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E-इश्क:सच में स्मार्ट हो निराली, शादी मुझसे करोगी और जोकर उसे बनाकर रखोगी

6 महीने पहले
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बेंच पर बैठे थे दोनों। वही बेंच उनका मीटिंग प्वाइंट था। रेस्तरां या मॉल में मिलना या सड़कों पर घूमते हुए बतियाना दोनों को ही पसंद नहीं था। बेंच भी ऐसा जो पार्क के एक घने पेड़ के नीचे किसी राजा के सिंहासन की तरह सजा हुआ था। कुछ दिन पहले ही उसे वहां लगाया गया था। उसके नए पेंट की खुशबू अभी भी महकती थी। बस तब से दोनों का ठिकाना वही बन गया था। उनकी खुशकिस्मती थी कि जब भी आते वह उन्हें खाली ही मिलता।

पेड़ के नीचे बैठना उसे इसलिए पसंद है, क्योंकि जब बात करने का मन न हो और वह नाटक के बारे में कुछ सोचना चाहती हो या फिर मन ही मन संवादों को याद करना चाहती हो, तो वह पेड़ से गिरते पत्ते को उठाकर उसे हाथों में इस तरह उलटती-पलटती है, मानो उसकी चीड़-फाड़ कर रही हो। बेशक वनस्पति विज्ञानी नहीं है, पर साइंस स्टूडेंट तो रह चुकी है। चीड़-फाड़ करने की आदत स्वभाव में शामिल हो चुकी है। हालांकि बातों को कहने का अंदाज उसका कुछ निराला ही है, ठीक उसके नाम की तरह। जी, उसका नाम निराली है।

लंबे समय से पहचान होने और लगातार होने वाली मुलाकातों से अभय इतना तो निराली को जान ही गया था कि जब वह किसी दुविधा में होती है या उसके दिमाग में कोई उथल-पुथल चल रही होती है तो यूं ही पत्ते के साथ खेलती रहती है।

“मन के समुद्र में क्या लहरें उठा-पटक कर रही हैं निराली?” उसने पूछा। निराली नाम उसे इतना पसंद है कि कई बार प्रयोग करता है। शायद प्यार की दीवानगी का असर हो!

वैसे उसका भी अंदाज कुछ कम नहीं है। गंभीर से गंभीर बात हो तो भी शब्दों को चटखारे ले-लेकर कहता है। मानो गोलगप्पे का स्वाद ले रहा हो। तब सुनने वाले के होंठों पर मुस्कान आए बिना नहीं रहती है।

निराली ने उसकी हथेली पर पत्ता रखते हुए कहा, “खुद ही जान लो इसे देखकर।”

“हो हो हो... हा हा हा...” जोर से हंसा अभय।

“पत्ते की हालत देखकर तो लग रहा है आज फिर पांच पन्ने का लंबा भाषण सुनने को मिला है। बस यह बता दो कि मां ने दिया है कि बॉस ने। या फिर घर पर सबने तुम्हें चेताया है कि मुझसे न मिला करो। लेकिन मैं जानता हूं, तुम शादी तो मुझसे ही करोगी। देखो मेरा साथ न छोड़ना।”

इस बार निराली ने उसे घूरकर देखा। “शटअप अभय! हर समय शादी-शादी करते रहते हो। कहो तो इसी बेंच के चारों ओर फेरे लगा लेते हैं। वैसे आज किसी से भी भाषण सुनने को नहीं मिला। न मां से, न बॉस से, इस बार नए कैरेक्टर का आगमन हुआ है मेरी लाइफ में। इसी से खलबली मची हुई है।”

निराली ने एक और पत्ते की चीड़-फाड़ करनी शुरू कर दी थी।

बात करने के अंदाज में दोनों एक जैसे ही हैं। दोनों को सीधे-सीधे बात कहना आता ही नहीं है। और यह भी नहीं कि बात एकदम से कह दी जाए। शायद नाटक करते-करते असल जिंदगी में भी थोड़ी नाटकीयता घुल गई है। लेकिन दिखावा करना दोनों को नहीं आता। इसलिए और युगलों की तरह हाथ में हाथ डाल हमेशा आई लव यू नहीं कहते। उनकी लव स्टोरी भी उन्हीं की तरह अनोखी है। विश्वास और चाहत का घुला-मिला रूप है उनका प्यार।

“ओह नो, नया कैरेक्टर अब कौन आ गया? कोई योग्य बैचलर? तुम्हारे मम्मी-पापा अब किसे ढूंढ लाए?”

अभय बेंच पर से उठते हुए बोला जैसे किसी ने उसे जोर से चिमटी काट दी हो।

अब इतना भी हाईपर मत हो। बैठ जाओ,” निराली ने उसका हाथ पकड़ कर बैठा दिया।

बेंच भी मुस्करा उठा।

रोज-रोज ही तो सुनता है उनकी खट्टी-मीठी बातें। जिस दिन वे दोनों नहीं आते, कितना मिस करता है और पत्ते उस पर जमा होते रहते हैं।

“सस्पेंस ब्रेक करोगी या मैं जाऊं? बोरियत हो रही है। कह भी डालो।”

“मेरी भाभी का चचेरा भाई कल घर आया था। यहीं दिल्ली में रहता है। मेरी उससे कुछ खास पहचान नहीं है, होगी भी कैसे? मेरा क्या लेना-देना उससे। लेकिन उसे पता है कि मैं थियेटर करती हूं,” निराली ने पत्ता फिर से हाथ में ले उसकी चीड़-फाड करनी शुरू कर दी थी।

“तो वही है नया कैरेक्टर जिसका आगमन तुम्हारी लाइफ में हुआ है? तो इस बात से परेशान क्यों हो?” अभय उकता गया था, लेकिन फिर भी हिचकते हुए पूछ ही लिया उसने।

ना जाने निराली कैसे रिएक्ट करे।

“हां, अब सही समझे।”

चैन की सांस आई अभय को।

“दरअसल तुम में बिल्कुल पेशंस नहीं है। तुरंत सब कुछ जानना होता है,” निराली ने फटकारा।

“और पेशंस रखना किसे कहते हैं?” उसने मन ही मन सोचा और पत्ते को उलटने-पलटने लगा। शायद पत्ता समझ पा रहा हो कि आखिर निराली क्या बताना चाह रही है। उसका तो दिमाग काम नहीं कर रहा था।

“ओके, मैं समझ गया अब। तुम्हारे पेरेंट्स उससे तुम्हारी शादी करना चाहते हैं। तुमने अवश्य ही मना कर दिया होगा। कहीं हमारी लव स्टोरी का द एंड तो नहीं करने का मूड है तुम्हारा?” अभय इस बार सचमुच गंभीर हो गया था। निराली को खोने का डर उसे अक्सर सहमा जाता है। बेशक वे दोनों आम प्रेमी युगलों की तरह एक-दूसरे के लिए मर-मिटने की बातें नहीं करते, बेशक उनका प्यार थोड़ा अलग हटकर है, पर प्यार तो है…।

“तुम चुप ही रहो तो बेहतर है। एकदम फालतू बातें कर रहे हो। वह चाहता है कि मैं उसे अपने थिएटर ग्रुप में शामिल कर लूं,” निराली ने ऐसे बताया जैसे किसी बहुत बड़े राज का खुलासा कर रही है।

“सोच रही हूं क्या करूं? बस इसी उधेड़बुन में हूं। थोड़ा चिपकू किस्म का लगा मुझे। कोई भरोसा नहीं कि मम्मी-पापा ने उसे मेरे लिए पसंद किया हो और इस बहाने मुझसे मिलवाना चाहते हों। लेकिन मैं क्या कम स्मार्ट हूं…, कम से कम तुमसे तो ज्यादा हूं,” निराली मुस्कराई। उसके गालों पर पड़ने वाले डिंपल को झट से अभय ने चूम लिया।

“बुला लो उसे, देख लेंगे उसकी नौटंकी भी। पता चल जाएगा जनाब कितने महान कलाकार हैं,” अभय हंसा।

“बुलाया है। सोच रही हूं अपने नए नाटक में जोकर का पार्ट उसे दे दूं। वैसे भी वह किसी जोकर से कम नहीं लगता। अब चलोगे भी रिहर्सल के लिए कि नहीं? देर नहीं हो रही है क्या?,” वह उसे घूरते हुए बोली।

निराली आगे चल दी।

उसके पीछे अभय। लेकिन मन ही मन सोच रहा था, ‘सच में स्मार्ट हो निराली, शादी मुझसे करोगी और जोकर उसे बनाकर रखोगी। चलो कोई नहीं, मनोरंजन के लिए जोकर की जरूरत भी होती है।’

- सुमन बाजपेयी

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