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शेखर गुप्ता का कॉलम:साधनहीन युवाओं को लग रहा है कि अग्निपथ योजना उनसे उनका ‘यूपीएससी’ छीन रही

3 महीने पहले
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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Money Bhaskar
शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

सरकार की ‘अग्निपथ’ योजना के विरोध का नेतृत्व भारत में बेरोजगार युवाओं की खतरनाक रूप से बढ़ती आबादी कर रही है, खासकर हिंदी पट्टी की। ये युवा इस योजना की समस्या को अनुभवी सैनिकों से ज्यादा बेहतर तरीके से समझते हैं। वे इसे सेना में रोजगार पैदा करने के नहीं बल्कि रोजगार खत्म करने के उपाय के रूप में देख रहे हैं। वे राजनीति में आकंठ डूबे और ध्रुवीकृत क्षेत्र से आते हैं।

वे यह भी जानते हैं कि रोजगार बाजार किस कदर निराशाजनक है। वे देख रहे हैं कि वे जहां रहते हैं वहां अवसर शून्य हैं और दूर के जिन स्थानों में अवसरों की बाढ़ है, वहां के रोजगारों के लिए उनके पास हुनर नहीं है। रेलवे हो या राज्य सरकारें या पुलिस, तमाम सरकारी नौकरियों में रोजगार की आजीवन सुरक्षा और बेहतर वेतन की गारंटी है। सेना की नौकरी इनमें सबसे अच्छी है।

इन युवाओं को इस आधार पर मत आंकिए कि वे ट्रेनें जलाते हैं। वे हमारी सहानुभूति के उतने ही हकदार हैं, जितने वे लाखों युवा हैं, जो यूपीएससी के लिए मेहनत करते हैं और कॉम्पीटिशन एकेडमी उद्योग में साल-दर-साल पैसे झोंकते हैं। साधन और शिक्षा से कमजोर, सिर्फ मैट्रिक पास युवाओं के लिए सेना में भर्ती वही महत्व रखती है, जो महत्व यूपीएससी उन युवाओं के लिए रखती है, जिनकी तस्वीरें अखबारों के पहले पन्ने पर विज्ञापनों के साथ छपती हैं। इन युवाओं की तरह वे भी सेना में भर्ती की तैयारी करते हैं।

कम साधन वाले इन युवाओं को लग रहा है कि ‘अग्निपथ’ योजना उनसे उनका यूपीएससी छीन रही है। इसे इस तरह से देखिए। मान लीजिए कि यूपीएससी की परीक्षाएं कोविड की वजह से दो साल नहीं हुईं जबकि लाखों युवा उम्मीद के साथ इसकी तैयारी करते रहे। इसके बाद आप यह घोषणा कर दें कि इन सेवाओं में केवल चार साल के लिए नियुक्ति होगी और नियुक्त लोगों में से 25 फीसदी को ही पूरे सेवाकाल के लिए रखा जाएगा।

तुलना में समानता लाने के लिए आप सिविल सेवाओं के लिए अधिकतम उम्र सीमा भी कम कर देते हैं ताकि इनमें युवा खून का संचार हो। अब दो साल से तैयारी कर रहे युवाओं की बदकिस्मती है कि वे इतने उम्रदराज हो गए कि इन सेवाओं के काबिल नहीं रह गए। जाहिर है, इसी वजह से सरकार ने ‘अग्निपथ’ योजना में पहला संशोधन किया है और ‘सिर्फ एक बार’ के लिए अधिकतम उम्र सीमा 21 से बढ़ाकर 23 साल कर दी है।

यूपीएससी में ऐसी छेड़छाड़ की गई होती तो शायद उन क्षेत्रों में इससे बड़ा उपद्रव भड़क जाता। और आप जानते ही हैं कि तब हमारे मध्य/उच्च मध्य/उच्च वर्गों का जनमत उनके पक्ष में उमड़ पड़ता। वह विरोध प्रदर्शन शायद 1990 के मंडल विरोधी आंदोलन से भी बड़ा और गंभीर हो जाता। तब प्राइम टाइम और सोशल मीडिया पर जो ‘डिबेट’ चलते, उनके सुर आज के उनके सुर से कहीं ज्यादा तीखे होते।

न तो मैं ‘अग्निपथ’ विरोधी प्रदर्शनों का समर्थन कर रहा हूं; और न इस योजना को लेकर उभरी चिंताओं को बिना सोचे-समझे खारिज कर रहा हूं। भारत के लिए ये खतरनाक चेतावनी है कि जनसंख्या का जो लाभकारी पहलू है, वह एक त्रासदी के रूप में बर्बाद हो रहा है, क्योंकि करोड़ों युवा सरकारी नौकरी को खुदा की नेमत के रूप में देखते हैं। कोई भी सरकार इतनी नौकरियां नहीं पैदा कर सकती।

सेना में तो निश्चित ही नहीं, जिसका बजट और बैलेंस-शीट पहले ही उसके ‘एचआर’ महकमे के लिए एक आपदा जैसी होती है। ‘अग्निपथ’ योजना में चाहे जितनी खामियां हों, हमारी सेना को आमूलचूल सुधार की जरूरत है। लेकिन हमें युवाओं की चिंताओं को भी समझना होगा। यह सरकार को एक बार फिर यह भी याद दिलाता है कि चुनावों में वर्चस्व दिखाने का अर्थ यह नहीं कि उसे हैरत में डालने वाले फैसले थोपने का अधिकार मिल गया है, चाहे वे कितने भी नेक क्यों न हों।

वापस लिए गए कृषि कानूनों, भूमि कानूनों और रोक दिए गए श्रम नियमों के मामलों में उसे यह सबक तो मिल ही चुका है। किसी भी बड़े बदलाव के लिए लोगों को समझाना-बुझाना पड़ता है, जनमत तैयार करना पड़ता है। अपने समर्थकों से निरंतर संवाद बनाए रखना होता है, उनके बारे में बताना होता है कि वे उनके लिए किस तरह लाभदायी हैं।

लोग ऊपर से थोपे गए बदलावों से डरते और परहेज करते हैं। इसी वजह से भूमि कानून और कृषि सुधार कानून बर्बाद हुए और श्रम संबंधी नियम अटके। सेना के आधुनिकीकरण की कोशिशें भी यदि पटरी से उतर जाती हैं तो यह एक त्रासदी होगी।

किसान आंदोलन का केंद्र पंजाब था, जो भाजपा से अप्रभावित रहा है। पर अग्निपथ पर जो गुस्सा फूटा है, वह उन राज्यों में दिख रहा है, जहां एनडीए की सरकार है और जिन्हें भाजपा का आधार माना जाता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)