुछ कुछ बाहर निकले ऊबड़ खाबड़ दांत| मेरा आश्चर्य मेरे चेहरे पर उतर आया था|

गीत समाप्त हुआ और तालियां बज उठीं| मेरी आंखें चैताली से मिलीं और तमाम कोशिशें करने पर भी मैं अपनी मायूसी छिपा नहीं सका| इसके बाद भी बस एक ही पल में मैंने चैताली की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया| मेरे उस एक पल के आश्चर्य को चैताली भांप गई थी लेकिन मेरी मित्रता उसने स्वीकार कर ली|

अगले चंद दिनों में मेरी और चैताली की दोस्ती का पौधा पनपने लगा था| चैताली को पता था कि वह सुन्दर नहीं है लेकिन उसने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया| उसमें कुछ ऐसा था जो मुझे खींचता था| उसकी बातें, उसकी समझदारी, उसकी तर्कबुद्धि| उससे बात करते समय मुझे बहुत कुछ इतना सहज लगता था जो सुन्दरता से परे होता था|

चैताली की मां ने चैत महीने में पैदा हुई अपनी बेटी का नाम चैताली धर दिया था| चैताली कोयल जैसी ही काली थी और कोयल जैसी ही मीठी| उसके पिता नहीं थे| मां अक्सर बीमार रहा करती थी| बीमारी से अधिक उन्हें चैताली के ब्याह की चिंता सताया करती| लेकिन चैताली जैसी असुन्दर युवती को कौन ब्याहेगा? न रूप, न रूपया, न सिर पर पिता का साया| अपनी सारी हंसी के बावजूद भी चैताली अक्सर उदास हो जाती| वह अपनी नौकरी से खुश नहीं थी| एक छोटे से घर का सपना उसके मन में बसता था| उसे एक कन्धा चाहिए था जिस पर सिर रख कर वह अपनी पीड़ा बांट सके| जिसका सहारा लेकर वो अपना जीवन काट सके|

एक दिन पंडित ने उसकी कुंडली देख कर बताया कि जल्दी ही उसके जीवन में भी कोई आएगा| उस दिन चैताली के असुन्दर चेहरे से एक सुन्दर हंसी झरी थी| मुझे चैताली अच्छी लगती थी लेकिन मैंने उससे कभी प्रेम नहीं किया| मैं मनुष्य था और तिस पर युवा| मुझे प्रेम करने के लिए एक सुन्दर युवती चाहिए थी... और ये सच मुझे स्वीकार्य था|

फिर एक दिन चैताली ने नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया| उसने तय कर लिया था कि घर पर ही काफी सारे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाएगी और इस तरह मां के पास भी रह सकेगी|

चैताली चली गई| एक दूसरे के फोन नंबर एक्सचेंज करने के बाद भी हम लोग कभी बात नहीं कर पाए| कारण कई थे-व्यस्तताएं, प्राथमिकतायें, वगैरह वगैरह| या हमारी सारी बातें ऑफिस के साथ ही ख़त्म हो गई थीं|

चैताली एक बरस बाद लौट कर आई थी| उसकी हंसी लगातार झर रही थी, झरती ही जा रही थी| उसे एक साथी मिल गया था| आता है, जीवन में एक दिन सभी का आता है| मुझे लगा, पंडित की भविष्यवाणी सच हो गई|

चैताली ने मुझे अपने साथी से मिलवाया था| मासूम सा दिखने वाला सुबोध| शायद उम्र में उससे बरस दो बरस छोटा ही रहा होगा| चैताली की खुशियां बनी रहें, मैंने दिल से प्रार्थना करी|

बहुत दिन बीत गए| फिर से कहीं कोई सम्पर्क नहीं हो पाया| मेरा विवाह, मेरा जन्मदिन, उसका जन्मदिन ( विवाह ???), फोन मिलाता रहा ... उसका फोन बंद था| कोई भी समाचार नहीं मिला| डिजिटल युग में इतनी सम्पर्कशून्यता? मेरे विवाह पर चैताली की शुभकामनायें नहीं मिलीं| मन धुआं-धुआं होता रहा| मन में चैताली का सहजपन जागता रहा|

आठ महीने बाद चैताली फिर मिली| मेरे ऑफिस आई थी| उजाड़, टूटी, खोई सी, रोई सी| बस चुप्पी बुनती हुई| वह हंसना भूल चुकी थी| वो प्रेम में छली गई चैताली थी जो हिचकियों से रो रही थी, रोते रोते कहती जा रही थी, ‘’उसने कहा था कि वह मुझसे अकेले में मिलना चाहता है| मैं तो उसके प्यार में बावरी थी, दीवानी थी| सुबोध ने मेरे भीतर का खालीपन पहचान लिया था| उसने मुझे पास बिठाया| मैं प्यार से उसके सीने से लग गई| मेरे भीतर का बंजारापन प्रेम ढूंढता था, लेकिन सुबोध मुझे अकेले में भोगना चाहता था| उसके हाथ मेरी खुली गर्दन, पीठ और कमर पर फिसलते चले गए| उसकी उंगलियां मेरे शरीर में चुभ रही थीं| मैंने उसे देखा तो कांप गई थी| उसकी आंखों में बस एक कामना थी, एक आदिम इच्छा, एक भूख, एक चाह थी मुझे पा लेने की| उसका स्पर्श, उसकी दृष्टि जैसे मुझे अनावृत करती जा रही थी, मैं निरावरण होती जा रही थी उसके सम्मुख| घृणा हो आई थी मुझे उससे, स्वयं से| उसका स्पर्श सहज नहीं था| संवेदनहीन था वो स्पर्श| संभलते संभलते भी मुझे एक गहरा धक्का लगा| एक गहन पीड़ा से मेरा मन रो उठा| क्या ऐसा होता है प्रेम? मैंने उसे दुत्कार दिया और भाग आई| लेकिन मेरा एक अंश मर गया| मेरे भीतर की औरत मर गई| मेरा मन लहुलुहान हो गया| क्या भावनाओं का, प्रेम का, लगाव का कोई मोल नहीं होता ?’’ वह बिलख रही थी, वह रो रही थी, रोती ही जा रही थी| मैंने उसे संभालना चाहा, ‘’ चैताली, वो तुम्हारे लायक नहीं था| तुम एक अच्छी लड़की हो| तुम्हें कोई और अच्छा लड़का मिलेगा|’’ मैंने उसे पुचकार कर सांत्वना देनी चाही| उसने अपनी आंसू भरी आंखें मुझ पर टिका दीं, “मुझे बताओ देव, अगर मैं इतनी ही अच्छी थी तो तुम भी बस मेरे दोस्त ही क्यों बने रहे? दोस्त से अधिक कुछ क्यों नहीं? मैं तुम्हारी प्रेमिका बन सकती थी, पत्नी बन सकती थी, लेकिन नहीं हो सका ऐसा? क्यों?”

उसका सवाल मेरे ह्रदय पर हथौड़े की तरह बज उठा|

“मुझे याद है देव, तुम्हारी पहली नज़र की वो मायूसी जो मुझे देख कर तुम्हें हुई थी| कभी नहीं भूल पाई मैं कि तुमने भी तो मुझे पहली ही नज़र में नकार ही दिया था| लेकिन तब भी मैं तुम्हारी दोस्त बन कर ही खुश थी| मन में कहीं कोई सपना, कोई उम्मीद बसा करती थी| फिर जब पता चला कि तुमने भी किसी और से ब्याह कर लिया है तो मेरे मन का कोई कोना दरक गया| अपनी बदसूरती के साथ मैंने लगातार संघर्ष किया, देव| मुझे पता था कि सुबोध एक ऐसा मर्द है जो मेरे भीतर की औरत को शिकार बनाना चाहता है तब भी मुझे विश्वास था कि मैं उसे अपने प्यार से जीत लूंगी| लेकिन मैं हार गई, देव| मेरी सारी अच्छाइयों को मेरी बदसूरती ने निगल लिया, ’’चैताली का कहा हुआ एक एक शब्द मेरे मन पर मर्मान्तक चोट दे रहा था| वह कह रही थी, ‘’मुझे जीना होगा देव, खुश रहना होगा ताकि कोई दूसरा सुबोध मुझे छल न सके| तुम्हारी बदसूरती से भरी सुन्दर दुनिया से मुझे अब कुछ लेना देना नहीं| मैं अपनी असुन्दरता के साथ खुश रहना सीख लूंगी|’’

वह रो रही थी| रोते रोते ही उठी| शायद चले जाने के लिए| मैं चुप था, क्योंकि उसके सवालों के कठघरे में मैं भी खड़ा था| मैं उसका सबसे अच्छा मित्र था| उसे जाने से रोक नहीं पाया| वह चली गई| मुझे पता था कि अब वह कभी लौट कर नहीं आएगी|

- आभा श्रीवास्तव

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