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दोबारा स्कूल जाने की घबराहट:स्कूल के तौर-तरीके भूल चुके बच्चों को सोशलाइजिंग का डर सबसे ज्यादा, एंग्जायटी दूर करने के लिए पेरेंट्स इस तरह बच्चों से करें बात

4 महीने पहले
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लॉकडाउन की वजह से कई देशों में बंद हुए स्कूल अब धीरे-धीरे खुलने लगे हैं। घरों में बंद कुछ बच्चों ने अब दोबारा स्कूल जाना शुरू कर दिया है, तो कुछ बच्चे थोड़े दिन बाद जाना शुरू करेंगे। कई बच्चों के लिए दोबारा स्कूल जाना खुशी की बात है, लेकिन कुछ बच्चों में इसका उल्टा असर भी देखने को मिल रहा है। घरों में कई महीनों से बंद ये बच्चे दोबारा स्कूल जाने को लेकर परेशान हैं। उनमें एंग्जायटी की समस्या सामने आ रही है।

कंसल्टेंट साइकोलॉजिस्ट डॉ. प्रज्ञा रश्मि कहती हैं कि करीब डेढ़ साल से बच्चे घर पर हैं तो अब उन्हें सबसे ज्यादा चिंता सोशलाइजिंग की हो रही है। बच्चों में एंग्जायटी की सबसे बड़ी वजह है कि वो पुराने तौर-तरीकों को भूल चुके हैं, ऐसे में उन्हें लगता है कि क्या टीचर उन्हें समझ पाएंगी, क्या वो फिर से अपनी टीचर के फेवरेट बन पाएंगें? ऐसे ही कई सवाल बच्चों के मन में उठ रहे हैं जैसे..

  • मुझे असेंबली के तौर तरीके याद नहीं, अपनी क्लास और सीट याद नहीं तो कहीं इसके लिए टीचर मुझे पनिशमेंट तो नहीं देंगी?
  • पुरानी क्लास टीचर बदल गई हैं और नई क्लास टीचर को अब तक सिर्फ ऑनलाइन देखा है, उनसे कभी मिले नहीं, तो क्या वो हमें समझ पाएंगीं?
  • स्कूल में टीचर मेरे व्यवहार या फिर मेरे नॉलेज से खुश होंगी? जैसे ऑनलाइन क्लासेज से पहले टीचर हुआ करती थीं?

डॉ. प्रज्ञा कहती हैं कि इस तरह की बातें जो बड़ों के लिए काफी आम हैं, वो भी बच्चों में एंग्जायटी की वजह बन रही हैं। इस पर शुरुआत से ध्यान नहीं दिया गया तो यह आगे चलकर बच्चों के लिए हानिकारक साबित हो सकती हैं। इसलिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों पर ध्यान दें और उन्हें समझने की कोशिश करें, उनके डर से उन्हें बाहर निकालने की कोशिश करें। पेरेंट्स बच्चों को यह समझाएं कि जैसे हम ऑफिस जा रहे हैं वैसे ही तुम्हें भी अब रोज स्कूल जाना है, और यह कोई मुश्किल बात नहीं है।

यदि आप भी इस बात को लेकर परेशान हैं कि बच्चे को स्कूल के माहौल में फिर से ढलने में परेशानी हो सकती है, तो इन तरीकों से आप बच्चे की मदद कर सकते हैं…

बच्चा क्या महसूस कर रहा है, ये जानने की कोशिश करें

डॉ. प्रज्ञा कहती हैं कि अपने बच्चे से पूछें कि वह स्कूल वापस जाने के बारे में कैसा महसूस कर रहा है। उसमें सिरदर्द, पेट दर्द, नींद की परेशानी, लगातार ‘‘क्या होगा’’ का सवाल मन में उठना, चिड़चिड़ापन, स्कूल के काम पर ध्यान केंद्रित करने में समस्याएं और लगातार समझाने के बावजूद चिंताएं कम न होना जैसी बातों पर पेरेंट्स को नजर रखने की जरूरत है।

  • पेरेंट्स बच्चों को यह बताएं कि आपको पता है कि यह मुश्किल हो सकता है, क्योंकि अब उन्हें घर पर रहकर ही पढ़ने की आदत हो चुकी है। बहुत सारी ऐसी चीजें होंगी जिसके बारे में बच्चों को पता नहीं होगा, लेकिन उन्हें यह सब फिर से करना है।
  • पेरेंट्स बच्चों को यह समझाने की कोशिश करें कि यह इतना मुश्किल भी नहीं है, ‘यू कैन डू इट’, इसे आसानी से किया जा सकता है।
  • बच्चों को यह समझाएं कि कोई भी नया काम करने से पहले बड़े भी नर्वस होते हैं, उन्हें भी एंग्जायटी होती है। इसलिए जब भी ऐसा लगे तो लंबी सांस (डीप ब्रेथ) लें और दिमाग को शांत करें।

बच्चे के सामने स्कूल या टीचर को लेकर कोई निगेटिव बात न कहें

दोबारा स्कूल जाने और टीचर से मिलने को लेकर बच्चे वैसे भी चिंतित हैं। ऐसे में पेरेंट्स के लिए यह जरूरी है कि वो स्कूल से जुड़ी कोई भी निगेटिव बात बच्चों को सामने न करें। जैसे कि स्कूल मैनेजमेंट खराब है या टीचर गलत पढ़ाती हैं या ऐसी कोई भी बात बच्चों के सामने न करें।

बच्चे के साथ समय बिताएं और उसे महसूस करने दें कि आप उसे समझते हैं

बच्चों का अपने परिवारों के साथ जो भावनात्मक जुड़ाव होता है, वह मुश्किल समय में उनका मनोवैज्ञानिक सहारा होता है। ऐसे समय में जब रोजमर्रा की जिंदगी में बहुत कुछ बदल गया है, परिवार के साथ समय बिताना अनिश्चितता को दूर कर सकता है। इसलिए साथ में वॉक करें, साथ में डिनर करें, बोर्ड गेम खेलें।

बच्चे को फिर से पुराने रूटीन को अपनाने में मदद करें

बच्चों में लॉकडाउन का सबसे बड़ा असर यह देखने को मिला है कि रूटीन बदलने के साथ ही उनके जीवन से डिसिप्लिन भी चला गया है। जैसे कि ऑनलाइन क्लास शुरू होती है तो बच्चे कई बार बिना ब्रेकफास्ट ही क्लास करने लगते हैं। बच्चे टाइम के पाबंद नहीं रहे क्योंकि उन्हें स्कूल बस की चिंता नहीं है, स्कूल यूनिफॉर्म कहां रखी है उन्हें यह भी पता नहीं है। इसलिए जरूरी है कि पेरेंट्स अब बच्चों को धीरे-धीरे उनके रूटीन में वापस लाने की कोशिश करें, क्योंकि इससे उनके विकास में हानि हो रही है।

बच्चा परेशान हो तो उसका ध्यान बंटाने की कोशिश करें

ध्यान बंटाना चिंता का इलाज नहीं है, लेकिन यह तरीका चिंता को कम कर सकता है। साथ ही परेशानियों को समझने, उनके बारे में सोचने में भी बच्चे की मदद कर सकता है। जब बच्चे बहुत चिंतित महसूस कर रहे हों, तो उन्हें बताएं कि कोई अट्रैक्टिव शो देखना, या एक मजेदार किताब पढ़ना, उन्हें शांत महसूस करने में मदद कर सकता है।

बच्चे के सामने बार-बार महामारी के दौरान क्या हुआ, इस बारे में बात न करें

डॉ. प्रज्ञा कहती है कि जिस तरह विश्व युद्ध के बाद होलोकास्ट का इफेक्ट काफी लंबे समय तक था। उसी तरह कोरोना महामारी का इफेक्ट भी लंबे समय तक दिखेगा, लेकिन बच्चों के सामने बार-बार इस बारे में बात नहीं करनी चाहिए कि इसकी वजह से कितने लोगों की जान चली गई। लोग कितने ज्यादा परेशान हुए, घरों में बंद रहे, जो लोग ठीक हुए उन्हें भी कितनी परेशानियां झेलनी पड़ीं। ये सारी बातें सुनकर बच्चे और ज्यादा परेशान होने लगते हैं, इसलिए जरूरी है कि उनके सामने पास्ट के बारे में बात न करें।