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E-इश्क:आधी उमर निकल गयी शैलेश, अब किसी भी जवाब का कोई मतलब नहीं, पर जवाब दिये बिना अब जी नहीं पाऊंगी

2 महीने पहले
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काम तो रोज ही रहता है रति को, पर आज उसे काम से नहीं एक नाम से परेशान थी। शैलेश राठौर, यही नाम था उसका जो अभी रति से मिलने आने वाला था। डिप्टी कलेक्टर के पद पर आसीन रति त्रिवेदी एक अधेड़ उम्र की सभ्य व गरिमामय व्यक्तित्व थी। घबराहट तो इतनी थी आज उसे कि बार-बार ये सोचकर ही कांप जाती, “ये वही हुआ तो?” पर आज खुद को कई बार आईने में भी निहारने से नहीं मान रही थी। क्यों..? इसका जवाब तो आज रति भी नहीं जानती थी। खैर, लंच के बाद शैलेश राठौर अंदर आए तो लगा जैसे रति के शरीर का सारा खून ही सुख गया हो। वही आंखें जिन पर अब चश्मा चढ़ चुका था, वही रौबदार व सभ्य आवाज़, बस उम्र का चढ़ाव वहां भी थी। बड़ी मुश्किल से संभाला रति ने ख़ुद को। शैलेश ने बड़ी समझदारी से सारी औपचारिकतताएं निभाईं जैसे वो केवल एक अधिकारी से मिलने आया है। काम खत्म और शैलेश कमरे से बाहर जा चुका था। अब रति अकेली थी। काम भी खत्म, पर आज उसका घर जाने का मन ही नहीं हुआ। आज अतीत ने उसे फिर अपने पास बुला लिया। कॉलेज में शैलेश रति को बहुत पसंद करता था और ये बात पूरे कॉलेज को पता थी। रति भी शैलेश को पसंद करती थी, पर ये बात सिर्फ रति ही जानती थी। रति जानती थी कि उन दोनों के रिश्ते का कोई भविष्य नहीं है इसलिए वो चुपचाप आगे बढ़ती गयी। कॉलेज का आखिरी दिन। सभी खुश और थोड़े उदास थे। पर इन सबमें आज कुछ और भी होने वाला था। भागमभाग और उतनी भीड़ में जब रति काॅफी लेने कैंटिन गयी तो वो समझ चुकी थी कि शैलेश उसके पीछे है। कहीं न कहीं वो खुश हो रही थी, पर सिर्फ दिल में, चेहरा तो अजनबी बनने का मुखौटा ओढ़े हुये था। बीच में ही शैलेश ने उसे रोका और कहा, “रति, प्लीज़ रूको। मुझे कुछ बात करनी है।” रति ने गुस्सा दिखाते हुए कहा, “मुझे जाने दो, मुझे कुछ नहीं सुनना।” "घबराओ मत रति, मैं कुछ गलत नहीं करने आया, मैं तुम्हें टच भी नहीं करूंगी, सिर्फ इतना ही कहना है कि I LOVE YOU” रति को तो जैसे मन मांगी मुराद मिली हो, मन ही मन नाच पड़ी थी, पर तुरंत भविष्य का ख्याल आते ही वो गुस्से में वहां से जाने लगी। तब शैलेश ने कहा, “आज तुम कॉलेज के बाद बाहर पार्क में आकर ख़ुद मुझे जवाब दो, हां या ना।” रति को लगा जैसे अभी चीखकर बोल दे, "हां शैलेश हां।" पर खुद को रोकते औ आंसू छुपाकर वो भाग गयी। उस दिन के बाद वो शैलेश से कभी नहीं मिली। पर दोस्तों से सुनती थी कि शैलेश रोज़ कॉलेज के पार्क में रति के जवाब का इंतजार करता था। रति ने सोचा कुछ दिनों बाद सब भूलकर आगे बढ़ जाएगा। आज इतने सालों बाद रति को लगा कि वो सही थी। शैलेश इतना आगे निकल गया कि आज रति भी उसके लिए अजनबी हो गयी । 8 महीने गुज़र गए और जिस प्राॅजेक्ट के सिलसिले में शैलेश रति से मिला था आज उसका उद्घाटन था। पर आज रति सामान्य थी। साईट पर सब कुछ व्यवस्थित था। तभी किसी के शब्दों ने रति को हिलाकर रख दिया। "शैलेश जी, न तो आपके बीवी-बच्चे, न ही माता-पिता, न कोई सालगिरह, फिर आप हर साल इसी तारीख को बनारस क्या करने जाते हैं?” शैलेश ने कहा, “इंतजार करने।” रति से अब रहा नहीं जा रहा था। वहां से तो वो चली आई, पर अगली सुबह शैलेश के दरवाज़े के सामने खड़ी थी। शैलेश ने दरवाजा खोला और कहा, “आओ रति” "अच्छा, तो पहचानते हो मुझे.” रति गुस्से में थी। "तुम बाहर एक सरकारी पदाधिकारी हो, तुम्हारी गरिमा बनी रहनी चाहिये,” शैलेश ने मुस्कुराते हुए कहा। रति ने आतुर होकर पूछा, “तुमने शादी क्यों नहीं की?” "मैंने कहा था ना, तुम जब तक जवाब नहीं दोगी, आगे नहीं बढूंगा। घरवालों के सवालों से तंग आकर पढ़ाई की और यहां तक पहुंच गया, पर रिश्तों में नहीं।” शैलेश गंभीर था। इस बार शैलेश ने कहा, “तुमने भी तो शादी नहीं की।” इस बार रति मन में शांत थी, “तुम्हें हां कहकर छोड़ने की हिम्मत नहीं थी, और ना तो कभी कह ही नहीं सकती थी। घरवालों से लड़ने की ताकत नहीं थी इसलिए पढ़कर इस लायक बन गयी कि अपनी शादी से जुड़ा फैसला कर सकूं। और घरवालों और उनकी इज़्जत पर दाग न बनूं।” थोड़ी देर दोनों शांत थे। रति चुपचाप चली गयी। खबर मिली कि रति मैडम 1 हफ्ते की छुट्टी पर हैं। शैलेश हर साल की तरह घर गया और कॉलेज के फेयरवेल की तारीख पर पार्क में बैठ गया। उसकी नज़रें जो देख रही थी वो सच था। आज रति आई थी वहां, उसके पास। "आधी उमर निकल गयी शैलेश, अब किसी भी जवाब का कोई मतलब नहीं, पर जवाब दिये बिना अब जी नहीं पाऊँगी। शैलेश मेरी हमेशा से हां और सिर्फ हां थी और है।” शैलेश मुस्कुराता हुआ उसके पास गया और रति का हाथ थामकर कहा, “आधी उम्र निकली है, पर जिंदगी अभी बाकी है। साथी बनोगी मेरी?” इस बार रति की बारी थी। रति ने गले लगते हुए कहा, “चलो, अब हम अपनी दुनिया, अपने तरीके से बसाएँगे।” आज बरसों के इम्तिहान के बाद आखिर दो प्रेम करने वाले एक हो गए। आखिर एक सवाल को उसका जवाब मिल ही गया।

- अनिता पाठक

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