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E-इश्क:कैसे कहती कि मैंने ही खेल-खेल में दिल की बात कह दी थी कि मुझे डॉक्टरों की जिंदगी पसंद नहीं, प्रशासनिक अधिकारी की पत्नी बनना चाहती हूं मैं

2 महीने पहले
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मेरे पैर अपनी मर्यादा के बंधन में बंधे कार में बैठ गए और आंखों ने अपनी नमी को खामोश करने को पलकों से ढक दिया। घर की दहलीज लांघकर कार में बैठने तक का रास्ता, पूरे रास्ते मेरी आंखें उसकी आंखों में खोई रहीं, और किसी को शक न हुआ। हमेशा की तरह सब यही सोच रहे थे कि मैं अपने और उसके घर के बीच की दीवार पर रखे अपने पसंदीदा फूलों को देख रही हूं। मैं भी यही जताती थी। कैसे कहती कि उन आंखों को देख रही हूं, जिनमें मुझे वो प्यार दिखा है जो इस दुनिया का नहीं है। वो प्यार जो सिर्फ देना जानता है, बिना शर्त, बिना प्रतिदान की अपेक्षा, निःशब्द, निस्संदेह। बचपन से यही तो करता आया है वो। आज भी वो मेरे जीवन में प्राणदायी ऑक्सीज़न की तरह है, जिसके बिना हम जी नहीं सकते, पर जो दिखाई नहीं देती। सिर्फ महसूस की जा सकती है। एहसास का यही रिश्ता तो हमारा बंधन था जो बचपन से बंध गया था। मेरे घर के बगल में एक ओर उसका घर और दूसरी ओर श्रीवास्तव आंटी का जहां मिलते थे हम। वहां उसका उन्मुक्त आना जाना था क्योंकि उन्हें विजातियों से कोई परहेज नहीं था। और मेरे घरवाले? सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण, हम तो श्रीवास्तव आंटी के यहां भी तब दावत में नहीं जा सकते थे, जब विजातियों को भी बुलाया गया हो। फिर शादी? कितनी बड़ी विसंगति है। खेलने के लिए एक पार्क, पढ़ने के लिए एक स्कूल, रहने के लिए एक कॉलोनी, पर साथ पलकर बड़े हो गए सच्चे प्रेम से एक जीवन का निर्माण संभव नहीं। श्रीवास्तव आंटी के यहां उसकी मां से अक्सर मुलाकात होती। जब भी उसकी मां ने आंटी से अपना दर्द बांटा, कहा कि ये लड़का पता नहीं चाहता क्या है? मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखा और उन आंखों में एक ही इबारत पढ़ी - ‘तुम्हारी खुशी’ और मेरी निःशब्द पलकें झुक गईं। तब भी जब उन्होंने कहा कि बचपन से डॉक्टर बनना चाहता था, पता नहीं अच्छे अंकों से ‘नीट’ निकालने के बाद क्या सूझी कि वो छोड़कर विश्वविद्यालय में प्रवेश ले रहा है। कहता है कि प्रशासनिक अधिकारी बनना चाहता है। मैंने चौंककर उसकी ओर देखा, समझाना भी चाहा पर उसकी मुस्कुराती आंखों की संतुष्टि देखकर अवाक रह गई थी। कैसे कहती कि मैंने ही खेल-खेल में दिल की बात कह दी थी कि मुझे डॉक्टरों की ज़िंदगी पसंद नहीं, प्रशासनिक अधिकारी की पत्नी बनना चाहती हूं मैं। तब भी जब बाज़ारों में मेरे हॉबी कोर्सेज़ की अटपटी ख्वाहिशें ढूढ़ने के लिए वो अक्सर घर या स्कूल से गायब हो जाता और अपने पिता या अध्यापकों से मिली पिटाई पर भी कुछ न बताता। तब भी जब संगीत प्रतियोगिता में मेरे चयनित होने के लिए ज़रूरी वोट जुटाने के लिए वो अपने भाई की शादी में नहीं गया। तब भी जब उसकी मां खीझ गईं थीं कि पता नहीं ये लड़का शादी क्यों नहीं करना चाहता।

इससे पहले सारी बातें आंखों से ही हुईं थीं, मेरा मजबूरी बताना कि मां ने साफ कह दिया है कि अगर मेरे विजातीय लड़के से प्रेम की बात तक पिता को पता चली तो लाशें बिछ जाएंगी। उसका मेरी खुशी के लिए दुआएं मांगते हुए मुझे उनकी बात मानने को राज़ी करना।

लेकिन उस दिन मुझसे न रहा गया। आंटियों के इधर-उधर होते ही बोली थी उससे –“मैंने तुम्हारी बात मानी, अब तुम भी शादी कर लो।” जवाब में मेरा फोन लेकर अपना नंबर उसमें लिखकर कहा था उसने – “जिस नाम से चाहो, सेव कर लो। ज़िंदगी में तुम्हें कभी भी किसी भी चीज़ की ज़रूरत पड़ जाए तो उसे पूरा करने के लिए अपनी ज़िंदगी में कोई बाधा नहीं चाहता मैं।”

और मैंने अपने उस जीवनदायी एहसास को ऑक्सीज़न नाम से सेव कर लिया। क्या पता था कि मेरी ज़िंदगी बचाने की आखिरी उम्मीद में सारे मोबाइल के सारे कॉन्टैक्ट्स खंगालते मेरे पति को वो नंबर मिल जाएगा पति ये सोचकर कि वो करोना काल की इस आकस्मिक ज़रूरत के लिए ही सेव किया गया नंबर है, उसे डायल कर देंगे। और वो इतने सालों में जोड़ी अपनी सारी सम्पत्ति लुटा देगा मुझे चंद सिलेंडर मुहैया कराने के लिए...

और पति विह्वल होकर बताएंगे कि जाने कौन फरिश्ता था, न उसने नाम बताया न किट के कारण कोई पहचान बना सका मैं। पर सारी ज़रूरतें पूरी होती गईं...

- भावना प्रकाश

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