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कोरोना की दवा दे गई धोखा:जरा-सी खराश को कोरोना समझकर एजिथ्रोमाइसिन खाने वालों के लिए खबर, इस दवा से कोविड मरीजों को कभी फायदा नहीं हुआ

2 महीने पहले
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आप अगर कोरोना के इलाज में इस्तेमाल दवाओं के बारे में थोड़ा-बहुत भी जानते हैं तो एजिथ्रोमाइसिन का नाम जरूर सुना होगा। जरा सी खराश हो या कोरोना संक्रमित का इलाज, डेढ़ साल पहले कोरोना फैलने के बाद से ही एजिथ्रोमाइसिन दवा का जमकर इस्तेमाल हुआ।

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया और स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी की महत्वपूर्ण रिसर्च में पता चला है कि कोरोना के इलाज में एजिथ्रोमाइसिन के इस्तेमाल से किसी तरह का कोई फायदा नहीं हुआ। असर के नाम पर यह सिर्फ एक प्लेसिबो की तरह काम कर रही थी। यानी यह गोली खाने के बाद मरीजों को केवल लगता है कि उन्हें आराम मिला है, जबकि ऐसा होता नहीं है।

एजिथ्रोमाइसिन एक ब्रॉड-स्पैक्ट्रम एंटीबायोटिक है। यानी यह ऐसा एंटीबायोटिक है जिसका इस्तेमाल कई तरह के बैक्टीरियल इन्फेक्शन को खत्म करने में होता है। हालांकि डॉक्टर आमतौर पर इसका इस्तेमाल ऊपरी श्वसन तंत्र के इन्फेक्शन, पेशाब की नली के इन्फेक्शन और टाइफाइड के इलाज में करते हैं।

बिना डॉक्टरी सलाह के धड़ल्ले से बिकती है एजिथ्रोमाइसिन
एजिथ्रोमाइसिन आम लोगों के बीच भी इतनी मशहूर एंटीबायोटिक है कि गले में जरा सा इन्फेक्शन होते ही ज्यादातर लोग खुद ही मेडिकल स्टोर से तीन टैबलेट की स्ट्रिप लेकर खाने लगते हैं। भारत में बिना डॉक्टरी सलाह के ही लोगों को एंटीबायोटिक थमा देने वाले मेडिकल स्टोर्स ने एजिथ्रोमाइसिन को घर-घर की दवा बना डाला। जबकि यह शेड्यूल H में आने वाली दवा है, जिसे बिना डॉक्टरी सलाह के बेचा नहीं जा सकता।

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी ने ऐसे की रिसर्च
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने कुल 263 वॉलंटियर्स को चुना। इनमें से 171 को एजिथ्रोमाइसिन टैबलेट की सिंगल डोज दी गई। वहीं 62 लोगों को उस जैसी प्लेसिबो गोली दी गई।

रिसर्चर कैथरीन ओलडनबर्ग और उनके साथियों के मुताबिक असल में जिन मरीजों को एजिथ्रोमाइसिन दी गई, 14 दिन बाद उनके लक्षणों में प्लेसिबो गोली खाने वाले मरीजों के मुकाबले कोई भी सुधार नहीं था।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी पहले सिफारिश की थी, अब प्रोटोकॉल से हटाया
भारत में महामारी शुरू होने के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपने प्रोटोकॉल में कहा कि कोविड-16 के खिलाफ कोई भी एंटीवायरल ड्रग असरदार साबित नहीं हुआ है। ऐसे में मंत्रालय ने कोरोना के गंभीर मरीजों के इलाज के लिए डॉक्टरों को एजिथ्रोमाइसिन के साथ हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का इस्तेमाल करने की इजाजत दी थी।

  • तीन महीने पहले कुछ राज्यों के स्वास्थ्य विभागों ने अपनी गाइडलाइन में होम आइसोलेशन में रहने वाले मरीजों को एजिथ्रोमाइसिन देने की सलाह शामिल की थी।
  • इस साल मई में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर जारी कोविड-19 के क्लिनिकल मैनेजमेंट प्रोटोकॉल में एजिथ्रोमाइसिन को शामिल नहीं किया गया।
  • अप्रैल में एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया ने कहा कि हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन और एजिथ्रोमाइसिन के पक्ष में डेटा नहीं है और ज्यादातर गाइडलाइंस में एजिथ्रोमाइसिन शामिल नहीं।

कोरोना पर एजिथ्रोमाइसिन के असर को लेकर विशेषज्ञों की राय

  • कोविड-19 पर क्लिनिकल रिसर्च के लिए काम कर रही नेशनल टास्क फोर्स के सदस्य डॉ. संजय पुजारी का कहना है कि कई नियंत्रित ट्रायल में साबित हो चुका है कि एजिथ्रोमाइसिन कोरोना के इलाज में असरदार नहीं है, यही वजह है कि अस्पताल में भर्ती मरीजों के मामले में इसका इस्तेमाल कम हुआ है।
  • पुणे डिवीजन के लिए बनाई गई खास टास्क फोर्स के प्रमुख डॉ. डीबी कदम का कहना है कि एजिथ्रोमाइसिन का दिल पर साइडइफेक्ट भी पड़ सकता है, इसलिए ही इसका इस्तेमाल बंद कर दिया गया है।

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स कहना है कि कोरोना महामारी के दौरान एंटीबायोटिक दवाओं के बहुत ज्यादा इस्तेमाल से इनके खिलाफ प्रतिरोध में बढ़ोतरी हो सकती है। साफ तौर पर बिना किसी बैक्टीरियल इंफेक्शन के एजिथ्रोमाइसिन का व्यापक इस्तेमाल लोगों में इसको लेकर प्रतिरोध पैदा कर सकता है।

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