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नीरज कौशल का कॉलम:सेना में नियुक्ति की योजना की तुलना किसी रोजगार गारंटी योजना से करना अभद्रता

3 महीने पहले
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नीरज कौशल, कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर - Money Bhaskar
नीरज कौशल, कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर

गैर -अधिकारी रैंक के सशस्त्र बलों की नियुक्ति सम्बंधी सरकार की नई योजना अग्निपथ में अनेक नई और सराहनीय सुविधाएं हैं। अगर इसे ठीक से लागू किया जाए तो यह सेना के तीनों बलों का आधुनिकीकरण करेगी और इससे उनमें तकनीकी रूप से समृद्ध युवाओं की संख्या बढ़ेगी। इसका एक मकसद रक्षा बजट पर आ रहे पेंशन के बोझ को कम करना भी है। अलबत्ता अगले पंद्रह वर्षों तक इसमें किसी कटौती की गुंजाइश नहीं है।

पिछली योजनाओं के तहत नियुक्त किए गए सैन्य अधिकारी आगामी पंद्रह वर्षों तक रिटायर्ड की श्रेणी में आते रहेंगे और रिटायरमेंट के 40 साल बाद या इससे भी अधिक समय तक पेंशन लेते रहेंगे। एक ऐसे समय में, जब देश के युवाओं को उत्पादक-रोजगारों की जरूरत है, यह देखकर आश्चर्य होता है कि विश्लेषकगण और विपक्षी दल इस विचार का समर्थन कर रहे हैं कि देश के पहले ही सीमित संसाधनों को पेंशन देने में खर्च किया जाता रहे!

हमारे सैन्यबल देश की सीमारेखाओं की सुरक्षा करने का सबसे महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। इसमें नियुक्ति की योजना की तुलना किसी रोजगार गारंटी योजना से करना तो अभद्रता ही है। आज दुनिया के अनेक देश अपनी सेना का आधुनिकीकरण कर रहे हैं, उन्हें चुस्त-दुरुस्त और तकनीकी रूप से मजबूत बना रहे हैं। भारत को भी यही करना चाहिए। क्योंकि देश की सीमारेखाओं की सुरक्षा करना देश की कार्यशक्ति में हर साल सम्मिलित होने वाले युवाओं के एक छोटे-से वर्ग को रोजगार और पेंशन गारंटी देने से कहीं ज्यादा जरूरी है।

अग्निपथ योजना के कारण देश के सैनिकों की औसत आयु 32 साल से घटकर 26 साल हो सकती है। अग्निवीर कहलाने वाले सैनिकों की नियुक्ति की न्यूनतम आयुसीमा 17.5 वर्ष है। इन्हें चार वर्षों के लिए नियुक्त किया जाएगा, जिसमें छह महीने प्रशिक्षण और साढ़े तीन वर्ष सेवा का समय होगा। इनमें से तीन-चौथाई अग्निवीर जब सेवा छोड़ेंगे तो उनके पास 11 लाख रुपयों की राशि होगी, वहीं हर बैच के एक-चौथाई अग्निवीरों को 15 वर्षों की सेवा के लिए नियुक्त किया जाएगा।

मौजूदा वर्ष में अग्निपथ योजना के तहत 46 हजार अग्निवीरों की नियुक्ति की जाएगी। आलोचकों का कहना है कि चार साल के बाद 75 प्रतिशत यानी लगभग 34 हजार सैनिकों को सेवामुक्त करने से समाज के सैन्यीकरण हो जाने का खतरा है। उनको यह भी लगता है कि सेना से लौटे युवाओं को कोई उत्पादक-रोजगार नहीं मिल सकेगा और पेंशन की सुरक्षा के बिना वे हिंसा पर उतारू हो जाएंगे।

तमाम तरह की थ्योरियां यह साबित करने के लिए सामने रखी जा रही हैं कि कैसे 15 वर्ष की सेवा के बाद कार्यमुक्त होने वालों को कोई समस्या नहीं होगी, लेकिन 4 वर्ष की सेवा बाद कार्यमुक्त होने वाले नौकरी नहीं पा सकेंगे और हिंसा पर आमादा हो जाएंगे।

जबकि सच्चाई यह है कि मौजूदा योजना के तहत जो युवा 15 वर्षों की सेवा के बाद अपनी मिड-थर्टीज़ में कार्यमुक्त होंगे, उन्हें 4 वर्ष में कार्यमुक्त होने वालों की तुलना अधिक कठिनाई आ सकती है, क्योंकि कोई भी नियोक्ता आपको बता देगा कि जो युवक अभी अपनी अर्ली-ट्वेंटीज़ में है, वह उस व्यक्ति की तुलना में कहीं अधिक सरलता से नौकरी पा सकता है, जो 15 वर्षों की सेवा के बाद कार्यमुक्त हुआ है। जबकि यह विडम्बना ही है कि देश के अनेक राज्यों में जिन युवाओं ने हिंसक प्रदर्शन किए, उन्होंने तो अभी अग्निपथ योजना के तहत प्रशिक्षण भी नहीं लिया था।

हरिवंशराय बच्चन की कविता अग्निपथ की ऐसे अवसर पर याद आती है, जिसमें ये पंक्तियां हैं- ‘ये महान दृश्य है / चल रहा मनुष्य है / अश्रु-स्वेद-रक्त से / लथपथ लथपथ लथपथ / अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ!’ लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि अग्निपथ योजना के विरोध में जो युवा आंदोलन कर रहे हैं, रेलगाड़ियां जला रहे हैं और सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुंचा रहे हैं, वे अग्निपथ पर चलकर अग्निवीर नहीं बनना चाहते।

वे केवल एक ऐसी नौकरी चाहते हैं, जिसमें सरकार उनकी सहूलियत का खयाल रखे। वे अग्निपथ नहीं पेंशनपथ खोज रहे हैं। दु:ख इस बात का भी है कि उनके कृत्य की निंदा तक नहीं की जा रही है।

जो युवा रेलगाड़ियां जला रहे हैं और सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुंचा रहे हैं, वे अग्निवीर नहीं बनना चाहते। दु:ख इस बात का भी है कि उनके कृत्य की निंदा तक नहीं की जा रही है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)