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E-इश्क:आज मैं अगली सुबह का इंतजार नहीं करूंगा, इसी पल तुम्हें अपने साथ ले जाऊंगा, चलोगी ना देवयानी

4 महीने पहले
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नेट पर यूं ही रोबोट की कार्यशैली के बारे में पढ़ रही थी। क्यों? क्या इसलिए कि उसे लगने लगा कि वह भी रोबोट बनती जा रही है? उसे लगा कि दूसरों की इच्छाओं का ख्याल रखते हुए, दूसरों की भावनाएं कहीं आहत न हो जाएं, इसी सोच में कैद रहते हुए, वह खुद संवेदना शून्य होती जा रही है। वह भी तो रोबोट ही है! सब यही अपेक्षा रखते हैं कि वह बिना कुछ कहे, बिना अपनी मर्जी जताए उनकी जरूरतों का खयाल रखे। न जाने कितना लंबा वक्त गुजर गया है जिम्मेदारियां उठाते-उठाते। क्या सचमुच उसके दिल में अब कोई अरमान नहीं बचा है? क्या सचमुच उम्र के इस पड़ाव पर आकर अपने बारे में सोचना स्वार्थी बन जाना होता है?

यही तो कहा था न सरगम ने उस दिन। ''दीदी, आप कितनी स्वार्थी होती जा रही हैं। बच्चों को दो-चार दिन आपके पास छोड़कर अगर हम घूमने जाना चाहते हैं तो इसमें क्या गलत है। दो-चार दिन की छुट्टियां तो ले ही सकती हैं आप? इतनी बड़ी अधिकारी को कौन रोक सकता है?’’

“यह बात नहीं है सरगम, दरअसल इस हफ्ते हमारी एनवल मीट आरंभ होने वाली है।’’ सरगम चिढ़कर दो-चार और बातें सुनाकर चली गई थी। हालांकि सरगम का इस तरह का व्यवहार कोई अप्रत्याक्षित नहीं था, पर एक टीस अवश्य मन में अक्सर उठ जाती थी कि बहन होकर भी वह उसके जज्बातों की कभी कद्र नहीं कर पाई। रविवार था इसलिए दोनों भाइयों के परिवार सुबह ही घूमने निकल गए थे और वह अपने सन्नाटों के साथ थी बिल्कुल अकेली।

स्वेटर के साथ शॉल लेने के बावजूद जनवरी की कड़कती ठंड उसकी हड्डियों में चटक रही थी। धूप का एक कतरा तक नहीं था। लॉन के हरे-भरे विस्तार और फूल-पत्तियों पर अभी भी ओस की बूंदें चमक रही थी। कभी इसी हरी दूब पर नंगे पांव चलना उसे बहुत पसंद था। कभी-कभी उसके दुपट्टे का छोर पेड़ की किसी टहनी पर अटक जाता तो एक खिलखिलाती हंसी उसके कानों से टकरा जाती और वह शर्म से दुपट्टे को वहीं अटका छोड़ अंदर भाग जाती थी। उस समय उसके गाल कनेर के फूल की तरह आरक्त हो जाते थे और सांसें तेज-तेज चलने लगती थीं। तब उसे लगता था कि क्यारियों में एक संगति में लगे फूल भी उस हंसी के साथ सम्मिलित हो गए हैं।

दोनों की कोठियां एकदम सटी हुई थीं, लेकिन मिलना-जुलना खास नहीं था। मां ही कभी-कभार लॉन में खड़े-खड़े उस कोठी की आंटी से बतिया लेती थीं। कॉलेज आते-जाते अक्सर उसकी निगाहें उस कोठी पर उसे ताकती उन दो जोड़ी आंखों से टकरा जाती थीं, जिसकी खिलखिलाती हंसी उसके गाल आरक्त कर देती थी। वह अपने दिल को संभालती तेजी से वहां से निकल जाती थी। चार भाई-बहनों में सबसे बड़ी बेटी होने के बावजूद पापा को उसकी शादी की कभी जल्दी नहीं हुई। मां कभी दबे स्वरों में इस बात को उठातीं भी तो पापा चिढ़ जाते। ''मुझे अपने बच्चों को खूब पढ़ाना है और बेटियों को भी बेटों की तरह पांव पर खड़े करना है। देवयानी को मैं आईएएस बनाना चाहता हूं। मैं जानता हूं कि वह किसी भी तरह की कठिन स्थिति का सामना करने में सक्षम है।’’ अपने प्रति पापा के विश्वास को देख वह गर्व से भर जाती और जी-जान से पापा के सपने को पूरा करने के लिए जुट जाती। तब उसे क्या पता था कि पापा का वह विश्वास उसके जीवन की सारे समीकरण ही बदल देगा।

''आई लाइक यू देवयानी,’’ कुछ हिचकते, हकलाते उसने बोला था। एकदम अपने सामने पा वह अचकचा गई थी। वह तब आईएएस की तैयारी कर रही थी। अचानक ही लाइब्रेरी के बाहर उसे मिल गया था। ''नो, आई मीन, आई लव यू देवयानी।’’ वह अपने को संभाल पाती उससे पहले ही उसने उसका हाथ पकड़ उसे कार में बिठा लिया था। इतने समय से केवल आंखों ही आंखों में झांकने के बाद उसका मुखर हो जाना जहां एक तरफ देवयानी को हैरान कर रहा था, वहीं उसके दिल की धड़कनें भी प्यार के किए जाने वाले इजहार से बढ़ गई थीं।

''मैंने एक कंपनी में मार्केटिंग हेड की जॉब ज्वाइन कर ली है और अब मैं चाहता हूं कि हम दोनों शादी कर लें।’’ एकदम साफ शब्दों में इस बार उसने बिना हिचकिचाए अपनी बात कह दी थी। अभी तो उसे पढ़ना था। ''मुझे नहीं लगता कि हमारे पेरेंट्स को कोई आपत्ति होगी। तुम्हारे पापा को इतना स्मार्ट और बढ़िया नौकरी वाला दामाद क्योंकर पसंद नहीं आएगा?’’ मधुर की सहजता के आगे वह परास्त सी हो गई थी।

प्यार के असीम सुख को अपने दुपट्टे में लपेटे जब वह वापस लौटी तो उसके कदम थिरक रहे थे। अगले दिन रिश्ते की बात करने वह परिवार के साथ आने वाला था। पर अगली सुबह तक इतना कुछ बदल गया था कि प्यार के उस सुख को उसे दुपट्टे में लिपटाए ही एक संदूक में बंद करके रखना पड़ा। बिजनेस में जबरदस्त नुकसान होने का जो सदमा पापा एक महीने से झेल रहे थे और जिसके बारे में केवल मां को ही पता था, और बर्दाश्त नहीं कर पाए। उसी रात उन्हें दिल का दौरा पड़ा और देवयानी की ओर विश्वास से देखते हुए उन्होंने आंखें मूंद लीं।

पापा के उस विश्वास को वह कैसे तोड़ देती। भूल गई अपने सपनों को… और जुट गई बिजनेस, मां और तीनों भाई-बहनों को संभालने में। आईएसएस बनाने का पापा का सपना और परिवार की जिम्मेदारी को उठाना ही उसका ध्येय बन गया। मधुर ने आगे बढ़कर साथ देने की पेशकश की तो स्वाभिमानी देवयानी ने इनकार कर दिया। परिवार उसका था और वह खुद अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करना चाहती थी। पता नहीं क्यों उसके पापा को अब उनका परिवार चुभने लगा था, शायद उन्हें डर था कि उनका इकलौता बेटा कभी भावुकता में आकर उस परिवार का सहारा बनने की भूल न कर बैठे।

कुछ दिनों बाद ही वे लोग कोठी को किराए पर चढ़ाकर वहां से शिफ्ट हो गए और फिर मधुर का भी देवयानी से संपर्क छूट गया। कोई चाहे कुछ कहे-समझे, पर वह जानती थी कि माता-पिता की जिद ने ही उसे इसके लिए मजबूर किया होगा। दोनों भाइयों को पढ़ा-लिखाकर उन्हें इस लायक बना दिया कि वे आज बिजनेस को बखूबी संभाल रहे हैं और सरगम जो सबसे छोटी थी उसकी शादी हुए भी तो बरसों हो गए हैं। वह आईएएस अफसर है और बूढ़ी मां की आंखों में जब-जब पापा के उसी विश्वास को देखती, तो भाई-बहन के तानों, उलाहनों के बावजूद गर्व से भर जाती। मां के जाने के बाद से तो जैसे वह बिल्कुल अकेली हो गई है। अब न तो बालकनी से आती खिलखिलाती हंसी सुनाई देती है, न ही हरी घास पर चलने का मन ही करता है।

आज उम्र के इस पड़ाव पर आकर वह अकेली ही तो है। किसी को उसके होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। अपनी-अपनी जरूरतों के अनुसार बस तीनों उसे यहां-वहां धकेलते रहते हैं। मशीन की तरह वह उनकी ख्वाहिशें आज भी पूरी करती है।

क्या वह सचमुच निर्जीव हो गई है? फिर क्यों वह खिलखिलाती हंसी उसके अंदर तरंग छेड़ती है आज भी? कहां हो तुम मधुर? उसका मन कर रहा था कि वह जोर-जोर से रोए। पापा के विश्वास को जीने का कोई पछतावा नहीं है, पर रिश्तों के मशीनी हो जाने का दुख अवश्य है। बराबर वाली कोठी काफी दिनों से खाली पड़ी है। सुना था कि मधुर अपने पेरेंट्स के साथ विदेश में ही बस गया था। दिल के भीतर अनगिनत किरचें चुभने लगीं। संदूक में बंद बरसों से पड़े दुपट्टे को बाहर निकाला तो लगा था कि प्यार का वह असीम सुख उसके अंतरमन में बसने को आकुल है।

आसमान से बदली छंट चुकी थी। यूं ही मन किया कि आज फिर घास पर नंगे पैर चले। कड़कती ठंड के बावजूद नरम घास पर पड़ी ओस की बूंदें सुकून दे रही थीं। तेज हवा का झोंका आया और चलते-चलते साड़ी के पल्लू को एक टहनी ने पकड़ा तो अचानक वही खिलखिलाती हंसी कानों से टकराई। पल्लू खींच वह पलटी।

''आई लाइक यू देवयानी! नो, आई लव यू देवयानी!’’ मधुर सामने खड़ा था। मुस्कुराते हुए प्यार का असीम सुख उसके पल्लू में भरने को आकुल-सा। बालों में हल्की सफेदी आ गई थी। चेहरे पर छाई चमक और आंखों से झलकती निश्छलता-सहजता जैसे देवयानी की परीक्षा लेना चाहती थी।

''जिम्मेदारियां पूरी करने के लिए तुम्हें मैंने बहुत वक्त दिया देवयानी। क्या अब भी मशीन की तरह जुटे रहने का इरादा है या अपनी संवेदनाओं को खुलकर सांस लेने दोगी? मुक्त हो जाओ अब तो। और कितना इंतजार करूं? आज मैं अगली सुबह का इंतजार नहीं करूंगा, बस इसी पल तुम्हें अपने साथ ले जाऊंगा। चलोगी न?’’ देवयानी ने अपनी साड़ी के पल्लू को कसकर शरीर से लपेट लिया था, वह इस बार प्यार के उस सुख को संदूक में बंद करके नहीं रखना चाहती थी।

- सुमन बाजपेयी

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