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E-इश्क:फासले कम होने की वजह से लगता है कि हम साथ हैं, लेकिन हर कोई अपने-अपने प्लेटफॉर्म पर अकेला ही खड़ा होता है

2 महीने पहले
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व्हाट्सऐप ने एक बार फिर मेघदूत सा काम किया और कुंजा की तस्वीर तनवीर तक तुरत ही पहुंचा दी। कुंजा झुंझुनू के रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर चार पर बैठी अपनी ट्रेन की प्रतीक्षा कर रही थी। तनवीर को व्हाट्सऐप पर ऑनलाइन देख एक पल चकित हो गयी। एक मुस्कान कुंजा के अधरों पर तैर गयी। वैसे तो कुंजा प्लेटफार्म पर नितांत अकेली थी, लेकिन उसने एक बार नजर इधर-उधर दौड़ाई। शायद वह नहीं चाहती थी कि उसके चेहरे पर फैली गुलाबी मुस्कान कोई देख ले। औपचारिकताओं के बाद पता चला तनवीर भी नई दिल्ली एयरपोर्ट के टर्मिनल दो पर बैठा था। कुंजा की ट्रेन सुबह पांच पैंतालीस पर आनी थी, तनवीर की फ्लाइट सुबह पांच पैंतालीस की थी। दोनों के पास करीब पांच घंटे थे। कुंजा को यों तो ट्रैन में नींद नहीं आती थी, लेकिन आज वह बाहर के साथ-साथ मन से भी अकेला महसूस कर रही थी। सन्नाटे भरे प्लेटफॉर्म पर व्हाट्सऐप मैसेज की जब-तब बजती घंटी कुंजा को एहसास दे रही थी कि वह पूरी तरह अकेली नहीं है। व्हाट्सऐप के संता-बंता और हाथी चींटी वाले लतीफे शेयर करने के बाद तनवीर ने मैसेज में लिखा, “आज बहुत अकेली लग रही हो, क्या बात है?”
यह दोनों आभासी दुनिया के मित्र थे। दोनों ने एक दूसरे की इक्का-दुक्का तस्वीर देखी थी। तस्वीर भी वो वाली जो स्टूडियो जाकर खिंचवाई जाती थी, फूल पत्ती के साथ वाली। कुल मिला कर दोनों एक दूसरे के लिए एक आभास, एक अहसास ही थे, लेकिन एक हसीन एहसास। गजब की बात यह है कि जब आप किसी से मिले न हों, तो वह व्यक्ति आपके लिए एक कोरा कैनवास ही होता है। उसमें भरने के लिए दुनिया भर की कुचियां होती हैं और ब्रह्मांड भर रंग होते हैं। तनवीर और कुंजा इन रंगों के साथ ही खेल रहे थे, साल भर से। मजे की बात तो यह है कि दोनों के मोबाइलों पर एक ही गीत बज रहा था, “आओगे जब तुम साजना, अंगना फूल खिलेंगे।”
कुंजा ने दोनों के बीच चुप्पी गाढ़ी होती देख, उस मौन को तोड़ने का प्रयास किया। कुंजा ने व्हाट्सऐप पर इस गीत का स्क्रीनशॉट तनवीर को भेजा। इस बार मुस्कराने की बारी तनवीर की थी। एक पल में दिल्ली एअरपोर्ट पर बैठे-बैठे तनवीर ने आंखें बंद करी और पहुंच गया हरिद्वार, जहां वो उन दिनों नौकरी कर रहा था, जब यह फिल्म रिलीज हुई थी। मुस्कान और सुखद अतीत से पहली फुरसत पाकर, तनवीर ने कुंजा को मैसेज लिखा,
“तुम्हें कैसे पता कि मुझे यह गीत पसंद है? कुछ देर पहले मैं यही गीत गुनगुना रहा था।”
ऐसा लिखने के बाद तनवीर ने तीन मुस्कुराते हुए इमोजी कुंजा के मोबाइल की तरफ रवाना कर दिए।
जवाब में कुंजा ने एक बहुत जोर से रीझता हुआ इमोजी भेजा, जो कि अपने गालों पर विशेष लालिमा लिए हुए था। फिर कुंजा की उंगलियां दौड़ पड़ी और जवाब लिखा, “सभी भटके हुए बंजारों की एक ही मंजिल होती है बंधु, अगला सफर।”
बातों का वजन बढ़ता देख तनवीर ने ठिठोली की, “सफर अंग्रेजी का या हिंदी वाला?”
“यह तो आपकी प्रकृति पर निर्भर करता है,” कुंजा ने उत्तर दिया।
ऐसे सन्नाटों के मनकों की माला पिरोते-पिरोते दोनों ने चार घंटे निकाल दिए थे। अब भी दोनों की ट्रेन और फ्लाइट एक-एक घंटा दूर थी। तनवीर ने भारतीय पुरुष होने के नाते व्हाट्सऐप मैसेंजर पर फैली चुप्पी को तोड़ना अपना कर्तव्य समझा। यों भी गपियाते हुए तारीख बदल चुकी थी। आज 8 मार्च थी, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस। तनवीर के पास उसके जीवन में महिला पक्ष मौजूद नहीं था। लेकिन नीम रात में व्हाट्सऐप पर एक भद्र महिला से अपना एकांत साझा कर रहा था। ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस तुम्हें मुबारक हो कुंजा" ऐसा मैसेज बहुत देर से तनवीर की उंगलियों पर नाच रहा था। बहुत सोचने के बाद तीसरी बार उसने मैसेज डिलीट कर दिया।
तनवीर को अब भी आराम नहीं पड़ रहा था। वह कुंजा से संवाद स्थापित करना चाहता था, लेकिन कुंजा आकाशगंगा के न जाने किस तारे पर ध्यान रमाये बैठी थी आज। दोनों अपने अपने जीवन के बयालीस सावन खपा चुके थे। बयालीस सावन चुक जाने के बाद का अकेलापन पाषाण सा होता है। इस अकेलेपन की तासीर हलाहल विष समान होती है। यह अकेलापन झेलने वाले व्यक्ति का केवल कंठ ही नहीं, पूरा व्यक्तित्व नीला प्रतीत होता है। बहरहाल तनवीर ने एक बार फिर कुंजा को व्हाट्सऐप पर पूछा, “अब भी प्लेटफार्म पर अकेली हो क्या?”
इस बार कुंजा ने जो जवाब दिया, उस पर तनवीर से कुछ बोलते नहीं बना। कुंजा ने कहा, “वैसे तो सब लोग जिंदगी के हर प्लेटफॉर्म पर अकेले ही होते हैं…... फासले कभी-कभी कम होने की वजह से ऐसा लगता है कि हम साथ-साथ हैं, लेकिन हर कोई अपने अपने प्लेटफॉर्म पर अकेला ही खड़ा होता है, अपनी-अपनी ट्रैन पकड़ने के लिए।”
तनवीर अपनी नंगी हथेलियों पर रखी मोबाइल की स्क्रीन को बहुत देर तक देखता रहा, आंखों में नमी लिए। तनवीर को बहुत दिन बाद एहसास हुआ कि चोट गहरी लगे तो पत्थर में से भी आंसू फूट पड़ते हैं। तब तक तनवीर के नाम की उद्घोषणा हो चुकी था, यह बोर्डिंग की आखिरी उद्घोषणा थी। जवाबी मैसेज में तनवीर इतना ही लिख पाया, "अलविदा प्लेटफॉर्म"।
- विकास राजौरा

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