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सोमेश ने पूछा- गर्लफ्रेंड को कैसे पटाऊं:दीपांश बोला- मुझे इतना भाव मत दो, हवा का झोंका हूं, न जाने कब उड़ जाऊं

2 महीने पहले
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मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फिक्र को धुंए में उड़ाता चला गया…कॉलेज की कैंटीन में चाय की चुस्की की लेते दीपांश को मस्ती से गुनगुनाते देख उसके दोस्त बोले, ‘लो फिर शुरू हो गया' इसकी मस्ती का कोई जवाब नहीं। इस भागमभाग जिंदगी में न जाने हमारा यार कैसे 'रिलेक्स' रह लेता है। माना तू हर फिक्र को उड़ा देता है,पर यार सिगरेट तो पीता नहीं, फिर धुंए में कैसे उड़ाता है। सौरभ ने कहा तो सब हंसने लगे…

दीपांश ने चाय का कप हाथ में उठाते हुए बड़े तरन्नुम से कहा, ‘यह भी ठीक कहा' हर फिक्र को चाय की चुस्की…मसाला चाय की चुस्की के साथ उड़ाता चला गया और चीयर्स, चीयर्स, का शोर मचाते हुए सबने चाय के कप हाथ में उठा लिए।

रूमी ने अपनी टेबल से उठकर दीपांश के पास बैठते हुए कहा वाह! तेरी इस बात से तो मनोहर अंकल की मसाला चाय की डिमांड बढ़ जाएगी। मनोहर अंकल, इसी बात पर सबको मेरी तरफ से चाय पिलाओ और समोसा भी खिलाओ। दीपांश ने कहा।

अपनी जिंदादिली और शांत बने रहते हुए यूं ही चुटकियों में किसी की भी समस्या सुलझाने के कारण वह अपनी क्लास में ही नहीं, पूरे फर्स्ट ईयर के छात्रों के बीच लोकप्रिय हो गया था, पता नहीं कैसे हल होता था, उसके पास जटिल से जटिल चीजों का।

रूमी से दीपांश की अच्छी पटती थी। एक तो उन दोनों के घर बहुत दूर नहीं थे, इसलिए अक्सर एक साथ कॉलेज आते- जाते। कभी वह दीपांश के साथ मोटरसाइकिल पर, तो कभी दीपांश रूमी की मोपेड पर। रूमी के साथ केवल पढ़ाई पर ही नहीं, अन्य विषयों पर भी वह सहजता से चर्चा कर लेता था। उनकी दोस्ती कुछ इस तरह की थी कि दोनों बेझिझक एक-दूसरे से अपनी बात कह लेते और एक-दूसरे को जज भी नहीं करते।

अक्सर दीपांश रूमी को सखी कहकर बुलाता था और उसी की तर्ज पर वह उसे सखा। ंमैं तो कहता हूं 'हमारे मनोहर अंकल की कैंटीन खूब चले', सखी। आखिर कितने उन भूखों को वह भरपेट खाना खिलाते हैं, जो घर से खाना लाना अपनी तौहीन समझते हैं।

कैंटीन में जोरदार ठहाके लगने लगे। कुर्सी खींचकर सब दीपांश के चारों ओर एकत्र होने लगे। ‘‘मुझे इतना भाव मत दो। हवा का झोंका हूं, न जाने कब उड़ जाऊं।’’ उड़ जाना, पहले ये बता कि अपनी गर्लफ्रेंड को कैसे पटाऊं? सोमेश ने पूछा।

इस पर जबाव मिला ‘देख यार, पटाने जैसा ख्याल ही गलत है, उसकी बजाय उसे अपने प्यार का यकीन दिला, लेकिन तभी ऐसा करना जब सचमुच तू उसे चाहता हो। सिर्फ टाइम पास करने की बात है 'तो पटाने की भी जरूरत नहीं। थोड़ी-बहुत हवाबाजी करेगा तो दो-चार बातें वह कर लेगी।’

‘वाह गुरु तुम्हारा जवाब नहीं, मुकेश ने दीपांश के कंधे थपथपाते हुए कहा। उसकी निगाहें सबसे मजाक करते हुए भी रूमी के चेहरे पर चली जातीं। वह मजाक का हिस्सा जरूर बन रही थी, पर साफ लग रहा था कि कोई बात उसे परेशान कर रही है। वापस लौटते समय दीपांश ने मोटरसाइकिल रूमी का घर आने से पहले ही रोक दी।

‘कहो सखी, क्यों परेशान हो? कुछ है जो बताना चाहती हो?’ क्या कहूं दीपांश, मुझे तो बताते हुए भी शर्म आ रही है।’’ उसकी आंखों के कोर गीले हो गए थे। कह दे। मुझसे कहने में कब से हिचकिचाने लगी। मैं कुछ न भी कर पाऊं, पर सुन तो सकता हूं। कहने से दिल का बोझ हल्का हो जाता है, तू ही तो कहती है। ‘‘सामने वाले रेस्तरां में चलकर बैठते हैं, रूमी मोटरसाइकिल पर बैठते हुए बोली।

‘दो मसाला चाय और फ्रेंचफ्राइज,’ दीपांश ने ऑर्डर दिया तो पल भर को रूमी के होंठों पर मुस्कान थिरक गई। 'मेरा सखा सबसे न्यारा' कभी नहीं भूलता कि फ्रेंच फ्राइज मेरे फेवरेट हैं। चल पहले खा लूं, तो रिलेक्स होकर सब बताती हूं। उसके भोलेपन पर हंस पड़ा दीपांश। पल में तोला, पल में माशा, ऐसी ही है रूमी। उसकी सबसे अच्छी दोस्त!

पापा शादी करना चाहते हैं, फ्रेंचफ्राइज की प्लेट सफाचट करने के बाद, बहुत गंभीरता से रूमी ने कहा ‘‘तो?’’ ‘‘तुझे सुनकर हैरानी नहीं हुई?’’

‘‘क्यों होगी? यह तो अच्छी बात है। इसीलिए इतनी परेशान है? चाय पी, फिक्र को उड़ा दे। बुराई क्या है। उन्हें भी अपनी जिंदगी जीने का हक है। सिमरन को उसके पिता अपनी जिंदगी जीने के लिए कह सकते हैं, तो क्या तू अपने पिता को यह अधिकार, यह खुशी नहीं दे सकती?’’

‘‘आज लगता है सखा का दिमाग सही नहीं है। उसकी अक्ल में बात घुस नहीं रही है। पापा के जीवन में कोई आ गई है, वह भी मम्मी के जाने के 10 साल बाद। अब तक भी तो मम्मी की यादों के सहारे जी रहे थे। मेरी परवरिश पर सारा ध्यान केंद्रित था, पर अब वह आ गई है…घुसपैठ कर रही हैं, हमारी जिंदगी में। अनाधिकार प्रवेश…’’ गुस्से से उसका शरीर कांपने लगा था और आंखों में एक अजीब सा डर भी दिख रहा था।

‘‘मम्मी को बचपन में खो चुकी हूं, पापा को नहीं खोना चाहती,’’ उसके आंसू बहने को तैयार थे।

संभालो अपने आप को और सुनो सखी, उनको अकेलेपन को भी समझो। तुम अब इस काबिल हो गई हो कि अपना ध्यान रख सको। कुछ दिनों बाद हो सकता है और पढ़ाई करने या नौकरी के लिए तुम्हें विदेश या दूसरे शहर जाना पड़े, तब कोई तो होना चाहिए, उनका अकेलापन बांटने वाला। यह तो अच्छा है कि उनकी जिंदगी में कोई ऐसा आ गया है, जिसे वह चाहते हैं, जो उन्हें चाहती है। स्वार्थी मत बनो। दुनिया के बारे में मत सोचो। न ही शर्मिंदा हो। बस खुले मन से उनको समझो।’’

दोनों रेस्तरां से बाहर आ गए और सड़क किनारे खड़े होकर बात करने लगे। दीपांश उसे उलझन में छोड़कर नहीं जाना चाहता था, जबकि घर से दो बार उसकी मम्मी का फोन आ चुका था।

‘‘देखा तुमने। पापा कैसे बदल गए हैं, उनका एक भी बार फोन नहीं आया। शादी के बाद तो वह मुझे प्यार करना तक छोड़ देंगे। ‘‘तुम ज्यादा ही नहीं, गलत भी सोच रही हो। मां-बाप कभी अपने बच्चों से विमुख नहीं होते हैं। हो सकता है किसी काम में व्यस्त हों। सुनो सखी, मेरा दार्शनिक बनने का कतई मूड नहीं है। तुम जानती हो मैं तनाव को जेब में रखकर नहीं चलता और तुम्हें भी यही समझा रहा हूं। तुम्हें तो उन्हें सपोर्ट करना चाहिए। उनके निर्णय का सम्मान करना चाहिए। छोटी-सी बात है और पहाड़ बनाकर न जाने कब से घूम रही हो।’’

‘‘तो मैं क्या करूं?’’ ‘‘तुम उनका पितादान करो। उनकी शादी कराओ।’’

‘‘मतलब?’’ वह चौंकी। जैसे पिता कन्यादान करता है, तुम पितादान करो। और हां जब वे फेरे लें तो यह अवश्य कहना कि जाओ पापा जी लो अपनी जिंदगी। ‘‘सुनो सखा।’’ ‘‘कहो सखी।’’ ‘‘तुम टू मच हो। सच में धुंए में सब तनाव उड़ा देते हो।’’ ‘‘सुनो सखी।’’ ‘‘बोलो सखा।’’ ‘‘तुम भी कुछ कम नहीं। बेकार ही तनाव को पीठ पर लादे घूमती रहीं। चलो एक और मसाला चाय पीते हैं। ‘एक प्लेट फ्रेंच फ्राइज भी और खाऊंगी कह कर रूमी खिलखिला उठी।

- सुमन बाजपेयी

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