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ग्लोबल NCAP रेटिंग का खेल:क्रैश टेस्ट रेटिंग में मारुति की कारें फेल, फिर भी टॉप-10 में 7 मॉडल शामिल; एक्सपर्ट ने बताई इसकी वजह

2 महीने पहलेलेखक: नरेंद्र जिझोतिया
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कार खरीदने के दौरान लोग सेफ्टी रेटिंग का कितना ध्यान रखते हैं? इस सवाल का जवाब शायद कार खरीद चुके कई लोगों के पास नहीं हो। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि सबसे ज्यादा बिकने वाली टॉप-10 कारों में मारुति के सबसे ज्यादा मॉडल होते हैं। नवंबर में टॉप-10 में मारुति के 7 मॉडल शामिल थे। इनमें से ज्यादातर मॉडल को ग्लोबल NCAP ने जीरो रेटिंग दी है। मारुति की अर्टिगा ऐसी कार है जिस 3-स्टार रेटिंग मिली है।

NCAP रेटिंग के हिसाब से मारुति की कारें सुरक्षित नहीं हैं। तो फिर क्या वजह है कि इसकी कारों की डिमांड कम होने का नाम नहीं ले रही। क्या NCAP रेटिंग कार खरीदने के लिए कोई मायने नहीं रखती? या फिर लोगों को कार सेफ्टी से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। इन तमाम बातों को यूट्यूबर और ऑटो एक्सपर्ट अमित खरे (आस्क कारगुरु) समझा रहे हैं।

सबसे पहले समझिए NCAP क्रैश टेस्ट कैसे होता है?
NCAP द्वारा लगभग सभी कंपनियों की कारों का क्रैश टेस्ट किया जाता है। इस टेस्ट के लिए कार में डमी का इस्तेमाल किया जाता है। इस डमी को इंसान की तरह तैयार किया जाता है। टेस्ट के दौरान गाड़ी को फिक्स स्पीड से किसी हार्ड ऑब्जेक्ट के साथ टकराया जाता है। इस दौरान कार में 4 से 5 डमी का इस्तेमाल किया जाता है। बैक सीट पर बच्चे की डमी होती है। ये चाइल्ड सेफ्टी सीट पर फिक्स की जाती है। क्रैश टेस्ट के बाद कार के एयरबैग ने काम किया या नहीं? डमी कितनी डैमेज हुई? कार के सेफ्टी फीचर्स ने कितना काम किया? इन सब के आधार पर रेटिंग दी जाती है।

ग्लोबल NCAP क्रैश टेस्ट को लेकर अमित खरे ने बताया कि सरकार की तरफ से इस क्रैश टेस्ट को वैलिड नहीं माना गया है। इस वजह से जिन कंपनियों की कारों को NCAP द्वारा कम रेटिंग दी जाती है उन्हें भी कोई फर्क नहीं पड़ता। उनके लिए ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) का टेस्ट ज्यादा मायने रखता है, क्योंकि ये संस्था बिना किसी भेदभाव के टेस्ट को कंडक्ट करती है।

सरकार ने अभी किसी को क्रैश टेस्ट की परमिशन नहीं दी
अमित ने बताया कि ग्लोबल NCAP टुवर्ड्स जीरो फाउंडेशन का हिस्सा है। ये ब्रिटेन की एक चैरिटी ऑर्गनाइजेशन है। इसके चेयरमैन कभी भारत के खिलाफ थे। भारत के क्रैश टेस्ट सिस्टम का नाम भारत न्यू व्हीकल सेफ्टी असेसमेंट प्रोग्राम (BNVSAP) है। ये 2018 में शुरू होना था, लेकिन किसी वजह से ये शुरू नहीं हो पाया। ये वैसा ही प्रोग्राम है जैसा भारत में पहले से मौजूद ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) कर रहा है। BNVSAP जिन सॉफ्टवेयर पर काम करेगा वो NCAP से ही खरीदे जाएंगे। तब तक भारत सरकार की तरफ से किसी को भी इस बात की परमिशन नहीं दी गई है कि वो क्रैश टेस्ट कंडक्ट करे। ऐसे में ग्लोबल NCAP अपनी पर्सनल एबिलिटी पर बाजार से कारों के बेस वैरिएंट को खरीद कर पर्सनली उनका टेस्ट करती है।

जब ग्लोबल NCAP के क्रैश टेस्ट रेटिंग को लोग समझने लगे और इसका असर कार कंपनियों पर होने लगा, तब कुछ कंपनियों ने NCAP से कॉन्टैक्ट किया। ऐसे में उन कंपनियों ने NCAP को पैसे देकर टेस्ट कंडक्ट कराया। इस टेस्ट को वो वॉलेंटियर टेस्ट का नाम देने लगे। इस टेस्ट की खास बात ये होती है कि क्रैश टेस्ट का सारा खर्च कार बनाने वाली कंपनी उठाती है। इस टेस्ट में पैसों के लेन-देन से कार की रेटिंग बेहतर हो जाती है। यानी NCAP द्वारा ये एक तरह की ब्लैकमेलिंग हो जाती है, जिसमें पहले नंबर्स कम दिए जाते हैं। बाद में पैसे देकर नंबर बढ़ा दिए जाते हैं। यही वजह है कि देश की कई कंपनी इस टेस्ट को सपोर्ट नहीं करतीं।

ग्लोबल NCAP कार के बेस वैरिएंट को खरीदने के बाद उन्हें इंग्लैंड और जर्मनी की लैब में ले जाती है। बेस वैरिएंट में बहुत सारे सेफ्टी फीचर्स नहीं होते हैं इस वजह से उनकी रेटिंग जीरो से लेकर 2 स्टार तक जाती है। वहीं, वॉलेंटियर टेस्ट के दौरान कंपनी कार का टॉप वैरिएंट टेस्ट करती है। ऐसे में सेफ्टी फीचर्स बेहतर होने की वजह से उसे बेहतर रेटिंग मिलती है। जबकि NCAP को सभी कंपनियों के बेस या टॉप मॉडल का टेस्ट करना चाहिए। टाटा और महिंद्रा की गाड़ियों की बेहतर सेफ्टी रेटिंग में वॉलेंटियर टेस्ट शामिल होते हैं। इसे 3 बातों से समझें...

  • 1. टाटा जेस्ट को ग्लोबल NCAP ने क्रैश टेस्ट किया तो सबसे पहले उसे जीरो रेटिंग दी गई। बाद में उसके एयरबैग मॉडल का क्रैश टेस्ट किया गया तब उसे 4-स्टार रेटिंग दे दी गई।
  • 2. टाटा नेक्सन के पहले टेस्ट हुए मराजो और ब्रेजा के साथ। तब तीनों कारों को 4-स्टार रेटिंग दी गई। बाद में टाटा ने सारा खर्च उठाकर नेक्सन का फिर से टेस्ट कराया, तो उसे 5-स्टार रेटिंग मिल गई।
  • 3. टाटा ने बाद में उस सेफ्टी रेटिंग के कॉपी राइट खरीदे और उसे नेक्सन पर लगाकर बेचा। उसके लिए कॉपी राइट फीस भी ग्लोबल NCAP को दी गई।