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बचपन का प्यार:10 साल बाद उसकी गर्लफ्रेंड ने जो खुलासा किया, उसे सुनकर रितिक के पैरों तले जमीन खिसक गई

2 महीने पहले
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20 जनवरी 2002

“रितिक, तुम्हें वैदेही से इतनी बुरी तरह से बात नहीं करनी चाहिए थी,” वीरू ने कहा।

"मैं किसी की परवाह नहीं करता। मेरी अपनी सोच है। अगर तुम्हारे मन में उसके प्रति इतनी ही सहानुभूति है तो उसके प्रेमी बन जाओ या बेस्ट फ्रेंड बन जाओ,” रितिक ने वीरू की बात के जवाब में उसे ताना मारते हुए कहा।

वीरू के लिए रितिक का ऐसा व्यवहार कोई नया नहीं था। पिछले 6 वर्षों से वह उसे जानता था और अक्सर उसके कटु शब्दों के घेरे में वह आ ही जाता था।

निहारिका ने बस उससे इतना ही कहा था कि वह पढ़ाई में अगर अच्छा है और इस बात का उसे घमंड है तो उसे ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर देना चाहिए।

बेशक उसने यह बात मजाक में कही थी, पर रितिक ने उसे बुरी तरह झाड़ दिया था। वीरू को यह बात बुरी लगी थी, शायद इसलिए कि वह निहारिका को पसंद करता था।

रितिक टॉप करने वाले लड़कों में से था। बुद्धिमान, स्मार्ट और एक बेहतरीन खिलाड़ी। हर लड़की के लिए आकर्षण का केंद्रबिंदु था। शायद इसी वजह से कि लड़कियां उस पर मरती हैं, वह जिद्दी और अकड़ू इंसान बन गया था।

“वैदेही, क्या तुम्हारे पास एक्स्ट्रा असाइनमेंट कॉपी है?” रितिक ने पूछा। वह किसी लड़की का मजाक उड़ाने से नहीं चूकता था, पर पूरी क्लास में वैदेही ही उसकी एकमात्र सबसे अच्छी दोस्त थी।

"हां, मुझे पता था कि तुम कॉपी लाओगे नहीं," वैदेही ने मुस्कराते हुए कहा और एक नई कॉपी निकालकर उसे दे दी।

वैदेही बहुत सुंदर थी, लेकिन अपनी सुंदरता को लेकर इतराने के बजाय वह अपनी पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देती थी। फिर भी वह अपने मासूम अंदाज में बहुत प्यारी लगती थी। उन दोनों ने एक ही दिन, एक ही क्लास में एडमिशन लिया था। तीसरी क्लास से वे दोनों साथ हैं और तब से उनके बीच अच्छी दोस्ती है।

दसवीं की बोर्ड परीक्षाएं शुरू होने वाली थीं। “रितिक, अब तुम्हें अपनी पढ़ाई पर अधिक ध्यान देना चाहिए, न कि सॉकर खेलने में समय व्यर्थ करना चाहिए,” वैदेही रितिक पर बिगड़ रही थी।

"तुम बेकार ही चिंता कर रही हो। पढ़ाई पर पूरा ध्यान है मेरा। मैं कोई किताबी कीड़ा नहीं हूं, जो सारा दिन किताबें हाथ में लिए बैठा रहूं। सॉकर मेरा पैशन है। तुम जाओ प्यारी न्यूटन और पढ़ो," उसने फुटबॉल को पैरों से घुमाते हुए उस छेड़ा। वह उसे न्यूटन कहकर छेड़ा करता था।

पहली परीक्षा से सिर्फ दो दिन पहले रितिक फुटबॉल के मैदान में फिसल गया जिससे उसके पैर में फ्रैक्चर हो गया।

“वैदेही, मैं अब एक्जाम नहीं दे पाऊंगा। मेरा एक साल खराब हो जाएगा,” रितिक के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।

“रितिक, तुम ऐसे कैसे हिम्मत हार सकते हो? तुमने पूरी तैयारी की है। जानती हूं, तुम्हें बहुत दर्द हो रहा है, लेकिन मत भूलो पूरे स्कूल को तुमसे उम्मीदें हैं। इस तरह तुम अपना एक साल बर्बाद नहीं कर सकते। मैं रात को तुम्हारे पास ही रुकूंगी। तुम्हारी पढ़ाई में मदद करूंगी।”

वैदेही अक्सर ही रितिक के घर आया करती थी और दोनों परिवारों में भी अच्छी दोस्ती थी। रितिक के घर रुकने पर न तो उसकी मां ने कोई आपत्ति की थी, न ही रितिक की मां ने। उन्हें तो तसल्ली हो गई थी कि वैदेही उसे संभाल लेगी।

जिस दिन रिजल्ट आया, उस दिन रितिक की खुशी का ठिकाना नहीं था। वह वैदेही के गले लगते हुए बोला,“मैंने टॉप किया है। 95% अंक आए हैं। मैं बहुत खुश हूं, और यह सिर्फ तुम्हारी वजह से हुआ है, न्यूटन। तुम्हारे कितने प्रतिशत आए हैं?”

“मैं भी पास हो गई हूं,” उसने कहा और वहां से चली गई।

अपनी खुशी और दूसरे दोस्तों के साथ जश्न मनाने की प्लानिंग में डूबे रितिक ने उसके इस तरह चले जाने पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

“बस करो रितिक,” वीरू ने उसके कंधे झिंझोड़ते हुए कहा।

“तुम इतने मतलबी कैसे हो सकते हो? तुमने वैदेही को नहीं देखा? तुम्हें पढ़ाने और मोरल सपोर्ट देने में उसने अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दिया। वह तुम्हारे लिए रात भर जागती रही और इस वजह से मैथ्स के पेपर में वह सो गई थी।”

वीरू की बात सुनकर रितिक चौंका। यह क्या हो गया? वह उसके घर की ओर दौड़ा। उसे गले लगाते हुए बोला, "आई एम सॉरी वैदेही। मेरी वजह से…”

“कोई नहीं,” बीच में ही उसकी बात काटती हुई वह बोली, “मैथ्स में कंपार्टमेंट ही तो आई है। मैं क्लीयर कर लूंगी, वह भी अच्छे नंबरों से," वैदेही उसे दिलासा देने लगी।

पहली बार रितिक के मन में उसे लेकर अलग तरह के एहसास जन्मे। हर गुजरते लम्हे के साथ वह उस दिशा में बढ़ता चला गया जिसे लोग प्यार कहते हैं। यह भी सच है कि हर गुजरते दिन के साथ सब कुछ सामान्य हो जाता है और कंपार्टमेंट के रिजल्ट में वैदेही ने वास्तव में 99% अंक स्कोर किए।

लेकिन रितिक बदल गया था। वैदेही उसे बेस्ट फ्रेंड से कुछ ज्यादा लगने लगी थी। वह सोचता कि क्या उसे यह बात बता देनी चाहिए। एक दिन वह उन दोनों की सारी फोटोग्राफ की एक एल्बम बनाकर और एक ब्रेसलेट लेकर उसके घर पहुंचा। ब्रेसलेट पर भी उसने उन दोनों की बहुत छोटी-सी फोटो जड़वा दी थी।

वैदेही के दरवाजा खोलते ही रितिक ने कहा, “मेरे पास तुम्हारे लिए एक खास खबर है।”

“मैं भी तुमसे कुछ कहना चाहती हूं…”

वैदेही कुछ बताती उससे पहले ही उसकी मां आ गई। “रितिक, अच्छा हुआ तुम आ गए। मैं तुम्हारी मां से मिलने आने ही वाली थी। हम इसी हफ्ते लंदन जा रहे हैं। वैदेही के पापा का वहां भारतीय दूतावास में तबादला हो गया है। मैं वैदेही से कह ही रही थी कि तुम्हें बुला ले। बैठो, मैं तुम्हारे लिए कुछ खाने के लिए लेकर आती हूं।” मां रसोई में चली गईं

रितिक का चेहरा पीला पड़ गया। जिस लड़की से वह अपने दिल की बात कहने आया था, वह देश छोड़कर जा रही है। "मुझे खुद नहीं पता था। मेरी कंपार्टमेंट की परीक्षा में कोई रुकावट न आए, इसलिए मां ने मुझे यह बात नहीं बताई थी।” रितिक के चेहरे पर छाई उदासी को देख वह बोली।

रितिक उसके बाद वहां रुका नहीं। हाथ में रखी एल्बम उसे देने की हिम्मत नहीं हुई। लेकिन तब वह जान नहीं पाया था कि ब्रेसलेट उसके हाथ से फिसल कर नीचे कालीन पर गिर गया था। उसके बाद उसने वैदेही के फोन भी नहीं उठाए। वह अपने भाग्य से नाराज था और वैदेही से भी।

वैदेही उसके लिए एक नोट लिखकर छोड़ गई थी जो वीरू ने लाकर उसे दिया। रितिक ने वह नोट कभी नहीं पढ़ा, लेकिन वह हमेशा उसके पर्स में रखा रहा।

समय बीतता रहा। उसने कभी उससे संपर्क नहीं किया। उसने पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई पर लगा दिया। लेकिन अब वह न तो सॉकर खेलता था, न ही अन्य गतिविधियों में हिस्सा लेता था। वह सिर्फ किताबों में घुसे रहने वाला किताबी कीड़ा बन गया था। उसने आईआईटी क्लीयर कर ली। हर कोई उसकी प्रशंसा करता, उसे शाबाशी देता, लेकिन वह उसे याद कर रहा था, उसकी कमी उसे खल रही थी।

अब वह जिद्दी और अकड़ू इंसान नहीं था, लेकिन अब वह हंसता भी नहीं था। वीरू ने भी आरईसी में प्रवेश ले लिया था।

समय भाग रहा था। रितिक को एक मशहूर एमएनसी में जॉब मिल गई थी। हर कोई खुश था और उसने भी वास्तविकता को स्वीकार कर जीना सीख ही लिया था या शायद समय ने उसे ऐसा करने को मजबूर कर दिया था।

20 जनवरी 2012

"क्या यहां कोई बैठा है," किसी ने पूछा।

"नहीं," रितिक ने जवाब दिया। और उसे बैठने का इशारा किया। वह उसकी टेबल पर सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई। शाम का समय था और इस समय कोई जगह खाली नहीं थी। लड़के-लड़कियों का झुंड सारे रेस्तरां पर कब्जा जमाए बैठा था, शायद कोई पार्टी चल रही थी।

"कहां से हो?" रितिक ने उससे पूछा। क्यों पूछा, उसे नहीं पता। शायद टाइम पास करने के लिए या अकेलापन भरने के इरादे से।

“मैं आज ही भारत लौटी हूं। मसाला चाय पीने और पाव भाजी खाने की चाह मुझे इस रेस्तरां में खींच लाई। विदेश में यह मिलता है, पर स्वाद यहीं आकर आता है। यह रेस्तरां हमेशा से मेरा फेवरेट रहा है। मुझे उम्मीद नहीं थी कि इतने सालों बाद भी यह मुझे खुला मिलेगा।” लड़की ने जवाब दिया।

वे परिचय को आगे बढ़ाते उससे पहले ही रितिक का फोन बज उठा। “मुझे तुरंत निकलना होगा,” वह औपचारिकता वश बोला।

वह जाने के लिए उठा ही था कि अचानक उसके जूते के फीते अटक गए और वह उस लड़की के ऊपर जा गिरा। सॉरी बोलते हुए उसने खड़े होने की कोशिश की, लेकिन तभी उसके कोट से कुछ टकराया। वह उसका ब्रेसलेट था, जिस पर उनकी दसवीं क्लास की फोटो जड़ी हुई थी।

"तुम्हारा नाम क्या है और यह ब्रेसलेट तुम्हारे पास कैसे आया?" रितिक ने अधीरता से पूछा।

"वैदेही," उसने उसके कोट से ब्रेसलेट निकालने की कोशिश करते हुए कहा।

“एक मिनट। तुमने ब्रेसलेट के बारे में क्यों पूछा? तुम रितिक हो?” वह खुशी से चिल्लाई और उससे लिपट गई।

“मुझे उम्मीद नहीं थी कि तुम लौट कर आओगी?” रितिक को अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था।

“प्यार हमेशा लौट कर आता है,” उसने मुस्कराते हुए कहा।

“प्यार?” रितिक हैरान था।

“हां, प्यार! मैं भी तुमसे प्यार करती थी। तुमने मेरा नोट नहीं पढ़ा?”

रितिक ने झट से अपने पर्स से वह नोट निकाला। जिसे पढ़ने की हिम्मत वह कभी नहीं कर पाया था।

“आई लव यू रितिक। मैं लौट कर आऊंगी। मेरा इंतजार करोगे न?”

रितिक की आंखें नम हो गईं। वैदेही ने कसकर उसका हाथ थाम लिया।

- सुमना. बी

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