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पवन के. वर्मा का कॉलम:आज देश के मध्यवर्ग को लग रहा है कि उसके सभी सपने पूरे नहीं हो पा रहे

2 महीने पहले
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पवन के. वर्मा, लेखक, राजनयिक, पूर्व राज्यसभा सांसद - Money Bhaskar
पवन के. वर्मा, लेखक, राजनयिक, पूर्व राज्यसभा सांसद

वर्ष 1997 में मैंने एक किताब लिखी थी- ‘द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास’। हिंदी में इसका बेहतरीन अनुवाद अभय दुबे ने ‘भारतीय मध्यवर्ग की अजीब दास्तान’ शीर्षक से किया था। तभी से मैं असीम ऊर्जा, हर हाल में सर्वाइव करने की वृत्ति, कड़ी मेहनत की क्षमता और उद्यमिता कौशल से भरे इस वर्ग पर पैनी नजर रखे हुए हूं। आज भारत का मध्यवर्ग क्या चाहता है?

बीते वर्षों में इसका आकार और समृद्धि तेजी से बढ़े और यह इकलौता ऐसा वर्ग है, जिसे अपने विस्तार में अखिल भारतीय कहा जा सकता है। मध्यवर्ग आर्थिक विकास चाहता है। उसे अच्छी जीवनशैली, अधिक नौकरियां और बेहतर वेतन चाहिए, उसे व्यवसाय के अवसरों की तलाश है, वह उपभोग के बेहतर विकल्पों की भी चाह रखता है, उसकी इच्छा है कि उसे आसान कर्ज और कम कीमतों पर चीजें मिलें, विश्वस्तरीय शैक्षिक संस्थानों में पढ़ाई उसकी आकांक्षा है और उसे यह भी पसंद है कि स्टॉक मार्केट ऊपर उठता रहे।

1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद से ही उसने निरंतर इन तमाम चीजों का मजा लिया है। और आज वह दुनिया के सबसे ज्यादा आकांक्षावान वर्गों में से एक है। मध्यवर्ग की खासियत है कि अगर उसे पसंद की चीजें मिल जाती हैं तो वो इस बात की ज्यादा परवाह नहीं करता कि वे कैसे मिलीं। उसे लोकतंत्र पसंद है, लेकिन केवल तभी तक, जब तक वह उसके हितों को क्षति न पहुंचाए। यही कारण है कि अगर कोई ताकतवर नेता उससे उसकी इच्छाएं पूरी करने का वादा करता है तो वह उसे सत्ता सौंपने से परहेज नहीं करता।

जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की थी तो शुरुआत में मध्यवर्ग ने इसका बड़ा समर्थन किया था। मध्यवर्ग को डंडा-राज से ऐतराज नहीं है, क्योंकि उसे लगता है कि इससे बेलगाम भीड़ को नसीहत देकर रास्ते पर लाया जा सकता है। जब डंडा मध्यवर्ग के ही हितों पर कुठाराघात करने लगा, तब जाकर उसने उसका प्रतिकार किया। यही बात बुलडोजरों पर भी लागू होती है।

आज बुलडोजर को ताकतवर सरकार के प्रतीक की तरह देखा जाता है, लेकिन मध्यवर्ग को अंदाजा नहीं है कि अगर सरकार को ताकत की आजमाइश की आदत लग गई तो एक दिन वह उनके घरों पर भी बुलडोजर चलाने से नहीं हिचकेगी। इन अर्थों में, मध्यवर्ग की छठी इंद्री उसे बता देती है कि कब चीजें काबू से बाहर होने लगी हैं, क्योंकि वह अपनी प्राथमिकताओं को लेकर स्पष्ट रहता है।

एक विदेशी ने एक बार आश्चर्य जताते हुए मुझसे कहा था यह कैसे मुमकिन है कि भारत में शिक्षित मध्यवर्गीय व्यक्ति लगभग इस बात की अनदेखी कर देता है कि समृद्धि की चमक-दमक के निकट ही एक झुग्गी बस्ती बड़ी शोचनीय दशा में है। मध्यवर्ग को लगता है कि गरीबों की जरूरत तो है, लेकिन केवल उनकी सेवा करने के लिए, जिसके बाद उन्हें सुविधाजनक रूप से आंखों से ओझल किया जा सकता है। लेकिन मध्यवर्ग यह भी नहीं चाहता कि गरीबों की तादाद नियंत्रण से बाहर चली जाए, क्योंकि इससे उसकी सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो जाएगा।

मध्यवर्ग धार्मिक वृत्ति का होता है, लेकिन धर्म के कारण निर्मित होने वाली सामाजिक विषमता से उसे समस्या नहीं। अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण पर उसके द्वारा आपत्ति जताई जाती है, लेकिन अगर साम्प्रदायिकता से उसके आर्थिक हितों को नुकसान होने लगे तो उसका रवैया बदल जाता है। मध्यवर्ग यह भी नहीं चाहता कि धर्म उनके जीवन में जरूरत से ज्यादा दखल देने लगे। आज देश के मध्यवर्ग को लग रहा है कि उसके सभी सपने पूरे नहीं हो पा रहे हैं।

प्यू रिसर्च 2021 के मुताबिक 2020 में मध्यवर्ग में 9.9 करोड़ लोग थे, जो 2021 में घटकर 6.6 करोड़ रह गए। नोटबंदी और कोविड की उस पर कड़ी मार पड़ी है। जिनकी नौकरियां हैं, उनके सामने वेतन-कटौती की चुनौती है, कुछ अन्य को छंटनी का डर सता रहा है। वहीं नए रोजगार सृजित नहीं हो पा रहे हैं। महंगाई आसमान पर है, आमदनी घट रही है और बचतें खत्म हो रही हैं।

इसका असर जीवन की गुणवत्ता पर पड़ रहा है। अमीर और अमीर हो गए हैं। देश की शीर्ष 1 प्रतिशत आबादी के पास कुल सम्पत्ति का 73 प्रतिशत हिस्सा है। दूसरी तरफ गरीबों की संख्या बढ़ रही है। दिन में लगभग 150 रुपए कमाने वालों की संख्या 2020 में 5.9 करोड़ थी, जो अब बढ़कर 13.4 करोड़ हो गई है। ऐसे में द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास आज क्या सोच रहा होगा? वो जो सोच रहा है, उसी से कल की धारणाएं तय होंगी।

देश में अस्थिरता है और आंदोलन हो रहे हैं। मध्यवर्ग को असुरक्षा पसंद नहीं। वह चाहता है कानून-व्यवस्था कायम रहे। द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास आज क्या सोच रहा है? यह जरूरी सवाल है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)