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E-इश्क:कॉफी पीते उसे एहसास हुआ कि अदृश्य आकार और कोई नहीं मानस ही है, वह उसे पहचान नहीं सकी थी

6 महीने पहले
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जनवरी का मौसम और सूरज देवता का दर्शन न देना। बस मिल गया बहाना मानस को रजाई में मुंह ढांपे पड़े रहने का। लेकिन बाहर कोहरा छाया हो तो उसका मन करता है कि कहीं घूमने निकल जाए। कार में सड़कें ही नाप ले, वरना कनाट प्लेस के गलियारे में ही चक्कर काटती रहे। यह मौसम उसे वैसे भी बहुत लुभाता है। ठंड पड़ी नहीं कि कैसे-कैसे सपने आकार लेने लगते हैं। किसी के हाथ में हाथ डाले कभी कॉफी, तो कभी सूप पीते और कभी गर्म-गर्म आलू की चाट खाते कनाट प्लेस के चक्कर काटे। उसके गलियारों के खंभों को गिने। पर ऐसे सपने फिल्मों में तो सच हो जाते होंगे, वास्तविक जिंदगी में नहीं होते। उसकी जैसी न जाने कितनी शुभदा होंगी जो किसी के हाथ की तपिश पाने के लिए, प्यार का अहसास महसूस करने के लिए ललक रही होंगी। फिर वह शुभदा ब्याहता हो या कुंआरी क्या फर्क पड़ता है। जरूरत तो होती है एक साथी की।

एक शादीशुदा शुभदा अकेलापन नहीं महसूस करती है, ऐसा कोई नियम तो नहीं है। बंधन की तपिश कई बार इतनी सुखद नहीं होती जो उष्मा दे सके। क्या करे वह, मौसम ही ऐसा है कि मन भटकने लगता है। ऑफिस से छुट्टी ली है। सोचा था समर के स्कूल जाने के बाद मौसम का लुत्फ उठाएगी। नहीं, अकेले नहीं, बल्कि मानस के साथ। पर हर बार की तरह इस बार भी उसकी सोच पानी के बुलबुले की तरह साबित हुई। सैर से वापस आकर मानस रजाई में घुस गए थे। थोड़ी देर में खर्राटों की आवाज गूंजने लगी थी।

हालांकि यह कोई नई बात नहीं थी। रात का हैंगओवर सुबह दुबारा सोकर ही उतारा जा सकता है। झुंझलाहट से भरी शुभदा सारा काम छोड़ बालकनी में जाकर बैठ गई। ऑफिस जाने वालों की आवाजाही थी। हर तरफ एक शोर था। व्यस्तता चहलकदमी करती प्रतीत हो रही थी। वहां भी अच्छा नहीं लगा तो अपने कमरे में आकर सिमट गई। हां, उसके और मानस के अलग-अलग कमरे हैं। पति-पत्नी-पर कमरे अलग। क्या फर्क पड़ता है, वैसे भी आपस में संवाद ही कितना है। मानस उसकी संवेदनशीलता को मूर्खता का दर्जा देता है। उसको किस बात से ठेस लग सकती है इसकी वह कभी परवाह नहीं करता। आठ बरसों के वैवाहिक जीवन में उसने कभी पूछा तक नहीं कि शुभदा तुम्हारी क्या इच्छा है? यहां तक कि उसकी पसंद, उसे कौन-सा रंग अच्छा लगता है, यह भी कभी गौर करने की कोशिश नहीं की। उसकी पसंद की सब्जी के बारे में भी नहीं जानता है। अब तो वह भी भूल गई है कि उसकी अपनी भी कोई पसंद है या इच्छाएं रखने का हक उसे भी है। अपनी पसंद-नापसंद उसके लिए कोई मायने नहीं रखती। मानस, समर, बस इन दोनों के इर्दगिर्द ही घूमती रहती है उसकी दुनिया।

हाथ में हाथ डाल घूमने का सपना तो कभी पूरा नहीं हो सकता, फिर भी शुभदा ने सपने देखना नहीं छोड़ा है। एक अदृश्य आकार के साथ वह इन सपनों में जी लेती है। उसके साथ दुख-सुख बांटती है और अहसासों की उष्मा को सहेजते रहती है। उसी के सहारे वह मानस के कटाक्षों को झेल पाती है। शुभदा यह भी नहीं जानती कि उस आकार को कभी वह साकार होते भी देख पाएगी कि नहीं, लेकिन एक निराधार विश्वास उसके सपनों को टूटने से बचाता है। वे सपने हैं, जिनमें वह अपने आप ही गुनगुनाती है, उसका मन तब हिलोरें लेने लगता है और अल्हड़ युवती की तरह वह भीतर ही भीतर उन्मुक्तता से छलांगें लगाती है, मानो लहलहाते, झूमते खेतों के बीच दौड़ रही हो।

वह सिर्फ जीना चाहती है। मानस का साथ मिलता है तो ठीक है, वरना अदृश्य आकार के साथ वह घंटों बातें करते हुए बिता देती है। यह संवाद कोई नहीं सुन पाता, लेकिन उसके मन का बोझ हल्का हो जाता है। कभी हैरान होता है मानस उसके व्यवहार पर। “पता ही नहीं चलता कब उदास हो, कब खुश? तुम्हें समझना मुश्किल है। मन ही मन न जाने क्या सोचती रहती हो?”

“तुम मेरी बात सुनो तो मन से संवाद करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।” शुभदा ने संकेत दिया था।

“मैं पागल हूं जो तुम्हारी बेसिर-पैर की बातें सुनूंगा। सेंटीमेंटल फूल हो तुम।”

पति-पत्नी को एक-दूसरे की आदत पड़ जाती है, इसलिए रिश्ता चलता रहता है। बस अपने आपको बदलते-बदलते जिंदगी खत्म हो जाती है।

“अरे, एक कप चाय मिलेगी,” मानस का स्वर गूंजा।

बहुत बेमन से शुभदा उठी। चाय देकर वापस घूमी ही थी कि मानस ने हाथ पकड़ लिया। “जा कहां रही हो, बैठो ना यहां,” रजाई उसके ऊपर डाल बांह उसके कंधे पर रख मानस ने उसे अपने पास खींचा।

“क्यों रहती हो इतनी उदास? हंसा करो, आखिर किस बात की टेंशन है तुम्हें?” मानस का प्यार भरा स्पर्श और मीठे बोल पिघला गए उसे। आंखें नम हो गईं।

“बस यही दिक्कत है तुम्हारे साथ, जरा-सा प्यार कर दो तो रोने लग जाती हो। बहुत भोली और प्यारी हो तुम, पर न जाने क्यों बीच-बीच में इतनी कठोर हो जाती हो। जानता हूं, मेरे पीने से परेशान रहती हो। पर सच तो यह है कि इस आदत को भी तुम्हीं छुड़ा सकती हो। मुझ पर पाबंदी लगाना बंद कर दो। कहो जितनी पीनी है घर में पीओ। फिर देखना, अपने आप छूट जाएगी। तुम्हारी रोक-टोक मुझे ज्यादा पीने के लिए उकसाती है।”

“मैं कोशिश करती हूं, पर शराब देखते ही मेरा दिमाग झन्ना जाता है। तुम जानते हो ना, मेरे भाई की मौत का कारण यही शराब थी।”

“अब हर पीने वाला समय से पहले चला जाए, ऐसा तो मुमकिन नहीं।” मानस ने उसे चूमा। वह जानती है कि मानस दिल के बुरे नहीं हैं, उसे प्यार भी बहुत करते हैं, पर सोच टकरा जाती है। उसकी संवादहीनता उसे चिढ़ाती है। दिल की बात कहने में हर्ज क्या है। सब कुछ अपने भीतर रखो, यह सिद्धांत रिश्ते में दरार ही पैदा करता है।

“मैं ऐसा ही हूं। प्रैक्टिकल होना जरूरी है, कल्पना से गृहस्थी नहीं चलती। ये लंबे-चौड़े बिल, फीस और बढ़िया लाइफ स्टाइल मेंटेन करने की कोशिश में कल्पनाएं बीहड़ जंगलों के सिवाय और कुछ नहीं लगतीं। प्यार है तो क्या दिनरात इसका ढिंढोरा पीटना जरूरी है? तुम खुद इतनी पढ़ी-लिखी और सुलझे विचारों की हो, न जाने कभी-कभी तुम्हारे भीतर फिजूल की बातें क्यों हावी हो जाती हैं। क्या नहीं है हमारे पास, फिर हमेशा तुम यह क्यों दिखाती हो कि कहीं कुछ कमी है।”

शुभदा उठ गई। शायद वही गलत है। उसका अदृश्य आकार के साथ एक अविश्वसनीय दुनिया बनाने का खयाल भी असंगत है।

पर यह कमबख्त मौसम उसे उलझाए जा रहा है।

“मौसम परेशान कर रहा है?”

मानस की बात सुन चौंकी शुभदा। तो वह उसके दिल की बात समझता है। वह तो यही समझती आई थी कि मानस उसके मन की उथल-पुथल से हमेशा अनजान रहता है। हो सकता है जानता हो, पर कहा न हो, फिर वही संवादहीनता।

चुप रही शुभदा। अदृश्य आकार छू रहा था उसके मन को। झटकना चाहा पर हटा नहीं। उदासी की परतें पलकों पर पहुंच गई थीं।

“मैं सोच रहा हूं कि आज जाऊं ही नहीं।”

शुभदा अवाक रह गई। मानस का यह रूप बिल्कुल अलग था। अगर वह कहीं घूमने की बात करती, तो वह कहता कि काम कौन करेगा। पर क्या उसने कभी मानस को समझने की कोशिश की। उसके प्रति कभी पूरे मन से समर्पित नहीं हो पाई थी शुभदा। हर बार बीच में वह अदृश्य आकार होता था।

“नाश्ता लगा दूं?”

“नहीं रहने दो। आज कनाट प्लेस चलते हैं, वहीं ब्रेकफास्ट और लंच करेंगे।”

“पर समर?”

“चाबी पड़ोस में दे दो। और अपनी दीदी को फोन कर दो। वह आ जाएंगी। चार-पांच बजे तक तो हम भी लौट आएंगे।”

समाधान झट से निकाल लेता है मानस।

कनाट प्लेस के गलियारे में मानस के हाथ में हाथ डाले आलू की चाट खाते और कॉफी हाउस में कॉफी पीते उसे एहसास हुआ कि वह अदृश्य आकार और कोई नहीं है, उसका चेहरा तो मानस से बहुत मिलता है। नहीं मिलता नहीं, यह तो मानस का ही चेहरा है। वही पहचान नहीं सकी थी अब तक। मानस के हाथों की तपिश उसके सारे शरीर को उष्मा दे रही थी। सपने रूप ले रहे थे। अदृश्य आकार कहीं लुप्त हो गया था।

- सुमन बाजपेयी

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