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एन. रघुरामन का कॉलम:समय आ गया है कि हम लत को पीछे छो दें, अपनी जड़ों की ओर वापस लौटना जारी रखें

3 महीने पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Money Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

इस सोमवार सुबह मैं कनाडाई एथलीट, मानवतावादी व कैंसर रिसर्च एक्टिविस्ट टैरेंस स्टेनले फॉक्स के बारे में पढ़ रहा था। कैंसर के चलते उनका एक पैर काटना पड़ा था। इसके बावजूद उन्होंने 1980 में कैंसर शोध के लिए पैसे जुटाने व जागरूकता के लिए एक ही पैर से पूर्व से पश्चिम क्रॉस कंट्री कनाडा रन की। हालांकि कैंसर फैलने से 143 दिन में 5,373 किमी दौड़ने के बाद उन्हें मजबूरन दौड़ रोकनी पड़ी और उनकी मौत हो गई।

इसके बाद 1981 में पहली बार सालाना ‘टैरी फॉक्स रन’ आयोजित हुई, बढ़ते-बढ़ते इसमें 60 देशों के लाखों लोगों ने हिस्सा लिया और अब यह कैंसर रिसर्च के लिए दुनिया का सबसे बड़ा वन-डे फंड रेज़र बन चुका है, अप्रैल 2020 तक उनके नाम पर 4.8 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा जमा हो चुके हैं। टैरी की कहानी से प्रेरित होकर मुंबई में डोंबिवली के विशक कृष्णास्वामी ने 2017 में रनिंग शुरू की।

24 की उम्र में रनिंग शुरू करने वाले कृष्णास्वामी के नाम कई रिकॉर्ड हैं- वह बेंगलुरु में आयोजित 72 घंटे की 300 किमी लंबी एंड्यूरेंस रन में सेकंड, हेन्नूर बैंबू अल्ट्रा (220 किमी) में सेकंड, 161 किमी की पुणे अल्ट्रा मैराथन में थर्ड रहे। इस साल मई-जून में 21 दिनों तक रोज नंगे पांव (बेयर फुट) हाफ मैराथन दौड़कर उन्होंने वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है।

उनका अगला लक्ष्य दस दिनों में एक हजार किमी, 120 दिनों में दस हजार किमी और 110 दिनों तक रोज 42 किमी दौड़ना है। विशक पांच सालों से मैराथन दौड़ रहे हैं, अब वह जिंदगी में कुछ नया करना चाहते हैं। उन्होंने गिनीज़ बुक में विश्व रिकॉर्ड खोजा और पाया कि एक व्यक्ति के नाम लगातार सबसे ज्यादा दिनों तक बेयरफुट हाफ मैराथन का रिकॉर्ड है। उन्होंने 23 मई 2022 से बेयरफुरट हाफ मैराथन शुरू की और लगातार 21 दिन दौड़े, ये डीटेल रिकॉर्ड की और इस श्रेणी के हार्वर्ड वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के लिए अप्लाई किया।

मानव इतिहास में ज्यादातर समय में हम नंगे पैर ही दौड़ते आ रहे हैं, हालांकि इससे जुड़े जोखिम व फायदों पर विज्ञान की ओर से साफ सर्वसम्मति नहीं बन पाई है। फिर भी बड़ी संख्या में शोधकर्ता मानते हैं कि नंगे पैर दौड़ने से पैरों पर कम तनाव पड़ता है और हर कदम के लिए ज्यादा ताकत पैदा होती है। विशक का पक्के तौर पर मानना है कि प्रकृति से जुड़ने से इम्यूनिटी बढ़ती है। कई रिपोर्ट्स इशारा करती हैं कि नंगे पैर चलने व दौड़ने के संपूर्ण सेहत-हेल्थ के साथ कई मनोवैज्ञानिक फायदे भी हैं। इससे गहरी नींद आती है।

धरती मां से जुड़ाव स्थापित करने के और भी तरीके हैं- पार्क में चलें, ट्रेकिंग करें, घास पर लेटें व योग करें। कल जब मैं ये फायदे पढ़ रहा था तभी फोन बजा। मेरे एक स्कूल मित्र व उद्ममी बी मुरली ने वॉट्सएप पर लिंक भेजी थी। वे पूछ रहे थे कि ‘क्या तुम 21 जून को सुबह 6.15 पर योग दिवस के आयोजन में शामिल होने के इच्छुक हो? अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर यह विशेष सत्र है।’ लंबे विचार के बाद उदास मन से मैंने कहा ‘मैं फोन को छोड़कर घास पर योग करना ज्यादा पसंद करूंगा।’ न भूलें कि मानव सिर्फ पैदल चलते थे।

जूते से लेकर आधुनिक टेक्नोलॉजी जैसे हमें जोड़ने वाले मोबाइल हमारे रास्ते में फेंके पत्थर जैसे हैं। इनमें से कुछ को हम कूदकर पार कर लेते हैं, तो कुछ को जिंदगी में सहूलियतों के लिए उठा लेते हैं। पर इस प्रक्रिया में इनकी लत से हम पत्थरों की दीवार खड़ी कर लेते हैं और अतीत से कट जाते हैं। समय आ गया है कि ‘उसी पत्थर’ से हम सेतु बनाएं न कि दीवार। याद रखें आप ही अपनी जिंदगी के आर्किटेक्ट हैं!

फंडा यह है कि समय आ गया है कि हम लत (फोन) पीछे छोड़ें, इसलिए अपनी जड़ों की ओर वापस आने की खातिर लौटना जारी रखें, कम कम से अंतरराष्ट्रीय योग दिवस जैसे मौकों पर तो ऐसा करें।